रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 239, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंसोचा—'यह दैत्यो की माया है । यह कदाचित् मेरे कार्य में विघ्न डालना चाहता है ।
पर कोई चिंता की बात नही है । मै अपनी शक्ति से इसका नाश करूँगा । यो सोचकर
हनुमान् ने वज्र के समान कठोर-अपने वक्ष.स्थल से उस पर्वत को धक्का दिया । तुरन्त
वह पर्वत, बवंडर में फँसे हुए सूखे पत्ते की तरह शक्तिहीन होकर चक्कर खाने लगा ।
फिर वह मनुष्य का रूप धारण करके हनुमान् से बोला--'हे अनिलकुमार, मै तुम्हारा
शत्रु नही हूँ । समुद्र की आज्ञा से मैं तुम्हारे पास आया हूँ । उस महानुभाव ने तुम्हें
आतिथ्य देने के निमित्त, मुझे तुम्हारे पास भेजा है । इसलिए मै तुम्हारे पास आया हूँ ।
प्राचीन काल में सभी पर्वतो के पख थे । अपने इन पखो के कारण जब वे गर्व करने लगे,
तब इन्द्र क्रोध में आकर वज्रायुध से सभी पर्वतो के पख एक-एक करके काटने लगा ।
तब यह देखकर तुम्हारे पिता पवन सहज ही मुझे इस लवण-समुद्र में ले आये ओर मेरे
पखो की तथा मेरी रक्षा की । इसलिए मैं तुम्हारा अपना ही व्यक्ति हूँ, पराया नही हूँ ।
मैं पर्वतश्रेष्ठ शीताचल का पुत्र हूँ । मेरा नाम मैनाक है । मेरे पेडो पर जो फल लगे है,
उनको ग्रहण करके, अपनी क्षुधा तथा क्लान्ति दूर करो । हे पवन-पुत्र, उसके पश्चात्
तुम लंकापुर को जा सकते हो ।' तब उस महाबली हनुमान् ने कहा--'अब विश्राम
करना उचित नही है । मैने प्रतिज्ञा की है कि मैं समुद्र के मध्य में कही नही ठहरूँगा ।
अत, हे पर्वतराज, मुझे यहाँ कही ठहरना नही चाहिए।' इस प्रकार कहकर उसने अपने
करतल से उस पर्वत की मूर्धा का स्पर्श किया और कहा—'हे अनघ, तुम्हारी पूजा फलवती
हुई । अब तुम जाओ ।'
इस प्रकार कहकर शीघ्र गति से जानेवाले अनिलकुमार की शक्ति को देखकर देवता
आश्चर्य तथा हर्ष से भर गये । देवेन्द्र ने भी मैनाक पर्वत को देखकर बड़े प्रेम से कहा--
'श्रीराम के कार्य के लिए जानेवाले हनुमान् के प्रति तुमने उचित व्यवहार किया । अत,
में तुम्हें अभय-दान देता हूँ । तुम सुख से यही रहो ।'
तब गंधर्व, अमर तथा मुनियो ने हनुमान् की शक्ति की परीक्षा लेने का विचार
करके सुरसा नामक नाग-माता को हनुमान् का मार्ग रोकने के लिए भेजा । तब वह एक
राक्षसी का रूप धारण करके हनुमान् के मार्ग में आ खडी हुई ओर बोली—'इस समुद्र
के ऊपर से होकर जानेवाले तुम्हें मैंने देखा, दैवयोग से अब मेरे प्राण बच गये, मैं बहुत
भूखी हूँ । अत, तुम अब मुझसे बचने की चेष्टा न करके, मेरे मुँह में प्रवेश करो।
तब हनुमान् ने कहा--हे नारी, तुम मेरा मार्ग मत रोको । मै राम का कार्य पूरा करके
लौटते समय तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा । अब मै जाता हूँ । मै असत्य वचन नही कहता।'
तब वह स्त्री क्रुद्ध होकर हनुमान् का मार्ग रोककर खड़ी हो गई और बोली, -
'में तुम्हें जाने नही दूँगी, मै अवश्य तुम्हारा वध करुँगी ।' यो कहती हुई उसने अपना
मुँह खोल दिया । तब अनिलकुमार ने अपना शरीर दस योजन तक बढ़ा लिया । तब
उस स्त्री ने अपना मुँह उसके दुगुना चौडा कर लिया । हनुमान् ने अपना शरीर तीस
योजन तक बढाया, तो उस स्त्री ने अपना मुँह चालीस योजन विशाल बना लिया। इस
प्रकार एक-दूसरे से स्पर्धा करते हुए क्रमशः अपने शरीर तथा मुँह को शत योजन तक
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