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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 250, कुल 508 में से

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पृष्ठ 250

२२० रंगनाथ रामायण
इस प्रकार सोचकर उसने मन-ही-मन राम तथा लक्ष्मण को वड़ी भक्ति के साथ
प्रणाम किया, वडे उत्साह मे देवताओ की प्रार्थना की और वडे हर्ष से उस भवन से नीचे
उतर आया । उसके पश्चात् उसने एक अगुष्ठ-मात्र का आकार ग्रहण किया और उस अशोक-
वृक्ष के पास पहुँचकर उसपर चढ़ गया । वालक के रूप में वट-वृक्ष के पत्नों में शयन करने-
वाले विष्णु के समान, वह श्रेष्ठ वानर उस वृक्ष की घनी शाखाओ में वड़ी कुशलता के
साथ छिपकर बैठ गया और (उस पुण्यात्मा ने) वडे ध्यान से उस विशालाक्षी को वार-
वार देखने और सोचने लगा- 'ऋष्यमूक पर्वत पर जिन आभूषणो को मैंने देखा था, उनमें
और इनके शरीर पर दीखनेवाले आभूषणो में समानता दीखती है । अत, यह पद्मगंधी,
काकुत्स्थवंशी राम की पत्नी ही होगी ।' इस प्रकार सोचकर वायु-नंदन ने और एक वार
सीता को ध्यानपूर्वक देखा और पाया कि उस रमणी के अग, कर्ण-भूषण, मणिमय कंकण
तथा सुनहले वस्त्र, ठीक उसी प्रकार के थे, जैसे कि राम ने बताया था । उसके अतिरिक्त
उसने उस नारी-रत्न में विरह-व्यथा से पीड़ित होनेवाली स्त्रियो के लक्षण, पतिव्रता
नारियो के शुभ चिह्न और निपुण मानव-स्त्रियो के सभी चिह्न देखे । साथ-ही-साथ उसने
यह भी देखा कि वह साध्वी राम का नाम लेकर कुछ प्रलाप कर रही है । इन सब बातो
पर कुछ समय तक विचार करने के पश्चात् उसने निश्चय किया कि ये सीता ही हैं ।
फिर उनका विवर्ण मुख, कृश गात्र, बिखरे हुए केश, उनकी दुर्दशा, उनका विलाप तथा
उनकी दीनता देखकर वह मन-ही-मन बहुत दु खी हुआ और विचार करने लगा- 'चंद्र से
बिछुड़ी हुई चंद्रिका की भाँति यह चंद्रमुखी रामचंद्र से विलग होकर क्या रह सकती है ?
क्या इस रमणी से बिछुड़कर राम रह सकते हैं ? यह बड़े ही आश्चर्य की बात है कि
इन दोनो के कुल, शील, दाक्षिण्य, गुण, वय, धर्म, तथा सुंदर रूप एक समान हैं । अत
राम के लिए यह रमणी तथा इस युवती के लिए राजा राम सर्वथा उपयुक्त है । इस
कांता के लिए ही तो सूर्यकुलाधिप ने शिव का धनुष ईख की तरह तोड़ा था । जब ये
पीड़ित हुईं, तब वड़ी कठोरता के साथ उन्होने उस कपटी कौए को दण्ड दिया था । जिस
विराध ने पहले इनपर आक्रमण किया था, उसका वध किया था । इन्हीं के लिए उन्होंने
शूर्पणखा के नाक और कान कटवाये, खर और दूषण आदि राक्षसो का संहार किया,
मारीच को मृत्यु के मुँह में भेजा, वालि को एक ही शर से मार डाला और कपियो को
चारो दिशाओ में भिजवा दिया । मैं उन कपियो में अपने को बड़ा बलवान् समझकर,
उस पुण्यात्मा काकुत्स्थवंशी राम के सामने यह कार्य-भार अपने ऊपर लेकर, अंगद आदि
वानरो के साथ मैं यहाँ आया । अपने पुण्य-फल के प्रताप से और अपनी इच्छा के अनुसार
ही इस पुण्य सती को मैं यहाँ आकर देख सका । भयंकर असुर-स्त्रियो के मध्य, यातनाओ
में पड़ी हुई इस स्त्री-रत्न को में अपना रूप किस प्रकार दिखाऊँ ? किस प्रकार मैं इससे
वार्तालाप करूँ ? इस पुण्य साध्वी को कैसे सांत्वना दूँ ? किस प्रकार प्रभु को यहाँ की
दशा सुनाऊँ ?'
७ सीता से रावण का प्रलाप
हनुमान् मन-ही-मन इस प्रकार की चिंताओ से व्याकुल होता रहा । वहाँ रावण जानकी