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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 508 में से

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पृष्ठ 256

२२६ रंगनाथ रामायण
यों सोचकर वह वृक्ष पर बैठे-बैठे ही रविकुल की रीति तथा राम के पौरुष की भूरि-भूरि
प्रशंसा करने लगा । उसके पश्चात्, यह सोचकर कि यह साध्वी वानरों की भाषा तथा
गीर्वाण (संस्कृत)-भाषा कदाचित् जानती न हो, उसने मानवों की भाषा में उनको संबोधित
करके कहा—'हे भूमिसुते, हे पुण्यसाध्वी, इस प्रकार आप दुःख क्यों कर रही हैं ? आपके
प्रभु सकुशल हैं । जगदीश्वर, राजा राम समुद्र पार करेंगे और रावण का संहार करके अपने
साथ आपको ले जायँगे । यह सत्य है । अपने अनुज लक्ष्मण के साथ अपनी महान् महिमा
प्रकट करते हुए रामचंद्र माल्यवंत में रहते हैं और अनेक वानर-सेनाएँ उनकी सेवा
में लगी हैं ।'
इन वचनों को सुनकर सीता ने सोचा कि यह कोई आकाशवाणी है । उन्होंने
तुरन्त अशोक-वृक्ष की ओर सिर उठाकर देखा । तब उन्होंने सुन्दर नील मेघों के भीतर
दीखनेवाले बालचंद्र के समान तथा विद्युत् के समान, उस वृक्ष की शाखाओं के मध्य,
लघुरूप धारण किये बैठे एक वानर को देखा । तुरंत वे दुःखी होकर कहने लगीं—'हाय
मैंने स्वप्न में एक बंदर को देखा है । भगवान् करे कि इस स्वप्न का अशुभ फल काकुत्स्थ-
वंशजों को न मिले ।' फिर, उन्होंने इन्द्र आदि सभी देवताओं, बृहस्पति, अग्नि तथा सभी
लोक-पालकों की बड़ी भक्ति से प्रार्थना की ।
इसके बाद वे सोचने लगीं—'हम जिसके संबंध में बार-बार सोचते रहते हैं, या
जिसके विषय में प्रायः सुनते रहते हैं, वे ही स्वप्न में हमें दिखाई देते हैं । मैं अपने मन
में राघव के सिवा और किसी विषय के संबंध में सोचती ही नहीं हूँ । पुण्यात्मा मेरे
प्रिय प्रभु, सूर्यवंशज, विमल चरित्रवान् राम से बिछुड़कर विरहाग्नि में तप्त रहने तथा
भयंकर राक्षसियों के द्वारा प्राप्त दुःखों से पीड़ित होने के कारण मैं दिन-रात निद्रा से
वंचित रहती हूँ । किन्तु बिना निद्रा के यह स्वप्न कैसे हुआ ? मैं और एक बार ध्यान से
अशोक-वृक्ष की ओर देखूँ ।'
इस प्रकार, विचार करके उन्होंने अपने मुख-कमल को धीरे से ऊपर उठाया और
बार-बार हनुमान् को देखा । फिर सोचने लगीं—'यह कैसे आश्चर्य की बात है कि कोई
बंदर इस वृक्ष पर कहीं से आकर बैठा है । मानव के समान सुंदर ढंग से इसने मेरे
पतिदेव का कुशल-समाचार सुनाया है और बार-बार प्रिय वचन बोल रहा है । भला,
कहीं वानरों में ऐसी बातें संभव हैं । कई प्रकार से विचार करने पर ऐसा लगता है कि
यह कदाचित् राक्षस की माया ही है । ऐसा सोचकर वे प्रत्युत्तर दिये बिना चुप रहीं।
१३ हनुमान् का सीता को राम की अँगूठी देना
तब पवनकुमार समझ गया कि सीता मेरा विश्वास नहीं कर रही हैं । इसलिए
वह पेड़ से उतर आया और बड़ी भक्ति के साथ सीता को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर
कहने लगा—'हे कल्याणी, आप मेरा विश्वास कीजिए । मैं आपको आपके पति से मिलाने
के लिए आया हुआ सेवक हूँ । आपको मुझ पर विश्वास हो जाय, इसी उद्देश्य से राम ने
यह अंगूठी देकर मुझे भेजा है ।' इतना कहकर हनुमान् ने राम की अंगूठी उन्हें दिखाकर
प्रणाम किया । तब सीता हनुमान् को देखकर बोलीं—'हे अनघ, निशाचरों की मायाओं से