रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 238, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें३०८ रंगनाथ रामायण
लंका में प्रविष्ट होऊँगा । अथक परिश्रम करके ढूँढूँगा और भूमि-सुता को देखकर ही वापस
आऊँगा । अथवा उस लंका को भी उखाड़कर यहाँ ले आऊँगा तथा सीता को अवश्य ही
राम के चरणों में पहुँचा दूँगा । नहीं तो सभी समुद्रों का मथन करूँगा, उद्धत गति से
अमराद्रि को नष्ट-भ्रष्ट करूँगा, पृथ्वी को चूर-चूर कर दूँगा, मृत्यु का भी संहार करूँगा,
समस्त द्वीपों को छान डालूँगा, देवेन्द्र को त्रास दूँगा, सभी दुष्ट राक्षसों का संहार करूँगा,
और समस्त संसार में अंधकार फैला दूँगा, किन्तु बिना कार्य सम्पन्न किये तुम्हारे निकट
नहीं आऊँगा ।'
२३. समुद्र पार करना—मैनाक से भेंट
इतना कहकर हनुमान् महेन्द्रगिरि पर चढ़ गया और त्रिविक्रम विष्णु के समान ऐसा
अद्वितीय शरीर धारण किया, मानो प्रलयकालीन काल सभी समुद्रों के साथ सारी सृष्टि
को निगलने के लिए प्रस्तुत हुआ हो । उसके पश्चात् उसने अंगद आदि वानरों की अनुमति ली ।
मन-ही-मन अपने पिता वायुदेव का स्मरण किया, श्रीराम के चरण-कमलों को अपने
हृदय में प्रतिष्ठित किया । दृढ़ता के साथ अपने पैरों को पहाड़ पर जमाया, कंठ ऊपर को
उठाया, देह को झुकाया और भौंहें उठाकर विशाल जल-राशि को चारों ओर से देखा ।
उसके उपरान्त उसने रावण की नगरी पर दृष्टि डाली, अपना लांगूल जोर से घुमाया,
दोनों कान खड़े किये, शिलाओं पर अपने हाथ टेके और आकाश की ओर बड़े वेग से
ऐसे उछला, जैसे पूर्वकाल में अमृत को छीनने के उद्देश्य से गरुड़ पृथ्वी से आकाश की ओर
उड़ा था । उस वेग के प्रभाव से पर्वत-शृंग चूर-चूर हो गये, मानो रावण ने अबतक
जो अत्यधिक महत्त्व और यश प्राप्त किया था, वे सब चूर-चूर हो गये हों । (उस पर्वत
पर के) वृक्ष उसके वेग के कारण उसके साथ ही आकाश की ओर उड़ चले और खंड-
खंड होकर उस सागर में ऐसे गिरे, मानो पवन-पुत्र ने स्वयं ही भावी सेतु का शकुनस्थापन
किया हो ।
उस समय उत्पन्न प्रचंड वायु के कारण बादल चारों ओर ऐसे भागे, मानो वे पवन-
पुत्र के लंका में आगमन की सूचना इंद्र आदि देवताओं को देने के लिए जा रहे हों !
समुद्र का सारा जल एक ओर हट गया और जल के भीतर पाताल-लोक ऐसा दीखने
लगा, मानो समुद्र हनुमान् को यह दिखा रहा हो कि रावण ने मेरे जल में जानकी को
नहीं छिपाया है । हनुमान् की स्वामिभक्ति, धैर्य, साहस, तेज, चातुर्य, और उदात्त शक्ति
को देखकर इन्द्रादि देवता उनकी प्रशंसा करने लगे ।
इस प्रकार जानेवाले हनुमान् को देखकर समुद्र मन-ही-मन सोचने लगा—'यह
पुण्यात्मा, जगत् के कल्याण के लिए बहुत दूर जा रहा है । उसका श्रम दूर करने के
निमित्त, मैं मैनाक को भेजूँगा ।' यों सोचकर उसने मैनाक को बुलाकर कहा—'अभी हनु-
मान् यहाँ आया है । उचित रीति से उसके अतिथि-सत्कार की व्यवस्था करो ।'
शोभा-समन्वित, स्वर्ण-शिखरों से विलसित, स्वर्ग-सम सुंदर वह मैनाक पर्वत तुरन्त
अपने विशाल पंखों को फैलाते हुए उड़ा और समुद्र के मध्य भाग से ऊपर आया और
हनुमान् के सामने आ पहुँचा । हनुमान् ने अपने सामने उस विशाल पर्वत को देखकर