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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 245, कुल 508 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 245

तब हनुमान् अविचल खडा होकर बोला—'तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है ?
तुम क्यो मेरे मार्ग को रोककर खडी हो ? पहले तुम अपना परिचय दो, तो फिर मै अपने
वारे में कहूँगा ।' तब वह बोली—'मै दशकठ की आज्ञा से, बडे यत्न से इस नगर की
रक्षा करती रहती हूँ । मेरा नाम लकिणी है । जब मैं पराये व्यक्तियो को देखती हूँ, तब
उन्हें नगर के भीतर प्रवेश करने नही देती और उन्हें तुरत मार डालती हूँ । तब हनुमान् ने
उस स्त्री से कहा—'हे नारी, मैं इस नगर को देखने के उद्देश्य से आया हूँ; मुझे जाने
दो ।' तब वह राक्षसी आँखो से क्रोध प्रकट करती हुई बोली—'अब तुम कहाँ जाओगे ?
अब तो तुम मेरे हाथ में पड गये हो । तुम्हें पकडकर तुम्हारे शरीर के टुकडे-टुकडे कर
दूँगी और तुम्हारा रक्त पी जाऊँगी ।' यो कहती हुई उसने बडे क्रोध से उस श्रेष्ठ
वानर के वक्ष पर एक घूँसा मारा । हनुमान् ने सोचा कि स्त्री का वध करना पाप है।
इसलिए उसने लकिणी के वक्ष पर ऐसा घूँसा जमाया कि वह अपनी सारी शक्ति खोकर
पृथ्वी पर गिर पड़ी और हनुमान् को देखकर क्षीण स्वर में प्रार्थना करने लगी—'हे कपि-
कुलोत्तम, मुझपर कृपा करो । जिस दिन इस नगर का निर्माण हुआ, उस दिन निपुण
ब्रह्मा ने कहा था कि जिस दिन एक वानर यहाँ आकर तुम्हें दुख पहुँचावेगा, उसी दिन
से राक्षसो का नाश प्रारभ हो जायगा । इसलिए मुझे विश्वास है कि तुम्हारी मनष्कामना
सफल होगी ।' इस प्रकार कहती हुई वह स्त्री चली गई । उस स्त्री की बातो से हनुमान्
अत्यत हर्षित हुआ और मन-ही-मन यह निश्चय करके कि अब राक्षसो का नाश निश्चित है,
पहली बार लका की धरती पर अपना वाम चरण प्रतिष्ठित किया ।
३ हनुमान् का लंका में सीता का अन्वेषण
फिर हनुमान् ने सूक्ष्म रूप धारण किया और किले की भित्तियो पर चढकर इस
प्रकार लका में प्रवेश किया कि किले के द्वार-रक्षक तथा सैनिक उनको देख न सके ।
फिर गुप्त रूप से मार्गों, बाजारो तथा चौपालो को देखते हुए वह आगे बढा । उसके
पश्चात् बडे-बडे गोपुरो पर चढा और गज-शालाओ से लेकर श्रेष्ठ सौधो के सभी स्थान देखे।
फिर उसने मदिरो में देखा, घर-घर में ढूँढा, तथा अत पुरो में ढूँढा, मडपो और मौघो में
देखा । फिर अश्वशालाओ, रथशालाओ तथा शस्त्रागारो में देखा और मणिमय भवनो में
सीता का अन्वेषण किया । तत्पश्चात् विभीषण, अतिकाय, देवातक और त्रिशिर के घरो
में, कुभकर्ण के विशाल भवन में, कुभ के घर में, निकुभ के निवास में, शोभा-समन्वित
इन्द्रजीत के अत पुर में, महोदर के भवन में और सभी दनुज-नायको के घरो में क्रमश
सीता की खोज की । दैत्यो के इन निवासो को देखकर हनुमान् आश्चर्य-चकित हो गया ।
फिर उसने सभी अत पुरो में सीता को ढूँढा, सभी स्त्री-जनो में देखा, और एक-एक करके
राक्षसो के सभी घर देख डाले । किसी-किसी स्थान पर एक आँख, एक कान, एक हाथ-
वाले विकृत रूपो को देखकर वह चकित रह गया । कही-कही उसने बहुत-से चरण,
अनेक भुजाओ तथा कई शिरोवाले राक्षसो को देखा । फिर वह जप-तप तथा
स्वाध्याय में तत्पर, सत्कर्मी तथा निष्ठावान् तपस्वीश्रेष्ठ दानवो को देखते हुए आगे
बढ़ गया ।