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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 508 में से

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पृष्ठ 255

सुन्दरकाण्ड २२५
गिरे हुए रावण के निकट पहुँची और उसने उनके सिर काट डाले है । फिर उसने वडे
वडे गधे जुते हुए रथ में उन्हें रख दिया और उस रथ को दक्षिण दिशा की ओर ले गई ।
उसके पश्चात् मैने देखा कि कुभकर्ण एक ऊँट पर चढकर दक्षिण की ओर जा रहा है ।
सुंदर ढंग से विलसित होनेवाले अपने तोरणो के साथ, लका समुद्र में डूव गई है । सभी
राक्षस तैल-धाराओ में डूवे हुए पडे है । विभीषण धवल छत्र धारण करके एक हाथी पर
विनय से बैठा हुआ है । इसलिए हे दानवियो, अब रावण का मरण, और रघुराम की विजय
निश्चित ही समझो । अत, तुम इस भूमिसुता को न अपशब्द कहो, न उन्हें सताओ ही ।
तुम सव अब यहाँ से हट जाओ ।” उसकी वातें सुनकर सभी दानवियाँ वहाँ से हट गईं
और थकी रहने कारण जाकर सो गईं ।
उस समय सीता भय तथा दुख से काँपती हुई, दो मास में उन्हें मार डालने की जो
आज्ञा रावण ने दी थी, उसके बार-बार स्मरण से ही भयभीत हो उठी । वे अशोक-वृक्ष की
शाखा के सहारे उठकर खडी हुई, और अपनी चंचलता के कारण वन में मार्ग खोई हुई
वालिका के समान विलाप करने लगी । वे कहने लगी—‘हाय भगवान्, क्रूरता के साथ
यहाँ वदी वनाकर मुझे इस प्रकार दुखी वनाना, क्या तुम्हारे लिए उचित है ? क्या ब्रह्मा ने
मेरे भाग्य में यही लिखा है कि मै इस पापी दैत्य के हाथो मरूँ ? ऐसा न होता, तो
राम दण्डक वन में क्यो आते ? स्वर्ण-मृग मुझे भ्रम में क्यो डालता ? यह रावण मुझे वदी
वनाकर दुख ही क्यो देता ? किन्तु में अपने वारे में क्यो सोचूँ ? चन्द्र के समान मुख-
वाले, लोक-रक्षण-कार्य में तत्पर रहनेवाले, मेरे प्रभु रामचन्द्र न जाने घोर वन में सौमित्र
के साथ किस प्रकार दुख से पीडित होते होगे और कैसी दुरवस्था भोग रहे होगे ? पता
नही, उनकी क्या दशा होगी ? न जाने, वे शूर यहाँ कव आयेंगे, कब इम नीच राक्षस
का गर्व चूर करेंगे, और कब मुझे अपने साथ ले जायेंगे । ये सव कार्य कब सिद्ध होंगे ?
और कैसे सिद्ध होगे ? इस दुरात्मा के हाथो मरने से स्वय मर जाना मे अच्छा समझती हूँ ,
किन्तु मुझ पर दया करके विष लाकर देनेवाला भी यहाँ कोई नही है । हे राम,
हे धर्म-निरत, मेरा पातिव्रत्य आज खिन्न हो गया है । मै अब आत्मघात कर लूँगी ।’
इस प्रकार कहती हुई वे अपने केशों को कठ में वाँधकर अपने प्राण देने का उपक्रम करने
लगी । इतने में उनका वाम-नेत्र मछलियो के स्पर्श से हिलनेवाले कमलो के समान फडकने
लगा । मलयानल से चचल होनेवाली वन-लता के समान उनकी वाम भुजा फडक उठी ।
मत्त गज की सूँड की भाँति उस रमणी की वाईं जाँघ भी फडक गई । भयंकर राहु
से मुक्त कुमुद-वधु (चंद्र) के समान उनका मुखचंद्र दीप्त हो उठा । जब इम प्रकार
शुभ शकुन दीखने लगे, तब गजगामिनी सीता ने अपने दुसाहसपूर्ण निश्चय का त्याग कर
दिया । वे रामचन्द्र का, उनके भाइयो का, तथा अपनी सासो का स्मरण करने लगी ।
राक्षसो के द्वारा दिये गये कष्टो से बहुत ही क्लान्त होकर वे अपनी दयनीय स्थिति का
विचार करके दुखी होने लगी ।
१२. हनुमान् का सीता को राघवों का वृत्तांत सुनाना
हनुमान् ने सोचा कि इस साध्वी का दुख शात करने का यही अच्छा अवसर है ।
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