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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 249, कुल 508 में से

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पृष्ठ 249

के लिए लक्ष्मण भी शरीर छोड़ देंगे । यह समाचार सुनकर भरत भी अपने प्राण-त्याग
करेंगे, उनके लिए शत्रुघ्न तथा अन्य सगे-सबंधी अपने-अपने प्राण तज देंगे । इस प्रकार
समस्त सूर्य-वंश का नाश हो जायगा । यह देख सुग्रीव, अगद आदि सभी वानरो के वंश
भी नष्ट हो जायेंगे । इसलिए मैं एक वानप्रस्थ की भांति वनो में ही निवास करूँगा, या
चिता रचकर अग्नि में प्रवेश करूँगा, या प्राणो का मोह छोड़कर समुद्र में डूब मरूँगा।
हाय, सपाति के वचनो को सत्य मानकर, अकेले मेरा यहाँ आना व्यर्थ हुआ । ठीक है,
चिंता की कोई वात नही है । मै साहस करके देवताओ से भिड जाऊँगा और देवेन्द्र को
पकड़कर उसे त्रास दूँगा, अथवा ज्वालाओ से युक्त अग्नि को पानी में डुबोकर उसे पृथ्वी
पर रगड़ दूँगा और उसकी प्रभा को नष्ट कर दूँगा, अथवा यम को उसके भटो के साथ
ऐसा दण्ड दूँगा कि उसका हृदय फट जाय, अथवा नैऋत को सभी राक्षसो के साथ भय
से तडपाकर उसे अत्यधिक दुख दूँगा, अथवा जल-राशियो के साथ वरुण को परास्त करके
उसे जीत लूँगा या वायु के सप्त पवनो को घेरकर उन्हें दण्ड दूँगा, या कुवेर को
किन्नरियो के साथ कैद करके उन्हें इस तरह तडपाऊँगा कि उनकी सारी सुदरता नष्ट हो
जायगी या अपने अतुल पराक्रम से ईशान को उसके सेनापति के साथ पकड़कर उनके
साथ युद्ध करके उन्हें जीत लूँगा, पृथ्वी को सभी पहाड़ो के साथ, कुम्हार के चक्र के
समान घुमाकर उसके गर्भ की सभी चीजो को उगलवा दूँगा या इस लका के राक्षसो
को समुद्र में डुबोकर सबका नाश करके सारी लका को छान डालूँगा । जब मै इतना
सब करूँगा, तभी सभी देवता (मेरे सामने) झुककर, सीताजी को दिखायेंगे, या राघव
स्वयं दया करके ससार का नाश करने से मुझे रोकेंगे ।
६. हनुमान् की सीता से भेंट
इस प्रकार निश्चय करके हनुमान् उस भवन के शिखर पर चढ़ गया । उसने
निकट ही स्थित वायु तथा सूर्य-किरणो के लिए भी अभेद्य अशोकवन के एक प्रातर भाग
में अत्यंत समृद्ध हेम-वर्ण के अशोक-वृक्ष के नीचे एक स्त्री को देखा । वह व्रतो के अनु-
ष्ठान के कारण क्लान्त हो गई थी, शोक से कृश हो गई थी, अत्यधिक दुख से दबी
हुई थी, वेदना से दग्ध थी, अनवरत झरनेवाले अश्रुजल में डूबी हुई थी, विरहाग्नि में
तप्त थी, कपट आचरण का शिकार बनने से मर्माहत होकर सूख-सी गई थी, जीवन के
प्रति विरक्त-सी हो गई थी और उसके चीर मैले हो गये थे । वह भगवान् को मन-ही-
मन कोसती हुई, दुखो का सहन करती हुई, अपने को असहाय समझकर धैर्य त्यागी हुई,
सूर्य की प्रचंड रश्मि से सूखी नव-लता के समान, धुएँ से घिरी हुई दीप-शिखा के समान,
बादलो की पंक्ति के मध्य दीखनेवाली चंद्र-रेखा के समान, पाले से आहत पद्मिनी के समान,
मार्जारी के मध्य रहनेवाले तोता पक्षी के समान और व्याघ्रो के मध्य फँसी हुई गाय के
समान, दुर्वार घोर राक्षसो के मध्य बड़े उदास भाव से एक हथेली पर कपोल रखे बैठी हुई थी ।
ऐसी मुद्रा में बैठी हुई आभूषणो से युक्त वेणी से आच्छादित जंघावाली, मलिन अंगोवाली, गद्गद
कंठवाली, उष्ण निःश्वास छोड़ती रहनेवाली, सतत उपवास करनेवाली विशालाक्षी, जनक की पुत्री
तथा जगन्माता सीता को हनुमान् ने देखा । उसने तुरंत सोचा कि ये कदाचित् सीता ही हों ।