रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंके संबंध में सोचते-सोचते संतप्त हो उठा। वह बड़े तड़के ही उठा, तो उसका चित्त काम-
देव के प्रभाव से उद्विग्न होने लगा। उसने सुन्दर ढंग से दिव्य मालाएँ धारण कीं, शरीर
पर दिव्य गंध का लेप किया। दिव्य आभूषणों से अपने शरीर को सजाया। चारों दिशाओं
में अपनी शोभा को विकीर्ण करनेवाला मुकुट मस्तक पर रखा और चन्द्रहास (खड्ग) को
भी साथ लेकर वह अशोक-वन की ओर चल पड़ा। उसके पार्श्व-भाग में अप्सराएँ, अपने
मणिमय कंकणों को क्वणित करती हुई चामर डुला रही थीं, गंधर्व-युवतियाँ अपने घन-
कुचों पर के हारों को चंचल करती हुई पंखे झल रही थीं, किन्नर-रमणियाँ छत्र पकड़े
हुए अपने कुच-मूलों की शोभा प्रकट कर रही थीं, यक्ष-युवतियाँ अपनी बाहुओं तथा
पार्श्व-भागों को प्रकट करती हुई हस्त-वाहिकाओं के रूप में जा रही थीं। दोनों ओर
गरुड की स्त्रियाँ परिमल जल तथा मद्य के पात्र लिये हुए चल रही थीं। भीड़ में कुचल
न जायें, इस भय से नाग-कन्याएँ आगे-आगे जा रही थीं। विद्याधरों की स्त्रियाँ वीणा
आदि वाद्यों के साथ कर्णमधुर स्वर में गान कर रही थीं। रावण के गुण तथा औन्नत्य
के अनुसार सिद्धों तथा साध्यों की रमणियाँ एकत्र होकर उसका गुणगान कर रही थीं, खड्गपाणि
राक्षस-स्त्रियाँ बड़े उत्साह से उसके पीछे-पीछे चल रही थीं। इस प्रकार परिजनों को साथ
लेकर सहस्रों मशालों के प्रकाश में बादलों के पीछे चलनेवाली विद्युल्लता के समान मंदो-
दरी को साथ लिये हुए रावण चला। उसकी अन्य स्त्रियाँ भी उसकी सेवा में लगी हुईं,
उसके पीछे-पीछे जाने लगीं। उसके बलिष्ठ पदाघात से पृथ्वी काँपने लगी। भीड़ के परि-
हास की ध्वनि से आकाश गूँजने लगा। स्त्रियों की मेखलाओं, नूपुरों तथा मणिमय
आभूषणों का कलनाद कर्णपुटों को मधुर लग रहा था। इस प्रकार, उनींदी दृष्टि
से, कनक-केयूरों से अलंकृत बाहुओं से, पृथ्वी पर लोटनेवाले वस्त्रों से, अत्यधिक मुरझाये
हुए वदन से तथा अत्यंत भीषण आकार में रावण सीता के सामने आकर खड़ा हुआ।
उसे देखते ही सीता दिग्भ्रान्त-सी हो गईं। अपने मन में उन्होंने रघुराम का स्मरण
किया और अपनी जाँघें, उदर, कुच-द्वय, और सुंदर हाथों को अपने वस्त्रों से अच्छी तरह
ढक लिया और बाघ द्वारा देखी हुई हिरणी की भाँति सिकुड़कर बैठ गईं। ऐसी साध्वी
को देखकर अपने मद के प्रभाव में आकर रावण बोला—'हे सुंदरी, तुम अपनी क्षीण
कटि को क्यों छिपा रही हो ? अपना सुंदर मुख क्यों नीचे झुका रही हो ? हे अबले,
मन्मथ की पीड़ा से त्रस्त हुए मुझे तुम अपने कृपा-कटाक्ष से बचाओ। परस्त्रियों को बलात्
अपने वश में कर लेना हमारी जाति के धर्म के अनुकूल ही है। फिर भी मैं केवल तुम्हारी
कृपा-दृष्टि का आकांक्षी हूँ। मेरी बातें ध्यान से सुनो। इस हीन दशा में तुम क्यों रहती हो ?
कदाचित् तुम सोचती हो कि राम अपने भाई के साथ भयंकर वन को पार करके
यहाँ आयगा और समुद्र पर पुल बाँधकर अपने अतुल पराक्रम से मुझे जीतकर, तुम्हें छुड़ा-
कर ले जायगा। यह असंभव है। इन्द्र, यम, वरुण आदि देवताओं के लिए भी युद्ध में
मुझपर विजय पाना असंभव है। हे कमललोचनी, अब तुम इस पागलपन को छोड़ो।
मेरी भुज-शक्ति के सामने मनुष्य की शक्ति ही क्या है ? अनाथों की भाँति पर्वतों तथा
जंगलों में भटकते हुए, कष्ट सहनेवाले एक शक्तिहीन मानव का सहवास क्यों चाहती हो ?