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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 508 में से

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पृष्ठ 244

२१४ रंगनाथ रामायण
मकर, कच्छप तथा पद्मिनिधियो से युक्त अलकापुरी ही मानो कुबेर से रूठकर वहाँ आ
गई हो, या चिरकाल से समुद्र के नीचे रहने के कारण ऊबकर भोगवती नगरी ही समुद्र-
तल से ऊपर उठकर त्रिकूट पर्वत पर आ गई हो । उस नगरी का प्रभा-समन्वित स्वर्ण-
दुर्ग, समुद्र को ही अपनी परिखा बनाकर, ब्रह्माण्ड के समान सुशोभित था और ब्रह्मादि
देवताओ को भी अभेद्य दीखता था । वह लकापुरी दुर्वार गज, रथ, तुरग तथा भयकर
एव श्रेष्ठ वीरो से युक्त थी और अलौकिक ऐश्वर्य से सपन्न हो बहुत सुदर दीखती थी ।
ऐसी लका नगरी को देखकर हनुमान् आश्चर्य-चकित हो गया और निनिमेष नेत्रो से जहाँ-
तहाँ देखता ही रह गया । वह सोचने लगा--'अकेले समस्त लोको को जीतकर, अपने
पराक्रम से सभी लोको में अपनी श्रेष्ठता स्थापित करनेवाला दशकंधर ऐसे ऐश्वर्य से
सपन्न लका का राजा बना हुआ है । फिर भी, उसके भाग्य में जीवित रहना नही लिखा है ।
सर्वेश्वर रामचंद्र की पत्नी को ले आकर इस मूर्ख ने क्यो मृत्यु को आमंत्रित किया है ?'
इस प्रकार रावण की निंदा करते हुए वह शक्तिशाली हनुमान् लका में प्रवेश करने
का उपाय सोचने लगा । वह नगर के उत्तर द्वार पर पहुँचा और सारी परिस्थिति तथा
अपने कर्त्तव्य का विचार किया । उसके पश्चात् वह सोचने लगा--'भला, इस विशाल
सागर को वानर कैसे पार कर सकेंगे ? यदि पार भी करेंगे, तो इन्द्रादि देवताओ के लिए
भी दुर्भेद्य इस लका को जीतना क्या किसी भी रीति से उनके लिए सभव होगा ? युद्ध-
भूमि में भयकर साहसी रावण को राम कैसे जीत सकेंगे ?'
एक मुहूर्त्त काल तक इस प्रकार सोचने के पश्चात् हनुमान् ने मन-ही-मन विचार
किया--यदि मै अपने इस विशालकाय के साथ, दिन को ही इस नगर में प्रवेश करूँगा,
तो राक्षस भटो से मेरा सामना हो जायगा । उस प्रकार मै सीताजी का पता नही लगा
सकूँगा । अत मै सूक्ष्म रूप धारण करके इस नगर में प्रवेश करूँगा और दैत्यो की आँखो
में धूल झोंककर अवश्य ही सीताजी के दर्शन करूँगा । इस प्रकार मन में विचार करके
वह सूर्यास्त की प्रतीक्षा में वैठा रहा । निदान सूर्य-विव इस तरह तिरोहित होने लगा,
मानो सूर्य यह सोच रहा हो कि विशाल शक्तिशाली राम की पत्नी सीता देवी का पता
लगाने के लिए जो यह (हनुमान्) आया है, मेरे आकाश में रहते समय उसके लिए लका
में प्रवेश करना कठिन होगा । दिशाओ में घोर अधकार ऐसा व्याप्त हो गया, मानो अनिल-
पुत्र के आगमन से भयभीत हो राक्षस (रावण) के घोर पाप चारो ओर भाग रहे हो ।
क्रमश दैत्यो की कलकल ध्वनि मद पडने लगी । यह देखकर पवन-पुत्र ने सारी बातें
मन-ही-मन विचार करके एक बिल्ली के समान छोटा रूप धारण किया और फिर राघवो
का स्मरण करके लका में प्रवेश करने का उपक्रम करने लगे ।
२. लंकिणी का हनुमान् को रोकना
उस समय भयकर आकारवाली लकिणी हनुमान् के मार्ग को रोककर ऐसे खडी हो गई,
जैसे किमी निधि को बाहर लाते समय उस प्रयत्न में बाधा डालने के लिए कोई भूत उत्पन्न
होकर खड़ा हो जाता है । उसने अट्टहास करके पवनकुमार को डाँटते हुए कहा--'तुम कौन हो ?
तुम्हारा नाम क्या है ? इस नगरमें तुम क्यो प्रवेश कर रहे हो ? किसने तुम्हें यहाँ भेजा है ?'