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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 508 में से

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पृष्ठ 247

सुन्दरकाण्ड २९७
परस्त्रियो के शरीर के विविध अगो को देखने से पुण्यात्मा हनुमान् मन-ही-मन
अत्यत दुखी था । वह सोचने लगा कि स्वामी के कार्य में निरत रहने के कारण मुझे इस
प्रकार परस्त्रियो के शरीर के अगो को देखना पडा है। पाप-बुद्धि से मैने ऐसा नही किया हैं।
इन स्त्रियो के झुड में ही सीताजी को ढूँढना है, अन्य स्त्रियो में नही ।
इस प्रकार मन में सोचते हुए दबे पाँव वह आगे बढ़ा । वहाँ उसने एक विशाल
रत्न-वेदी पर पुष्प-शय्या पर सोनेवाले इन्द्र के भोग-विलास को भी मात करनेवाले, साध्य-
राग से युक्त जलद की भाँति चदन तथा अगराग से दीप्त शरीरवाले सुदर झरनो से युक्त
नीलाद्रि के समान मोतियो की मालाओ से सुशोभित देहवाले, पचशिरवाले भयकर सर्पो की भाँति
सुपोषित उँगलियो से युक्त भुजाओवाले, स्वच्छ चाँदनी के साथ रहनेवाले अधकार के समान
अपने शरीर को स्वच्छ चादर से ढककर सोनेवाले, अपने विशाल वक्ष पर ऐरावत के दाँतो के
आघातो को बडे साहस के साथ वहन करनेवाले, अपने दोनो पार्श्वों में रखे मणिमय दीपो
की शिखाओ को अपनी उसाँसो से हिलानेवाले, मुकुट तथा कुडलो की दीप्ति से सुशोभित रूपवाले
तथा सभी शत्रुओ का गर्व निचोडनेवाले रावण को देखा और अनुमान कर लिया कि यही
राक्षस राजा है । उसके पार्श्वों में गधर्व, देव तथा दैत्य कामिनियो को देखा । उनमें से
कुछ पानदान, कुछ पीकदान और कुछ अपने हाथो में पखे लिये हुई थी । कुछ कामिनियाँ
अपने कर-ककणो से शब्द करती हुई चामर डुलाने, कुछ मधुर-मधुर गीत गाने, कुछ
नृत्य करने, कुछ वीणा बजाने और कुछ मृदग बजाने के पश्चात् अब थककर अपने-अपने
उपकरणो से लिपटी हुई सोई पडी थी ।
उसके पश्चात् परम पावन हनुमान् ने रावण की शय्या पर सोई हुई, नव यौवनवती
देव-स्त्रियो के सदृश दीखनेवाली और गगन-मडल के मध्य रहनेवाली चन्द्रकला के समान
प्रकाशित होनेवाली, मदोदरी को देखा । हनुमान् ने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि
मैंने सीताजी को देख लिया और वह आनदविभोर हो उठा । उस आनद में कभी
उछलता, कभी कूदता, कभी वहाँ के स्तभो पर चढता और कभी अपने लांगूल का चुम्बन करता ।
इस प्रकार वह थोडी देर तक अपनी जाति-सहज विकृत चेष्टाएँ करता रहा । फिर वह
मन-ही-मन अपने विवेक को जाग्रत करके सोचने लगा, -'मनुकुलेश्वर की पत्नी, पति-
व्रताओ में शिरोमणि, परमपावनी, तथा महाराज जनक की पुत्री, भला, देवाधिदेव राम को
छोडकर, रावण के साथ रहने की इच्छा करेंगी ? कही आसवत हो मधुपान करेंगी ? हाय,
मेरी बुद्धि को ऐसा भ्रम क्यो हुआ ? कैसे भी विचार करूँ, यह चचलाक्षी अवश्य ही कोई
दानवी है, सीता नही हैं ।'
इस प्रकार निश्चय करके वह उस स्थान को छोडकर आगे बढा और आसव, रक्त,
मधु एव मास-युक्त मधुशालाओ को देखकर उन भवनो में सीता को ढूँढ़ा, जिनमें गरुड,
उरग, अमर, गधर्व तथा सिद्धो की स्त्रियाँ बदी थी । फिर उसने जहाँ-तहाँ छाया में खडे
होकर, एकात में वार्तालाप करनेवालो का सभाषण ध्यान से सुना । बिना इस बात का
विचार किये ही कि में अमुक स्थान में प्रवेश कर सकता हूँ, अमुक स्थान में नही, अमुक
स्थान में जाना मेरे लिए उचित है, अमुक स्थान में नही, हनुमान् ने सारी लङ्कापुरी में
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