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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 508 में से

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पृष्ठ 254

२२४ रंगनाथ रामायण
१० राक्षसियों का सीता को दुःख देना
इसके पश्चात् दानव-स्त्रियाँ अपनी चिकनी-चुपड़ी बातो से जानकी को समझाने
लगीं—'हे सीते, तुम रावण को अपना लो।' एक राक्षसी हाथ में शूल लिये उन्हें धमकी
देने लगी—'राम इस लंका की ओर ताक भी नही सकेगा, इसलिए तुम उसकी आशा
छोड़ दो।' एक नीचबुद्धिवाली कहने लगी - 'इस प्रकार क्यो कष्ट भोग रही हो ?
दानवेश्वर को वर लो, अन्यथा मैं तुम्हारा वध कर डालूँगी।' एक राक्षसी बीच ही में
रोककर बोली—'खड्ग लाओ, हम अभी इसका सिर काट डालें और इसका मास मद्य में
डुवोकर चखें।' उसका समर्थन करती हुई एक दूसरी राक्षसी ने कहा—'ठीक है, यही करो।'
इस प्रकार धमकी देनेवाली राक्षसियो को देखकर भूमिसुता, कुमुदनयनी सीता
मन-ही-मन क्रोधित एवं दुःखी हुई और आँसू वहाती हुई गद्गद कठ से धमकानेवाली उन
स्त्रियो को देखकर बोली—'क्या दानव और मानव में कही दापत्य निभ सकता है, तुम
सब मिलकर ऐसे अपशब्द कह रही हो, क्या यह तुम्हारे लिए उचित है ? जैसे चंद्रिका,
चंद्र से बिछुड़कर नही रह सकती, जैसे प्रभा सूर्य से बिछुड़कर नही रह सकती, वैसे ही
मैं राम से बिछुड़कर नही रह सकती । मेरे प्रभु भले ही दीन रहें, राज्यहीन रहें तो भी
वे मेरे इष्ट देवता हैं । मैं भी जलधि (लक्ष्मी) के समान, पार्वती के समान, वाणी के
के समान, पौलोमी के समान, सावित्री के समान तथा रति के समान पतिव्रता की निष्ठा
से अपने पति राम की ही आराधना करूँगी । तुम चाहो, तो मेरा वध कर डालो, तेज
खड्ग से मेरा सिर काटना चाहो, तो काट दो । मैं केवल राम के सिवा और किसी को
स्वीकार नही कर सकती । मैं भ्रम में डालनेवाली तुम्हारी बातो में कभी नही आऊँगी ।
अब तुम इन बातो को छोड़ दो ।'
सीता की बातें सुनकर सभी राक्षसियाँ क्रोध से भभक उठीं और मदमत्त हो सीता
को विविध प्रकार से पीड़ा देने लगीं । तब सीता धूलि-धूसरित हो पृथ्वी पर लोट गई
और उनकी काली नागिन की-सी वेणी बिखर गई । वह उत्तम स्त्री पृथ्वी पर पड़ी हुई,
उसाँसें भरने लगी । वे ऊँचे स्वर में बार-बार, 'हाय लक्ष्मण', 'हाय राम', 'हाय माता
कौसल्या', कहकर रोने लगी ।
११. त्रिजटा का स्वप्न
त्रिजटा सीता का संताप न देख सकने के कारण वहाँ से उठकर चली गई और
किसी एकांत स्थान में जाकर सो गई । सोते-सोते एक स्वप्न देखकर वह जाग पड़ी ।
उसने सभी राक्षस-स्त्रियो को देखकर कहा—'हे नारियो, मैंने एक स्वप्न देखा है, उसे
मैं तुम लोगो को सुनाऊँगी; ध्यान से सुनो । मैंने स्वप्न में देखा कि राम एक हाथी पर
चढ़कर आ रहे हैं, उनके पीछे-पीछे लक्ष्मण, उनके सेवक के रूप में आ रहे हैं । फिर मैंने
देखा कि वह पृथ्वीपति इस कोमलांगी को उस गज पर बैठाकर ले जा रहे हैं । फिर
मैंने देखा कि रामचंद्र का राजतिलक हो रहा है और ब्रह्मा आदि देवता उनकी सेवा
कर रहे हैं । इतना ही नहीं, मैंने यह भी देखा कि रावण सुंदर पुष्पक विमान से चकराकर
पृथ्वी पर गिर गये हैं । तब नीलांबर धारण किये हुई एक युवती एक भयंकर खड्ग लेकर