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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

१८६ रंगनाथ रामायण
सुग्रीव को अपनाया है। इसलिए जान पड़ता है कि राम नीतिवान् नहीं है। ऐसी दशा में
राम की मित्रता स्वीकार करना मेरे लिए उचित नहीं है। सुग्रीव अनाथ होकर राम का
सेवक बन गया है। मुझे राम की क्या आवश्यकता है। संधि की क्या आवश्यकता है ?
मैं किसी की प्रार्थना क्यों करूँ ? वह महान् पुरुष तथा धर्मात्मा राम, अकारण ही मेरा
वध क्यों करेंगे ? (तुम्हारी) ये बातें सर्वथा असंगत हैं। मैं अभी जाकर अपने भयंकर
वज्र की समता करनेवाली अपने मुष्टि-प्रहारों से सुग्रीव का वध करके आता हूँ।
तुम निश्चिंत रहो।'
इस प्रकार के वचनों से तारा को संतुष्ट कर इन्द्र-पुत्र वालि अपने पराक्रम, शक्ति
तथा साहस के साथ इस ढंग से (युद्ध के लिए) निकला, मानो कर्मपाश के आकर्षण को
टालने की शक्ति उसमें नहीं रही हो। उसने अपने गर्जन से सभी समुद्रों को क्षुब्ध कर
दिया; भू-वलय को कँपा दिया। उसके बाद वह सुग्रीव को डाँटते हुए भयंकर स्वर में
बोला—'मेरे साथ युद्ध में हारकर, लज्जाहीन हो, फिर युद्ध करने आया है ? कोई बात
नहीं। मैं अभी तुझे यम के मुँह की बरी बनाऊँगा। डींगें मारना छोड़कर तू थोड़ी देर
अटल खड़ा रह। मैं युद्ध में अपने मुष्टि-प्रहारों से तेरे प्राण हरण-करूँगा।'
इस प्रकार कहकर वालि ने वज्र का परिहास करनेवाली, अपनी मुष्टि बाँधकर
उससे ऐसा प्रहार किया कि सुग्रीव नीचे गिरकर रक्त उगलने लगा। तुरत वह सँभल
उठा और साहस के साथ खड़े होकर गर्जन किया और तिरस्कारपूर्ण वचनों से इन्द्र-सुत
की निंदा करते हुए कहा—'मैं अब तक तुम्हारी उद्दण्डता केवल इसलिए सहता आ रहा था
कि तुम मेरे भाई हो और पूज्य हो। ऐसी बात नहीं कि मैं तुमसे युद्ध करने से
डरता हूँ। मैं पहले का सुग्रीव नहीं हूँ। सोच-विचार कर मेरे साथ युद्ध करना। हे वालि,
मैं अवश्य अभी तुम्हारा वध कर दूँगा और कपि-राज्य पर अधिकार करूँगा।'
इतना कहकर सुग्रीव ने अत्यधिक क्रोध से एक साल-वृक्ष को उखाड़कर तेजी से
वालि पर फेंका। उसके लगते ही वालि कंपित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और मूच्छित
हो गया। थोड़ी देर के बाद वालि सचेत होकर दुर्वार गर्व और बड़े शौर्य तथा धैर्य के
साथ एक पर्वत उठाकर उस रवि-पुत्र पर इस प्रकार फेंका कि देवता भी आश्चर्यचकित
रह गये। सुग्रीव ने उस पर्वत को अपनी पूँछ से रोक दिया। तब वालि ने सुग्रीव के
पैरों पर प्रहार किया। सुग्रीव ने अपने तेज नखों से वालि का शरीर नोच डाला। वालि ने
उग्र रूप धरकर सुग्रीव पर मुष्टि का प्रहार किया। क्रमशः दोनों अपनी अमित शक्ति
का प्रदर्शन करते हुए एक-दूसरे की शिखाओं को पकड़कर पदाघातों से, नखों से, मुष्टियों से,
एक-दूसरे पर प्रहार करते हुए, गर्जन करते हुए, हुंकार भरते हुए, घोर युद्ध करने
लगे। उनके अंगों से रक्त की धारा बहने लगी। वे अपनी बाहुओं तथा पूँछों को दूसरों की बाहुओं
तथा पूँछों से फँसाकर, परस्पर धक्का देते हुए, फिर दूर हटते हुए, अपना सारा बल
लगाकर परस्पर प्रहार करने लगे। इस प्रकार अत्यंत भयंकर रीति से जब वे लड़ रहे थे,
तब इन्द्र-सुत वालि के आघातों से रवि-पुत्र सुग्रीव बहुत घायल हुआ। वह गर्व खोकर,
व्याकुल और भयभीत हो, अपने ओठों को आर्द्र करते हुए, दीन दृष्टि से चारों ओर देखने लगा।

किष्किन्धाकाण्ड १८७.
७. वालि का संहार
निग्रह तथा अनुग्रह के निधि राम ने जब देखा कि सुग्रीव अब क्लात तथा खिन्न
हो गया है, तब सोचने लगे कि यदि मैं अब वालि का वध नही करूँ, तो वह अवश्य ही
सुग्रीव को मार डालेगा । तब राम ने सप्त समुद्रो तथा सप्त लोको को क्षुब्ध करते और
समस्त भूतो को कँपाते हुए, अपने धनुष का टकार किया, वालि को तृणवत् मानकर, लक्ष्य
को साधा, और एक अमोघ अस्त्र का सधान करके उसे उस असमान बलशाली वालि पर
चलाया । तब वह वाण अपनी सूर्य-तेज सदृश काति को सारे आकाश-मडल में विकीर्ण
करने तथा भयकर अग्नि-शिखाओ को फैलाते हुए, गरुड, उरग, अमर, गधर्वो को भयभीत
करते हुए ऐसे वेग से चला, मानो अपने पुत्र की रक्षा करने तथा शत्रु को दण्ड देने के लिए
सूर्य ही अस्त्र के रूप में जा रहा हो, अथवा सूर्य-पुत्र होने के कारण यम धर्मराज ने ही
अपने अनुज सुग्रीव की रक्षा करने के लिए, अपना काल-दड वालि पर चलाया हो । वह
वाण सीधे जाकर वालि के उर में लगा । वालि पृथ्वी पर ऐसे गिरा कि दिग्गजो, पर्वतो
तथा वृक्षो के साथ पृथ्वी काँप उठी । वह वाण वालि के उर के पार निकलकर पृथ्वी में
धँस गया । अविरल बहनेवाली रक्त की धाराओ से वानरेश्वर का सारा शरीर भीग
गया और वह इस प्रकार पृथ्वी पर गिरा, मानो पुष्पित अशोक-वृक्ष आँधी में गिर गया हो,
अथवा प्रलय-काल में कातिहीन होकर पृथ्वी पर गिरा हुआ सूर्य हो । तब पृथ्वी पर
विवश पडे हुए उस वालि के पास राम आये ।
अपने समीप पहुँचे हुए रघुराम को देखकर मन-ही-मन कुपित होता हुआ वालि
कहने लगा—'हे राघवेश्वर, हे रामचंद्र, इस पृथ्वी पर लोग आपको धर्मात्मा कहते है ।
आप दम-शम, दया, सत्य, सम-बुद्धि, नीति, सौजन्य आदि सद्गुणो के भाण्डार हैं । ऐसे
होते हुए भी आपने अपनी महत्ता को त्यागकर मेरे और सुग्रीव के युद्ध करते समय
हमारे बीच में आये और मेरे ऊपर वाण चलाया, क्या यह आपके लिए उचित है ?
मैंने आपका कोई अपकार नही किया है । मैने कभी आपकी बुराई नहीं सोची । मै आपका
शत्रु भी नही हूँ। मैं जानता भी नही हूँ कि आपके शत्रुओ ने आपका क्या अहित किया है।
उन बातो को जानकर मैने आपकी उपेक्षा की हो, सो भी नही । फिर भी आपका
ऐसा करना, क्या उचित है ? हे सूर्य-कुल-तिलक, आप जानते हुए भी अनजान बनकर रहे ।
ससार में राजा लोग, शरभ, सिंह, शार्दूल, कोला, गज, हिरण आदि का सहार करने
के लिए मृगया खेलते हैं । भला, कही कोई वानरो का वध भी करता है ? सूर्य-पुत्र तथा मैं,
दोनो भाई-भाई हैं। गर्वाध हो, क्रूर बनकर, हम चाहें जैसा भी आचरण करें, आपका इस
प्रकार मेरा सहार करने का क्या कारण है ? खरगोश, नेवला, कछुआ, जगली सूअर आदि
जानवर खाद्य होते हैं, किन्तु वानर को कोई खाता नही है । फिर आपने आड में छिपकर
क्यो मेरा वध किया ? हे राजन्, अब आप अपने अनुज के साथ मेरे रक्त-मास का भोग
लगाइए । उज्ज्वल कीर्तिवान्, जगद्विख्यात दशरथ की आज्ञा से वन में तपस्वियो का-सा
जीवन व्यतीत करने के लिए आप आये, फिर भी जीव-हिंसा का त्याग नही किया ।
यदि इस पृथ्वी पर रहते हुए हम कोई अपराध करते हैं, तो उसके लिए दण्ड देने का कार्य

१९८ रंगनाथ रामायण ,
भरत का हैं । आपका इससे क्या संबंध हैं ? क्या आप राजा हैं ? आपने मुझे नहीं
अपनाकर मेरा वध कर डाला । अपनी पत्नी को हरकर ले जानेवाले नीच रावण को
जीतने के उद्देश्य से आप आये हैं । आपने मेरी अवहेलना की और सूर्य-पुत्र को अपनाया ।
इस प्रकार आप इस लोक में नीति-रहित-से हो गये । यदि यह समाचार आप मुझे देते,
तो क्या मैं आपकी पत्नी को छुड़ाकर नहीं ला देता ? जो महाबलवान् की तरह आकर
सीताजी को चुराकर ले गया, उसे मैंने अपनी पूँछ की रोमावली से बाँधकर सभी समुद्रों
में डुबोया था और अंत में उसपर कृपा करके उसे छोड़ दिया था । मेरा बाहुबल सारा
संसार जानता है और सुग्रीव भी जानता है । हाय ! मुझे भयभीत करके मार डालने की
शक्ति रखनेवाले आप, मेरे सामने खड़े होकर, मुझे ललकार कर, मुझपर आक्रमण
करके मार न सके । भय से आड़ में छिपकर आपने मुझे मारा । क्या यही
राजधर्म है ?'
बालि के इन वचनों को सुनकर राम ने कहा—'हे बालि, ये बातें तुम्हें शोभा नहीं
देतीं । तुम कपि के वंश में पैदा हुए और कपियों के बीच में पले हो । धर्मशास्त्र की
नीति न जानते हुए भी वाचाल के समान मेरे दोष गिना रहे हो । यह न्यायसंगत नहीं है ।
तुमने जो वचन कहे, उनके प्रत्युत्तर में मेरी कुछ बातें ध्यान देकर सुनो । संसार के
धर्माचार्यों की सम्मति है कि अग्रज को चाहिए कि वह अपने अनुज को अपने तनुजवत्
(पुत्रवत्) पाले । तुमने उस नियम का उल्लंघन किया । निरपराध सूर्य-पुत्र को तुमने
नगर से निर्वासित किया । ऐसा कामांध, तुम्हारे सिवा इन तीनों लोकों में और कौन हो
सकता है । दूसरी बात यह है कि जब हम दोनों (मैं और सुग्रीव) मित्र हैं, तो तुम मेरे
मित्र के शत्रु होने के कारण तुम्हारा वध करना मेरे लिए उचित ही था । मृगया खेलने-
वाले निष्कलंक राजा, सजातीय पशु-पक्षियों की सहायता से मृगों का शिकार करते हैं, या
एक मृग को किसी दूसरे के साथ लड़ते समय उसको मारते हैं, या झाड़ी में छिपकर
उसका शिकार करते हैं या जाल फैलाकर मारते हैं, या अकारण ही मारते हैं, या आड़ में
खड़े होकर शिकार खेलते हैं, या कटघरा सजाकर शिकार खेलते हैं । इसलिए मुझे किसी
भी प्रकार से इसका दोष नहीं लगेगा । तुम तो शाखा-मृग ठहरे । तुम्हारा वध मैं किसी
भी प्रकार करूँ, तो उसका दोष मुझे क्यों लगेगा ? अपने श्रेष्ठ बाहुबल से समस्त जगत्
के स्वामी (बने हुए) भरत की आज्ञा से हम दुष्ट मृग तथा राक्षसों का वध करते रहते हैं ।
तुम अपने अनुज की पत्नी को बलात् छीननेवाले पापात्मा हो । इसलिए हमने तुम्हारा
वध किया । राजाज्ञा से दण्डित व्यक्ति नरक के संकटों को प्राप्त नहीं होते । इसलिए
तुम दुःखी न होओ और स्वर्ग-सुख को प्राप्त करो ।'
रघुराम के इन वचनों को सुनकर बालि थोड़ी देर तक आँखें बंद किये हुए विवश
पड़ा रहा और उसके पश्चात् कांतियुक्त पूर्णचंद्र रामचंद्र को देखकर कहा—'हे शुभ नाम-
वाले राम, हे भयंकर किरणवाले, हे चंद्रसम मुखवाले, मेरी पत्नी तारा ने आप प्रभु के
शौर्य का परिचय देकर मुझसे अनुरोध किया था कि आप युद्ध में मत जाइए । मैंने अपनी
दुर्बुद्धि के कारण, विधि की प्रेरणा से, उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया और आपसे शत्रुता

किष्किन्धाकांड [१८९]

करके इस प्रकार पृथ्वी पर पडा हुआ हूँ । क्रोध के आवेश में मैंने मूर्ख हो, आपको अप-
शब्द कहे हैं । आप मुझे क्षमा कीजिए । हे राजन्, मैं अपनी दुर्दशा की चिन्ता नही
करता, तारा के लिए भी चिन्ता नहीं करता, किन्तु अपने पुत्र अगद के लिए मैं व्याकुल
हो रहा हूँ । मेरी पत्नी और पुत्र की न जाने क्या दशा होगी । मैंने नही सोचा था कि
मेरी ऐसी दुर्दशा होगी।' इस प्रकार कहते और शोक तथा मोह-रूपी समुद्र में डूबे हुए
(मूक की तरह) मूर्च्छित हो पडा रहा ।
यह समाचार जब (वालि के) रनवास में पहुँचा, तब तारा आदि स्त्रियां वालि के
वध का हाल जानकर अधीर हो उठी और उनके हृदयो पर वज्र के समान आघात हुआ ।
वे सब पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी । वे एक क्षण होग में आती, फिर दूसरे ही
क्षण मूर्च्छित हो जाती । वे अत्यधिक सतप्त हो, वालि का नाम ले-लेकर पुकारती हुई
चिल्ला-चिल्लाकर विलाप करने लगी--'हे अगद, हाय, आज वालि का स्वर्गवास हो गया है।'
फिर वे अत्यधिक शोक में डूबी हुई उच्च स्वर में रोती हुई अगद को साथ लेकर
किष्किंधा नगर से बाहर निकली । चलते समय उनके पैर लडखडाने लगे, उनके अंचल
खिसक गये, उनकी वेणियाँ खुल गईं, होठ कंपित होने लगे, आँखो से अश्रु-धारा बहने लगी
और उनकी क्षीण कटियाँ इधर-उधर हिलने लगी । इस प्रकार जब वे आ रही थी, तब
मार्ग में ही वानरो ने उन्हें सूचना दी कि राघव के हाथो से वालि का वध हो गया है ।
अब तुमलोग क्यो जा रही हो ? यदि वहाँ जाओगी, तो अवश्य कोई-न-कोई विपत्ति
आयगी । क्या तुम नही जानती कि राम तथा सुग्रीव मिल गये हैं । न जाने, वे इस अगद
को पकड़कर क्या करेंगे ? हमें शत्रुओ के मन का विश्वास नही करना चाहिए । अत.
हम अब अगद को ही अपना राजा बनायेंगे । वैसे तो हमारे यहाँ अनेक बुद्धिमान्
मन्त्री हैं । तुम वहाँ मत जाओ ।'

८. तारा का शोक

तब तारा, औचित्य का विचार करके, उन कपियो की बार-बार निंदा करती हुई
बोली—'यदि मैं अपने प्राणनाथ वालि को न देख सकूँ तो मुझे यह अगद किस लिए और
यह राज्य ही किस लिए है ?' इस प्रकार उनकी बातो की परवाह न करके, वह चन्द्रमुखी
तारा मन-ही-मन वालि का स्मरण करती हुई अपने कुचो को देखकर अत्यत शोक-सतप्त
होकर कहने लगी—'दूर से ही अमरैन्द्र-पुत्र का आगमन देखकर, यत्न करके, उनके निकट
पहुँचकर, रति-क्रीडा की अभिलाषा करके उनसे टकराते रहने के कारण ही तो आज तुम
उस सुरराज के पुत्र को खो बैठे । अपने किये का फल तुम अब भोगो ।' यो कहकर
अत्यधिक क्रोध से वह अपनी छाती पीटने लगी । उमडते हुए शोक से जब वह चलने लगी,
तब उसके हार छिन्न-भिन्न होकर गिरने लगे । वेणी खुल गई । जैसे कमल में मकरद
भरता है, वैसे ही उसकी आंखो से अश्रु गिरने लगे । वह पवन के वेग से वालि के निकट
पहुँच गई और तरु से टूटकर गिरनेवाली पुष्प-लता के समान वालि पर जा गिरी और
बार-बार परितप्त होती हुई इस प्रकार विलाप करने लगी—'हे कपिकुलाधीश, हे कपि-
राजचंद्र, हे कपिराजशेखर, हे कपिसार्वभौम, समस्त मृगसुर-समूहों में तुम अवलक शक्ति-शाली हो,

१६० रंगनाथ रामायण,
तुम विन्ध्याद्रि को उखाड़कर फेंकने तथा उन्हें व्याकुल करने में समर्थ हो,
तुम महाबलशाली, त्रिभुवनों के पालन करनेवाले, कुल-पर्वतों को भेदनेवाले (इन्द्र) के
पुत्र हो । कोलंबु नामक क्रूर गंधर्व का संहार करनेवाले युद्ध-वीर तुम ही तो हो । ऐसे
तुम, एक मानव के हाथों से ऐसी नीच मृत्यु को प्राप्त हुए । अब में क्या कहूँ ? सूर्य-पुत्र
तुम्हारा सामना करने की शक्ति नहीं रख सकने के कारण तुम्हें युद्ध में मारने के लिए
राम को साथ लेकर आया था । मैंने तुम से कहा था कि राम को जीतना असंभव है;
तुम युद्ध में मत जाओ । मेरी वात तुमने नही मानी, मेरा सर्वस्व तुमने हर लिया ।
मैंने कहा कि वह महात्मा विष्णु ही हैं, उनके निकट मत जाओ । यह भी कहा कि वह
महान् शूर हैं, तुम अपना प्रताप त्याग दो । तुमने नही जाना कि राम तुम्हारा संहार करने
आया हुआ यम ही है । तुमने उनसे दुख पाया । जब समुद्र का मंथन करते-करते देवासुरों
की सारी शक्ति शिथिल हो गई थी और वे क्लान्त होकर पड़े हुए थे, तब तुम्हारी जिन
भुजाओं ने वासुकि को मंदर पर्वत से लपेटकर, समुद्र का मंथन करके तीनों लोकों में
अपनी श्रेष्ठ शक्ति का परिचय दिया था, वे ही आज धूलि से सनी हुई हैं । महान् शक्ति-
शाली राक्षसराज (रावण) को अपनी दृढ़ मुष्टि में पकड़कर उसको व्याकुल करते हुए
सभी समुद्रों में डुबोनेवाली तुम्हारी पूँछ आज मिट्टी में लोट रही है । नीलकंठ के
श्रीचरण-कमलों में भ्रमर के समान झुकनेवाला तुम्हारा सिर आज निरी पृथ्वी पर पड़ा है ।
है हृदयेश्वर, मै तुम्हें छोड़कर जीवित नही रह सकती, जहाँ तुम जाओगे, वही मै भी
जाऊँगी । इस वेदना को सहना मेरे भाग्य में लिखा था । मैं अपनी अनाथ अवस्था के
कारण दुखी नहीं होती । है इन्द्र-नदन, मै आपके प्रिय पुत्र के लिए शोक करती हूँ ।
है स्वामिन्, तुम्हारा पुत्र धूल में सने हुए तुम्हारी गोद में लोट रहा है । उसे क्यों नही अपनाते ?
है राजन्, अपने पुत्र अंगद को अपनी जाँघों पर बैठाकर, प्रेम से उसका सिर सूँघकर,
उसके गालों पर हाथ फेरकर, उसे चूमते हुए, उसको रोने से क्यो नही रोकते ?'
इस प्रकार विलाप करती हुई और उमड़ते हुए शोक से उसने सुग्रीव को संबोधित
करके कहा—'वालि के सामने खड़े रहने की क्षमता न रखने के कारण, कई बार कायर
के समान तुम भाग गये और अनाथ की तरह जाकर राघव को साथ ले आकर कपट-
विजय के बाद तुमने किष्किंधा को जीता । तुमने जो चाहा, वही हुआ । तुम्हारा प्रतिशोध
पूरा हुआ । अब कपियों का राज्य लेकर उसका पालन करो । संधि की वातें (मित्रता
की वातें) करके राघव को यहाँ लाने के लिए हनुमान् तो तुम्हारे साथ हैं ही । मंत्रणा
के लिए तुम्हारे पास नल, नील तथा तार भी हैं । (अब तुम्हें किस बात की कमी है ?)'
इसके पश्चात् उस कमलाक्षी ने रघुराम को देखकर कहा—'हे राजन्, आपने वालि
का संहार क्यों किया ? हे रघुराम, क्या वालि ने आपकी ऐसी दशा कर देने के लिए
(वनवास की आज्ञा देने के लिए) आपके पिता को परामर्श दिया था ? हे रघुराम, क्या
वालि आपके राज्य-सुख को छीननेवाला भरत था ? क्या वालि दुष्टता करके आपकी
पत्नी को चुराकर ले जानेवाला रावण था ? आपने वालि से अकारण वैर ठानकर इस
प्रकार उसका संहार क्यों किया ? आप-जैसे पुण्यात्मा, आप-जैसे प्रभु और, आप-जैसे करुणानिधिको

किष्किन्धाकाण्ड १९१
क्या ऐसा करना उचित है ? क्या जानकी के साथ आपका विवेक भी चला गया ?
क्या घोर विरहाग्नि में आपका ज्ञान भी जल गया ? हे राजन्, मेरा भाग्य ही
आज ऐसा हो गया है। अब मैं क्या करूँ ? होनहार को मैं कैसे दोष दूँ ? मैं वालि को
छोड़कर नहीं रह सकती । हे देव, आप मेरा भी वध कर डालिए।'
इस प्रकार विलाप करती हुई वह अपनी छाती और मुँह को पीटती हुई रुदन
करती रही । तब हनुमान् ने तारा को देखकर कहा—'क्या ऐसी कोई धर्म-नीति है, जिसे
तुम नहीं जानतीं ? युद्ध में स्वर्ग को प्राप्त होनेवाले वीर वालि के लिए इस प्रकार तुम
शोक क्यो करती हो ? ये सब कार्य भगवान् की इच्छा के अनुसार चलते हैं।' इस प्रकार
वह नीति-विलक्षण (हनुमान्) वार-वार तारा को समझाता रहा ।
९. वालि का सुग्रीव को उपदेश देना
इतने में अमरेन्द्र-पुत्र ने आँखें खोलकर अपनी पत्नी का अवर्णनीय शोक तथा अंगद
के उससे भी अधिक कठोर दुख को देखा और फिर सूर्य-नदन को सबोधित करके कहा—
'हे भ

१६२ रंगनाथ रामायण
अंत नहीं है । प्राणों के जाते समय आपने यहाँ पधारकर मुझे दर्शन दिये । परलोक में
जाने पर ही जिसके दर्शन संभव होते हैं, (उनके दर्शन) मैंने अभी प्राप्त कर लिये हैं ।
मैं कृतार्थ हुआ । हे सूर्य-वंश-तिलक, हे परमकल्याण-रूप, अब मेरे प्राण नहीं बचेंगे ।
कृपया यह बाण (मेरे शरीर से) निकालिए ।' राम की आज्ञा पाकर नील ने उस दिव्य
बाण को वालि के शरीर से बाहर निकाला । तब वालि ने पवन की गति को अपने
शरीर में रोककर, उस रुद्ध पवन की सहायता से अपनी चित्त-वृत्ति को निश्चल बनाकर,
उस सुंदरमूर्ति श्रीराम को मन में धारण करके, ब्रह्मानंद का अनुभव करते हुए ब्रह्मरन्ध्र के
द्वारा अपने प्राण छोड़ दिये ।
तब तारा आदि स्त्रियाँ वालि के शरीर पर गिरकर बार-बार हाहाकार करती हुईं
विलाप करने लगीं । अंगद, सुग्रीव तथा वहाँ के सभी कपि-पुंगव 'हाय, वालि तुम हमें
छोड़कर चले गये !' कहते हुए विलाप करने लगे । तब सौमित्र ने सुग्रीव तथा अन्य
कपियों को सांत्वना देते हुए कहा- हे हनुमान्, तुम तुरंत वस्त्र, माला, कर्पूर, चंदन आदि
मँगवाओ । हे तारे, स्वर्ण तथा रत्नों से निर्मित शिविका शीघ्र मँगवाओ ।' उन्होंने वैसा
ही किया । सभी वनचर वहाँ पहुँच गये । सूर्य-पुत्र ने तारा आदि स्त्रियों का दुःख शान्त
किया । रामचन्द्र की आज्ञा प्राप्त करके सुग्रीव, अंगद, हनुमान् आदि ने वालि की उत्तर-
क्रियाएँ यथाविधि समाप्त कीं । दस रात्रियों तक शेष क्रिया-कर्म पूरे किये और परिशुद्ध
होकर रामचंद्र के सम्मुख उपस्थित हुए ।
१०. सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाना
तब राम ने अत्यंत हर्ष से उन कपि-नायकों को देखकर कहा—'अब तुमलोग मेरा
आदेश मानकर किष्किंधा नगर को सजाओ और कपिराज के सिंहासन पर सुग्रीव का राज-
तिलक करो तथा अंगद को युवराज के पद से अभिषिक्त करो ।' तुरन्त सभी वानर-दण्ड-
नायक एकत्र होकर किष्किंधा चले आय । उन्होंने सारा नगर सुंदर ढंग से सजाया ।
सारा नगर, नूतन शृंगारों से सुसज्जित भवन, रत्नों की वेदियाँ, रमणीय हीरों के चौकों
से अलंकृत द्वार, सुरम्य ध्वजाएँ, विशाल तथा सुगंधित जल से सिक्त राज-मार्ग तथा उनमें
संचार करनेवाले निरुपम सुंदराकार पुरजनों से परिपूर्ण दीखने लगा । उन्होंने राजसभा का
भी अलंकार किया, मानो वह अत्यधिक ऐश्वर्य-रूपी समुद्र का आवास हो । नद तथा
नदियों का जल मँगाया और विविध मंगल-द्रव्यों को एकत्र किया । इसके पश्चात् उन्होंने
सुंदर पुण्य मुहूर्त्त में पुण्याह वाचन का उच्चारण करते हुए कपिसिंह (सुग्रीव) को सिंह के
चर्म से अलंकृत सिंहासन पर बिठाया और जिस प्रकार देवता इन्द्र का अभिषेक करते हैं,
वैसे ही उज्ज्वल तथा पवित्र ढंग से श्रेष्ठ वानरों ने सुग्रीव का राज्याभिषेक किया। पुण्य-
स्त्रियाँ रत्नों की वर्षा करने लगीं । तदनंतर उन्होंने अंगद को युवराज के पद पर प्रतिष्ठित
किया । तब सारे अंतःपुर तथा नगर में अत्यधिक आनंद छा गया । नल, नील, तार,
हनुमान् तथा सगे-संबंधी सुग्रीव से बड़े प्रेम से मिले । अन्य वानर-राजाओं ने हाथ जोड़कर
बड़े हर्ष से उसकी प्रशंसा की । तब सुग्रीव ने अपनी विशाल संपत्ति को प्राप्त करके, बड़ी
प्रसन्नता से रत्न-राशि वानरों को भेंट की । तत्पश्चात् सुग्रीव ने अपनी वानर-सेना के

किष्किन्धाकाण्ड [Right: १६३]

साथ रामचंद्र के निकट पहुँचकर बडी भक्ति से उनके चरणो में प्रणाम किया और हाथ
जोडकर बडे प्रेम तथा आनद से कहने लगा—'हे विश्वेश, अब आपको यहाँ ठहरने की
क्या आवश्यकता है ? आप कृपया मेरे नगर में पधारें।'
११. राम का माल्यवंत पर पहुँचना
तब राम ने सुग्रीव को देखकर बडे प्रेम से कहा—'हे सूर्य-पुत्र, तपस्वियो को नगरो
में निवास नही करना चाहिए, इसलिए किष्किन्धा नगर हमारे रहने योग्य नही है । आषाढ
का महीना आ गया है, अत शत्रुओ पर आक्रमण करने के लिए यह समय अनुकूल नहीं है।
मैं वर्षाऋतु में किसी तरह माल्यवंत पर अपने दिन व्यतीत करूँगा । तुम किष्किन्धा
में जाकर रहो । शरत्काल के आते ही हम शत्रुओ पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान
करेंगे।' इन वचनो को कहकर राम ने उसे बड़े आदर के साथ विदा किया और उस
स्थान को छोडकर वे अपने अनुज के साथ माल्यवत पर्वत पर जा पहुँचे ।
पर्वत पर पहुँचकर राम कुसुम सदृश कोमल सीता के गुण, वय तथा असमान रूप-
विलास को मन-ही-मन सोचते हुए अत्यधिक दुख में मग्न हो रहे ।
उस समय आकाश में, सूर्य के प्रकाश को ढँकते हुए बादल इस प्रकार घिर आये,
जैसे सीता के वियोग से दुखी होनेवाले राम को घेरकर दुख बार-बार आता था । बादलों
में से निकलकर बिजली इस प्रकार जहाँ-तहाँ अपनी चचलता दिखाने लगी, मानो वह बता
रही हो कि रावण का राज्य राम के द्वारा विचलित हो जायगा । वायु के साथ धूल इस
प्रकार आकाश की तरफ उड़ने लगी, मानो पृथ्वी देवताओ को इस बात की सूचना देने
जा रही हो कि इक्ष्वाकु-वल्लभ (राम) देवलोक के शत्रु (रावण) पर आक्रमण करने जा
रहे हैं । आकाश में इंद्र-धनुष इस प्रकार सुशोभित हो रहा था, मानो युद्ध में राक्षसो का
वध करने के लिए यम ने अपने हाथ का काल-पाश भेज दिया हो । आकाश में जहाँ-तहाँ
मँडराते हुए मेघ ऐसे गर्जन कर रहे थे, मानो राम की सहायता के लिए देवताओ की भेजी
हुई सेना, भेरी-निनाद कर रही हो । प्रथम वर्षा की बूँदें जहाँ-तहाँ इस तरह गिरने लगीं,
मानो वर्षाकाल-रूपी पुरुष के, आकाश-लक्ष्मी से बड़े प्रेम से भेंट होने पर, उसके (मोतियो
के) हार टूटकर उसके मोती पृथ्वी पर गिर रहें हो । जहाँ-तहाँ धरती के भीतर से भांप
इस प्रकार निकलने लगी, मानो (राक्षस के हाथो में) फँसकर कैद में पड़ी हुई अपनी पुत्री
का स्मरण करके धरती माता दुख से पीडित होकर नि श्वास छोड रही हो । आकाश में
उमड-घुमडकर दौडनेवाले बादलो को देखकर चातक पक्षी ऐसे फूल उठे, मानो राम-लक्ष्मण-
रूपी मेघो को देखकर सुर-लोक के चातक आनद से फूल उठे हो । मेघ के 'घर-घर' गर्जन
के साथ लय मिलाकर मयूर केका करते हुए इस प्रकार नृत्य करने लगे, मानो मर्दल की
'धी-धी-घप' की ध्वनि से लय मिलाकर नर्त्तकियां संगीत के साथ नृत्य कर रही हो । भयंकर घोष
करते हुए वज्र पर्वत के शिखरो पर इस प्रकार गिरने लगे, मानो वे यह प्रकट कर रहे हो
कि राक्षसो के अगो पर राम के बाण इसी प्रकार गिरेंगे । अत्यधिक अरुण वर्ण धारण
करके इद्रगोप (वीरबहूटी) पृथ्वी पर इस प्रकार बिखर गये, मानो वे यह प्रकट करते हों
कि राक्षसराज के शरीर के मास के टुकड़े इसी प्रकार रण-भूमि में बिखर जायेंगे ।
२५

१६४ रंगनाथ रामायण
ओले इस प्रकार पृथ्वी पर गिरने लगे, मानो रावण का सहार करते समय देवता हर्षित
होकर दिव्य पुष्पो की वृष्टि करेंगे । राजहसो का झुड इस प्रकार धीरे-धीरे
वहाँ से क्रौंच-गिरि पर चले गये, मानो राम के प्रताप के कारण रावण की कीर्त्ति-परंपरा
लुप्त हो जायगी । सूर्य के चारो ओर का परिवेश ऐसा दीखने लगा, मानो उसने इस विचार
से अपने चारो ओर एक सुदृढ प्राचीर बना लिया हो कि मेरे पुत्र सुग्रीव ने युद्ध में इन्द्र
के पुत्र को मरवा डाला है, इसलिए इन्द्र मेरे ऊपर क्रोध न करें । वर्षा की वारा ऐसी
दीखने लगी, मानो अघट उत्साह से आकाश-गंगा में स्नानार्थ गई हुई नाग-कन्याएँ फिर से
रसातल को लीट रही हों । मेढक जहाँ-तहाँ ऐसे अद्भुत ढंग से स्वर-भेद दिखाते हुए टर-
टराने लगे, मानो वे उस महान् व्यक्ति की भूरि-भूरि प्रगसा कर रहे हों, जिसने उन्हें
प्रचुर मात्रा में जीवन-दान किया है । सारी बरती पर नीला पंक ऐसा दीख रहा था,
मानो मेघों ने वर्षाऋतु-रूपी वधू के गरीर पर कस्तूरी लपेट दी हो । जल-प्रवाह जहाँ-
तहाँ के तालावो में इस कारण से ठहर गया, मानो वह यह सोचकर डर रहा हो कि
समुद्र में मिल जाने से श्रीराम के बाणो की अग्नि से तप्त होना पड़ेगा । बडी-बडी नदियो
का जल इस प्रकार भँवरो में चक्कर काटता हुआ घोर शब्द करता हुआ, समुद्र में प्रवेश
कर रहा था, मानो वह भयभीत हो कह रहा हो कि लोक-कंटक राक्षस को मैने अपनी
गोद में स्यान दिया है; काकुत्स्य-वंशज राम मुझे वधन में डालेंगे ।
कुछ दिनों में वर्षा समाप्त हुई, आकाश में दीखनेवाले मेघ विलीन हो गये ।
अपनी किरणो को सारे लोको में फैलाते हुए सूर्य सर्वत्र प्रकाशमान होने लगा । पृथ्वी
कीचड़ से रहित हो गई । सरोवरों में कमल सुंदर रूप से दीखने लगे । मत्त गज अपने
दाँतो से टीलों को खोद-खोदकर मिट्टी उछालने लगे । रात्रि चन्द्रिका तथा नक्षत्रों से
सुगोभित हो उठी । हंस सरोवरों में निवास करने के लिए लौट आये और मृणालो का
भक्षण कर संतुष्ट हुए । ईख, लाल-लाल धान तथा पकी फसलें प्रचुर हो गईं । वृषभ-
समूह गर्जन करने लगा । जल का गँदलापन दूर हो गया और वह स्वच्छ दीखने लगा तथा
यात्रियो को (इससे) सुख मिलने लगा । आवाश में मेघ निर्मल दीखने लगे । जल कम हो
जाने से नदियाँ पार करने योग्य हो गईं ।
इसके कुछ दिन पूर्व हनूमान सूर्य-पुत्र से मिलकर कहने लगा--'शरत्काल आ गया है,
अब श्रीराम का कार्य संपन्न करना चाहिए । अत सब वानर-राजाओ को बुला भेजो।'
तब रवि-पुत्र ने अपने सेनापति नील को बुलाकर कहा—'विविध पर्वत, नदी तथा द्वीपो
के राजाओ, वानर, लगूर तथा रीछ-राजाओ को बुला भेजो । जो नही आवे, उसे भी आदेश
भेजकर बुला लेना ।'
यहाँ राम ने अनुज की सहायता तथा सांत्वना प्राप्त करते हुए, दुख से पीडित होते
हुए जैसे-तैसे वर्षाकाल को समाप्त किया । शरत्काल का आगमन होते ही कोमलागी
सीता का स्मरण-मात्र से उनके मन में विविध इच्छाएँ उत्पन्न हुईं । मदनातुर हो वे भ्रमित
मन से उदयाद्रि पर स्यित उडुपति को देखकर कहने लगे—'यह कैसा उत्पात है ? यह
कंसी रीति है ? रात्रि के समय सूर्योदय क्यो दुआ ? मेरे शरीर का ताप दुगुना हो

किष्किन्धाकांड १८४
गया है। हे सौमित्र, मुझे पेड़ की छाया में ले चलो ।' तब लक्ष्मण ने कहा-'हे देव,
यह चंद्र है, सूर्य नही । वह देखिए, उसमें हिरण का चिह्न दिखाई दे रहा है।' लक्ष्मण
की बातें सुनकर वे व्याकुल हो कह उठे-'हाय ! हिरण की-सी आँखोंवाली (हमसे )
बिछुड़ गई हैं', और मूर्च्छित हो गये ।
लक्ष्मण ने दाशरथि का शीतलोपचार किया और उनकी मूर्च्छा दूर की । तब राम
संभलकर बोले-'अब हमें तुरंत लंका पर आक्रमण कर देना चाहिए । हे सौमित्र, देखा
तुमने ? सूर्य-पुत्र हमसे क्या कहकर गया था ? वर्षाकाल के समाप्त होते ही आने का
वचन दिया था । वर्षाकाल तो समाप्त हो गया, किन्तु वह आया नहीं है । कदाचित् वह
मेरे किये उपकार को भूलकर तारा के साथ रति-क्रीडा में मग्न रहता हो या राज्य-मद में
अपने आपको भूलकर पडा हो । अन्यथा मेरे कार्य के सबंध में वह अपने मन में सोचता
क्यो नहीं है ? हम इस कृतघ्नता को सहते हुए विलंब क्यो करें ? विबुध जनो का कहना है
कि उपकार को भूल जानेवाले, वचन भंग करनेवाले और अपने मित्र का कार्य नहीं
करनेवाले अधम पुरुष होते हैं । तुम शीघ्र जाकर सुग्रीव को बुलाओ। यदि वह आने से इनकार
करे और अकडता हो, तो उससे कह देना कि जिस शर ने वालि का संहार किया था,
वह कही गया नहीं है । अच्छा, अब तुम जाओ ।'
१२. लक्ष्मण का किष्किंधा में जाना
तब लक्ष्मण ने अपने अग्रज को प्रणाम किया और आँखो से अग्नि-कण उगलते हुए
अपने श्रेष्ठ धनुष-वाण लेकर, लंबे-लंबे डग भरते हुए चले । वे ऐसे लंबे डग भरते हुए जा
रहे थे कि पृथ्वी थर-थर कांपने लगी और उनके पवन-सम वेग के कारण सभी वृक्ष टूटकर
गिरने लगे । वे पुण्यात्मा जब किष्किंधा पहुंचे, तब सभी कपि भयभीत हो जहाँ-तहाँ भागने लगे ।
किले के फाटक पर रहनेवाले वानरो ने यह सोचकर कि न जाने यह कौन है,
तुरंत किले के किवाड बंद कर दिये और वानर-समूह को फाटक की रक्षा के लिए नियुक्त
करके, उसका समाचार अपने राजा को सुनाने के लिए भयभीत होकर दौडे । राजमहल में
पहुँचकर उन्होने हाथ जोडकर तारा की परिचारिकाओ से सारा समाचार कह सुनाया ।
परिचारिकाओ ने, यह सोचकर कि राजा को समाचार देने के लिए यह उचित समय नही है,
अगद के पास जाकर हाथ जोडकर कहा- 'हे विख्यात तेजस्वी युवराज, हमारे किले के
फाटक पर कोई महाबलशाली मुनि-वेश में जटा-वल्कल धारण किये, हाथ में धनुष-वाण
लिये हुए यम के समान आकर खड़ा हुआ है ।' तब अगद ने मन-ही-मन निश्चय कर
लिया कि अवश्य राम के भाई होगे । उसने तुरत फाटक पर आकर लक्ष्मण को देखा ।
तब लक्ष्मण ने उसे देखकर कहा-'हे अगद, मेरे आगमन का समाचार सूर्यपुत्र को (सुग्रीव
को) सुना दो ।'
अंगद तुरंत उस सुग्रीव के पास पहुँचा, जो मन्मथ के विकार-सागर में निमग्न
पडा था । रूमा अपने कर-पल्लवो से उनके चरणो को दबा रही थी । तारा तथा मूदूर
उसके तकिये के समान बैठी थी । इस प्रकार के सुख-भोग में निमग्न सुग्रीव को देखकर
अंगद ने कहा- 'लक्ष्मण हमारे किले के फाटक पर, क्रोधाग्नि में जलते हुए खडे हैं ।'

१६६ रंगनाथ रामायण
सुग्रीव ने शकाकुल चित्त से अपने मत्रियो को बुलाकर कहा—'क्या कारण है कि सौमित्र
मित्रता छोडकर इस प्रकार आ गये है ? मेरे जाने, मेरे द्वारा कोई अपराध नही हुआ है ।'
इस प्रकार दुविधा में पडे सुग्रीव को देखकर हनुमान् ने कहा—"राम ने उस महेन्द्रसुत वालि
का युद्ध में सहार करके तुम्हें कपियों का राज्य दिया था । ऐसे राम के कार्य को भुलाकर
तुम इस प्रकार भोग-विलास में निमग्न रहते हो ? क्या यह उचित है ? इसमें कोई
सदेह नही कि इसी कारण से सौमित्र यहाँ उग्र रूप धारण करके आये होगे । ऐसे वीर को
द्वार पर ही खडा रखना उचित नही । लोकवद्य उस महात्मा का स्वागत-करो, उनकी
सेवा करो, राम के कार्य का विचार करो और अपना वचन पूरा करो ।"
इन बातो को सुनकर सूर्य-पुत्र ने रामानुज को लिवा लाने का आदेश दिया । तब
लक्ष्मण ने स्वर्ण-गोपुरों के हर्म्य-समूह, विश्वकर्मा के द्वारा निर्मित चित्रो का कला-कौशल,
कैलास पर्वत के समान दीखनेवाले सौध, मध्यभाग में निर्मित क्रीडा-सरोवरों से युक्त उपवन
देव-गंधर्व के अवतार, वानरो के आवास आदि से पूर्ण उस नगर में प्रवेश किया और वहाँ
की अनुपम वस्तुओं की उत्कृष्टता पर आश्चर्य प्रकट करते हुए, इन्द्र के गृह की समता
रखनेवाले वानरराज के प्रासाद में प्रवेश किया । वहाँ पहुँचकर उन्होंने उमडते हुए
क्रोध से, अप्सराओं का सौंदर्य देखा और सुंदर स्त्रियो का स्निग्ध संगीत, उनकी वीणा,
वेणु एव मृदगो की ध्वनि, तथा उनके गहनो की मधुर ध्वनि सुनी । वे यम के समान
अत्यधिक क्रुद्ध होकर अत पुर के द्वार पर आकर खडे हुए ।
उनके आगमन का वृत्तात सुनकर, सुग्रीव अकेले ही न आकर, तारा को भी अपने
साथ लिये हुए शीघ्र वहाँ आया । अत्यधिक भय के साथ उनका क्रोध तथा उनका रूप
देखकर बड़ी भक्ति से उनके चरणो पर गिरकर उचित अर्घ्य-पाद्य देने का उपक्रम किया ।
इतन में ही उसे देखकर लक्ष्मण गरज उठे—'हे रामद्रोही, हे कृतघ्न, क्या यह उचित है
कि तुम मेरी पूजा-अर्चना करो । तुमने सत्यात्मा जानकीनाथ को वचन दिया था कि वर्षा-
काल के समाप्त होते ही आऊँगा । किन्तु तुम नही आये । तुमने अपने वचन का भग
किया । रघुराम की आज्ञा का तुमने विचार नही किया । तुम पशुबुद्धिवाले हो । राम
के जिस शर ने वालि का वध किया था, वह कालाग्नि उगल रहा है । वह तुम्हारा
सर्वनाश किये बिना नही रहेगा । हे नीच वनचर, मूर्ख बनकर तुम स्वय अपना नाश कर
रहे हो ।'
तब तारा ने अत्यत भयभीत होकर कहा—'हे अनघ, यह सूर्य-पुत्र आपका दास है ।
यह राज्य-सपत्ति, यह ऐश्वर्य आप ही के दिये हुए है । ये रविसुत आपके ही लगाये हुए
पौधे के समान है । ये सूर्य-पुत्र, रण विशारद राम की आज्ञा का पालन नही कर रहे हैं,
सो बात नही है । इस कार्त्तिक-पूर्णिमा तक सारी कपि-सेना को एकत्र करने के लिए उन्होंने
सेनापति नील को भेज दिया है और स्वय युद्ध में जाने के लिए सन्नद्ध होकर बैठे हैं । ये न राम-
द्रोही हैं, न असत्यभाषी, न कृतघ्न ही हैं । अत आप इनपर कृपा कीजिए ।'
इन बातो को सुनकर लक्ष्मण का क्रोध शान्त हुआ और उन्होंने सुग्रीव की पूजा-
अर्चना स्वीकार की । उसके पश्चात् सुग्रीव ने राजकुमार को एक स्वर्ण-पीठ पर आसीन

किष्किन्धाकांड १८७
कराया और उनकी आज्ञा लेकर मृदु-मधुर वचन कहने लगा—'हे सौमित्र, क्या में प्रभु
राघव के कार्य का विस्मरण करूँगा । में अभी सभी वानरो को एकत्र करूँगा और वैदेही
के अन्वेषण के लिए सभी दिशाओ में आदमी भेजूँगा । चलिए, में अभी आपके पीछे-पीछे
चलता हूँ । जिस शर से वालि पृथ्वी पर गिरा, जिस शर से सातो ताल-वृक्ष पृथ्वी पर
गिरे, वही शर सभी दानवो का नाश करने के लिए तथा साध्वी को मुक्त करने के लिए
पर्याप्त हैं । फिर भी में अत्यत भक्ति के साथ प्रभु राम की सेवा करूँगा और यश प्राप्त
करूँगा ।'
१३. सुग्रीव का माल्यवंत पर पहुँचना
इतना कहकर सुग्रीव ने नीतिवान् हनुमान् को देखकर कहा—'अब विलव करना
उचित नही है । वचन-पालन के निमित्त यत्न करो । हमारे राज्य के सभी वानरो को
सूचित करके, उनको रवाना करने का प्रयत्न करो । अब हमें प्रभु राम के दर्शनार्थ जाना है ।'
यों कहकर अत्यधिक उत्साह से सूर्यनंदन ने तारा आदि पत्नियो को विदा किया
और सब दिशाओ में रहनेवाले वानर-सेनापतियो को बुलाकर, उन्हें प्रस्थान करने की
आज्ञा दी ।
उस समय प्रस्थान की भेरी की जो ध्वनि हुई, वह पृथ्वी, आकाश तथा दिशाओं
को विदीर्ण करने लगी । सुग्रीव ने स्वर्ण तथा रत्नो से निर्मित एक रम्य शिविका में लक्ष्मण
को बड़े आदर के साथ बिठाया, श्वेत छत्र तथा चामर उस महात्मा के निकट सजाये, और
स्वयं एक शिविका पर आरूढ होकर लक्ष्मण के पीछे-पीछे चला । (लक्ष्मण के) आगे मगल-
वाद्य बज रहे थे और वंदी-मागधो की स्तुतियो की गंभीर ध्वनि हो रही थी । कपियो के
नेता आ-आकर सुग्रीव के दर्शन कर रहे थे । नक्षत्रो के मध्य में विलसित होनेवाले चन्द्र
के समान वह सुग्रीव, सभी वानर-वीरो की सेना को साथ लिये हुए, समस्त पृथ्वी को
कँपाते हुए, लक्ष्मण की सेवा में निरत-होकर वहाँ से चला ।
माल्यवत पर रामचन्द्र ने जब सेना का कोलाहल सुना, तब मन-ही-मन कहने लगे—
'लो कपि-सेना आ गई ।' अब उनका क्रोध शान्त हुआ और रवि-पुत्र के प्रति उनका
हृदय कोमल बन गया । सुग्रीव कुछ दूर पर ही सुदर तथा स्वर्ण-मणिमय शिविका से
उतरकर, सौमित्र के साथ राम के पास आया और बड़ी भक्ति के साथ हाथ जोड़कर
राम से कहा—'हे देव, सेनाओ को एकत्र करने में मैने अपने वीरो को भेजा था । उनके
एकत्र होते-होते इतना समय लग गया है । इसलिए आपके यहाँ आने में विलव हुआ,
अन्य किसी कारण से नही ।' तब राम ने सुग्रीव को कृपा की दृष्टि से देखकर उसको
आदर से अपनाया ।
तब कैलास-पर्वत, मेरु-पर्वत, नीलाचल, निष्धाद्रि, द्रोणाचल, ऋक्षाद्रि, पारियात्र,
उदयाद्रि, रत्नगिरि, अस्ताद्रि, मलयाचल, मथाद्रि आदि पर्वतो पर रहनेवाले महान् बाहुबली
(वानर), पवनसुत (हनुमान्), पनस, अगद, गवय, नील, गधमादन, पावकाक्ष, कालपाश,
प्रधन, वेगदर्शी, गवाक्ष, नल, मैन्द, महानाथ, धूम्र, जघ, गिरिभेदी, सुमुख, केसरी, ज्योतिर्मुख,
विमुख, तार, विनत, गज, जाववान्, सपाति, रभ, समुद्र-पुत्र सुवेण, शतवली, शरभ, सन्नाध

'?
Let's check 'करोड': no nukta, it's clearly करोड, सौ करोड, पद्म, महापद्म और अत में शख की सख्या में ऐसे.
Wait, look at "अत में शख की सख्या":
Are there really no anusvaras?
Look at 'अत': no dot above 'अ'.
Look at 'शख': no dot above 'श'.
Look at 'सख्या': no dot above 'स'.
They are definitely printed without dots: अत में शख की सख्या में ऐसे!

:
आ जुटे, मानो धरती ने ही इन सबको उत्पन्न कर दिया हो । जिस दिशा में देखें, कपि-
Wait, let's look at "सबको" vs "सवको":
Is there a slash in 'ब'? No slash, it is सवको!
Wait, look at "जिस दिगा में देखें":
Look at the word after "जिस": it is दिगा!
Wait, is it दिगा or दिशा?
Look at 'दि': द + ि.
Look at the next character: it has a vertical line with a serif at the bottom (like 'ग'), and then a full vertical line 'T': that is 100% the character 'ग' + 'ा' = गा!
Wait, but look at 'ग' in 'होकर' (no), 'गह्वर' (L9): 'ग'

वहाँ से चौदह योजन से अधिक की दूरी पर स्थित मेरु पर्वत पर ढूँढना । उस मेरु पर्वत
के चारो ओर चक्कर काटनेवाले सूर्य के चरणों में वन्दना करना और उसी प्रकार वाल-
खिल्य आदि को भी प्रणाम करना। उसके पश्चात् उदयाद्रि में भी सीताजी का अन्वेषण करके
रावण के निवास-का पता लगाकर हमें समाचार देना । (उदयाद्रि के) उस पार की भूमि
पर रवि का प्रकाश न पडने के कारण, वहाँ सदा अधकार व्याप्त रहता है । अत मैं
वहाँ के प्रदेशो के सवध में नही जानता । तुम तुरन्त यहाँ से प्रस्थान करो और एक मास
के भीतर वापस लौट आओ । ऐसा न करने से तुम्हें अपमानित होना पडेगा ।'
तब विनत ने वालि के भाई सूर्य-पुत्र को अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम किया
और एक लाख वानरो को साथ लेकर पूर्व की दिशा में प्रस्थान कर गया । इसके पश्चात्
सूर्य-पुत्र ने सुशीर, नील, हनुमान्, अगद, जाववान्, गज, गधमादन, गवाक्ष, विजय, मैन्द,
द्विविद और तार आदि वानरो को बुलाकर कहा—'अब तुम योग्य वानरो को साथ लेकर
शीघ्र दक्षिण दिशा में चल पडो । विंध्याचल से प्रारभ करके तुम नर्मदा तथा दशार्ण
नगर में ढूंढना । फिर दण्डकवन में अवश्य उनकी खोज करना । वहाँ से चलकर गोदावरी
के तट पर ढूंढना, फिर वेत्रवती के निकट देखना । तदनतर तुम कलिंग तथा निष्ध देशो
में अन्वेषण करना । फिर कर्णाटक, आध्र, चोल, चेर, केरल, तथा पाण्ड्य देशो में ढूंढना ।
तत्पश्चात् मलय-पर्वत तथा कावेरी के किनारे देखना, फिर अगस्त्य के आश्रम में जाना
और उस महात्मा की आज्ञा प्राप्त करके ताम्रपर्णी नदी को पार करना । उसके बाद
समुद्र के तट पर स्थित वनो में ढूंढना, और फिर स्वर्णपुरी में उनकी खोज करना । वहाँ
से बडी तत्परता से महेन्द्र पर्वत पर जाकर देखना, उसके उस पार रहनेवाले विप्रमाद्रि
में ढूंढना, फिर पुष्पाद्री में देखना और क्रैव कुजर नामक पहाड पर अन्वेषण करना । वहाँ
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित अगस्त्य का आश्रम है । वहाँ भी सीता को ढूंढना । उसके पश्चात्
अजना नदी को पार करना । अजना नदी के उस पार भोगवती नामक नगर है, जो मणियो
से पूर्ण तथा फणियो से रक्षित है । तुम अवश्य उस नगर में प्रवेश करके वहाँ सीता का
अन्वेषण करना । वहाँ से चलकर तुम वृषभाद्रि पर जाना । उस पर्वत पर गधर्व, अप्सराएँ
तथा सुर रहते हैं । वहाँ भी तुम सीताजी को ढूंढना और विना विचलित हुए वैंतरणी
पार करके वैवस्वत नगर में चले जाना । वहाँ यम की अनुमति प्राप्त करके समस्त पितृ-
लोक में सीताजी की खोज करना और उनका समाचार जानकर एक महीने के भीतर
अवश्य लौट आना । वैवस्वत नगर के उस पार का प्रदेश अधकारावृत हैं । वहाँ देवता
भी नही जा सकते ।

१५. हनुमान् को मुद्रिका देना
तब वे सब कपिश्रेष्ठ, आनद के समुद्र में गोते लगाते हुए, सूर्य के तेज से भी
अधिक दीप्तिमान् राम-भूपति को अपनी शक्ति का परिचय देते हुए कहने लगे—“हे राजन्,
किसी भी प्रकार से क्यो न हो, हम जानकी का पता लगाये विना वापस नही लौटेंगे ।
तब राम, भावी कार्यों का निश्चय करते हुए बडी कृपापूर्ण दृष्टि मे हनुमान् की ओर
देखकर तथा उन्हें अपने निकट बुलाकर कहा— हे पवनसुत, तुम मेरे निकट आओ । तुम

२०० रंगनाथ रामायण
अवश्य ही जानकी को देख सकोगे । हे अनघ, तुम्हारे द्वारा कार्य की सिद्धि होगी । तुम
कार्य करने की शक्ति रखते हो । तुम्हारा बाहुबल भी वैसा है । यह मेरी मुद्रिका लो ।
इसे सीता को देना और उस रमणी के चित्त का दुःख दूर करना । सीता से हमारे कुशल-
समाचार कहना और उसका कुशल सुनाने के लिए तुम शीघ्र यहाँ लौट आना ।' इस
प्रकार कहकर राम ने अगूठी हनुमान् को दी, तो उसने उसे अपने सिर पर इस प्रकार रख
लिया, मानो उदयाचल ने अपने शिखर पर सूर्य को धारण कर लिया हो ।
तब हनुमान् अत्यधिक हर्ष से उछल पड़ा और हाथ जोड़कर बोला—'हे सूर्य-कुल
के अधीश्वर, चाहे जितनी भी दूर जाना पड़े, मैं अवश्य जाकर सीताजी का पता लगाकर
आऊँगा । आवश्यकता हुई तो सूर्य तथा चंद्र को भी रोककर पृथ्वी, समुद्र तथा आकाश में
भी प्रवेश करके सीता की खोज करूँगा । रावण के निवास में इस प्रकार प्रविष्ट होऊँगा
कि मेरी अनुपम शक्ति की सब लोग प्रशंसा करेंगे । अब मैं जाता हूँ ।' ऐसा कहकर
वायु-पुत्र ने अंगद आदि के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान किया ।
उसके पश्चात् वानरेश्वर ने सुषेण से कहा—'तुम एक लाख वानरों को साथ लेकर
सौराष्ट्र में जाकर वहाँ सीताजी का अन्वेषण करो । वहाँ से निकलकर धैर्य के साथ बाह्लीक
देश में प्रवेश करो और वहाँ ढूँढ़ने के पश्चात् श्रीसपन्न सिंधु, सौवीर, तथा कैकय देश में
जाकर देखो । तत्पश्चात् अच्छी तरह पुन्नाग वन में ढूँढो और पश्चिमी सागर में ढूँढो ।
तदनंतर ललित नारिकेल वनों में देखो और बिना क्लान्त हुए वज्राद्रि पर पहुँच जाओ ।
वहाँ से निकलकर पारियात्रक (पर्वत के) वन में पहुँचो और वहाँ रहनेवाले गंधर्वो का
परिचय प्राप्त करके सीताजी का अन्वेषण करो । उसके पश्चात् तुम उस चक्रवन्त पर्वत पर
चले जाओ, जहाँ विष्णु ने हयग्रीव तथा पंचजन्य नामक राक्षसो का वध करके शंख तथा
चक्र प्राप्त किये थे । वहाँ से तुम मेघाद्रि पर चले जाना और वहाँ पर स्थित साठ
कचनाद्रियों में सीताजी को ढूँढ़ना । फिर जिस स्थान पर सूर्य अस्त होता है, उस अस्ताद्रि में
जाकर सौवर्ण नामक पर्वत पर ढूँढो और फिर वरुण की राजधानी में देखो । तदनंतर वहाँ
पर रहनेवाले मेरु सावर्णि नामक मुनि के दर्शन करके एक महीने के अंदर सीताजी का
समाचार लेकर वापस आओ । उसके बाद की पृथ्वी सूर्य-रहित तथा सीमाहीन होने के
कारण, मैं उसके संबंध में कुछ नहीं जानता ।' इस आदेश को मानकर सुषेण पश्चिम की
ओर चल पड़ा ।
फिर सूर्य-पुत्र ने शतबली को बुलाकर कहा—"तुम एक लाख सैनिको को लेकर
पुलिंदो के देश में प्रवेश कर वहाँ सीताजी को ढूँढो । फिर शूरसेन प्रदेश में देखो और
वहाँ से समस्त भरत भूमि में ढूँढ़ते हुए यवनराजा के देशो में जाओ । वहाँ ढूढकर,
कांबोज तथा कोकण प्रदेशों को देखते हुए हेमत पर्वत पर चले जाओ । वहाँ के सोमाश्रमो
में ढूँढ़कर, श्रीसमन्वित कालाख्य शिखर पर पहुँच जाओ । वहाँ देखने के पश्चात् तुम सुदर्शन
नामक पर्वत पर ढूँढो और फिर कनकाद्रि पर पहुँच जाओ । वहाँ से कैलास पर्वत पर चले
जाओ और कौवेर वन में देखो । फिर कुवेर के नगर में तथा उसके सरोवर के तट पर
देखो । उसके पश्चात् कुवेर की आज्ञा प्राप्त करके क्रौंचाद्रि में जाकर सीतांजी का अन्वेषण करो ।

वहाँ से मैनाक पर्वत पर पहुँच जाओ और वहाँ वैखानस नामक सरोवर में ढूँढो ।
उस सरोवर के पार जो शैलोदया नामक नदी बहती है, उसे लाँघकर उत्तर कुरुभूमि
में अन्वेषण करो । उन प्रदेशों में गंधर्व तथा अप्सराएँ अपनी इच्छा से विचरण करती
रहती हैं । उन प्रदेशों में तुम सीताजी का अन्वेषण करो और वहाँ न ठहरकर उत्तर समुद्र
को पार करके सोमाद्रि पर पहुँच जायो । वहाँ ब्रह्मा तथा शिव अविचल समाधि में रहते हैं ।
तब तुम वहाँ से लौटकर एक महीने में समाचार ले आओ ।' इस आदेश के अनुसार शतवली
रामचन्द्र की आज्ञा लेकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ।
इसके पश्चात् रघुराम ने सूर्य-पुत्र को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, तुमने इन सब
प्रदेशों को कब देखा ?' तब सुग्रीव ने कहा—'हे देव, जिस दिन में वालि से भयभीत
होकर भागा था और वालि मेरा पीछा करने लगा था, उस दिन मैंने पृथ्वी के चारों ओर
चक्कर काटकर इन सब प्रदेशों को देखा था ।'
इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हुए । राम की आज्ञा के अनुसार पूर्व तथा पश्चिम
दिशाओं में गये हुए वानर सीता का अन्वेषण करते हुए पृथ्वी के उस भाग तक गये, जहाँ
तक सूर्य की किरणें पहुँचती हैं और वहाँ से लौटकर राम से निवेदन किया कि हम कहीं
भी सीताजी का पता नहीं लगा सके । तब राम तथा सुग्रीव बड़ी उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करते
हुए सोचते रहे कि न जाने अंगद आदि वानर-वीर क्या समाचार लायेंगे ।
अंगद आदि वानर-वीर एक दूसरे से स्पर्धा करते हुए बड़े हर्ष के साथ अपनी
शक्ति तथा प्रताप का प्रदर्शन करते हुए, सुग्रीव के आदेश का अक्षरश पालन करते हुए,
पहले विंध्याचल पर गये । वहाँ की गुफाओं तथा वनों में उन्होंने सीताजी को ढूँढा ।
वहाँ से वे दक्षिण की ओर चले । मार्ग में पड़नेवाली पुष्प-लता-समूहों में, पेड़ों में, नदियों में
पहाड़ों में, तथा नगरों में सीताजी को ढूँढ़ते हुए, वे आगे बढ़ते जाते थे । किन्तु कहीं
भी सीता का पता न लगने से वे बहुत चिंतित थे । वे उस वन में से होकर जाने लगे,
जो महामुनि कडु की शापाग्नि से निर्जन, छायाहीन तथा जल-रहित हो गया था । अपने
दस वर्ष की अवस्था के पुत्र की मृत्यु के तीव्र दुःख से अभिभूत होकर कडु मुनि ने अपने
शाप से उस वन को ऐसा बना दिया था ।
१६. महर्षि कंडु के आश्रम में
वानर अत्यंत क्लांत हो, पानी ढूँढ़ते हुए उस वन में फिर रहे थे । तब एक राक्षस ने
उनका मार्ग रोककर भयंकर गर्जन करके कहा—'मेरे हाथों मरे विना अब तुम कहाँ
जाओगे ? तब अंगद ने क्रुद्ध होकर उस पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस मुँह से
रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा । तब सब वानर थककर एक महान् वृक्ष की छाया
में बैठ गये और प्यास से व्याकुल होते हुए सोचने लगे कि यहाँ जल कहाँ मिलेगा ?
वहाँ उन्होंने एक गुफा के द्वार से कुछ जल-पक्षियों को उड़ते हुए देखा और निश्चय किया
कि अवश्य वहाँ जल मिल सकता है । यो सोचकर उन्होंने उस गुफा में प्रवेश किया ।
गुफा में अंधकार व्याप्त रहने के कारण उन्हें मार्ग न दीखता था । फिर भी धैर्य के साथ,
एक दूसरे का आधार लेते हुए वे आगे बढ़ते गये । कुछ दूर जाने पर मार्ग का अंधकार
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२०२ रंगनाथ रामायण

दूर हो गया और वहाँ उन्होंने ससार-भर में अद्भुत तथा अनुपम नगर देखा । वे खडे
होकर उस नगर के स्वर्ण-गोपुरो, स्वर्ण-सौधो, स्वर्ण-अट्टालिकाओ, स्वर्ण-दुर्गो, स्वर्ण-वृक्षो
तथा स्वर्ण के पुष्प-लता-समूहो के देखकर आश्चर्यचकित हो गये । वे सोचने लगे—
'यह कितने आश्चर्य की बात है । ऐसे ऐश्वर्य से परिपूर्ण यह नगर जन-रहित क्यो है ?
यह नगर ऐसा क्यो बन गया ? उनकी समझ में नही आता था कि उस नगर से बाहर
कैसे निकला जाय । चिंता में पडे हुए वे कुछ देर तक वही भटकते रहे । एक दिन उन्होंने
उस नगर के मध्य में स्थित सब सौधो में श्रेष्ठ, एक गगनचुबी सीध को देखा । तुरत
सभी वानर उस सौध पर चढ गये और वहाँ मृगछाला पहनी हुई, तरुण इदु की काति
के समान दीप्त एक पुण्यात्मा स्त्री को तपस्या में निरत देखा । हनुमान् ने उसे प्रणाम
किया और अकलक मन से कहा—'हे साध्वी, तुम कौन हो ? अकेली यहाँ किस कारण
से तपस्या में लीन रहती हो ? यह पुण्य नगर किस महात्मा का है ? हमने तो
ऐसा अनोखा नगर कही भी नही देखा ।'
१७. स्वयंप्रभा का सत्कार
तब वह कोमलांगी, हनुमान् को देखकर अपना पूर्व वृत्तांत यो कहने लगी—'पूर्व-
काल में मय नामक राक्षस राजा ने ब्रह्मा की वडी तपस्या की और वास्तु-कला में अद्भुत
कुशलता प्राप्त की । तत्पश्चात् उसने यह नगर बनाया और हेमा नामक एक दिव्य रमणी
के साथ बहुत वर्ष तक अबाध गति से यहाँ जीवन व्यतीत करता रहा । अमरवल्लभ
(इन्द्र) वज्रायुध से उस राक्षस राजा का वध करके उसकी स्त्री को उठा ले गया । उसी
चंचल नेत्रवाली (देव-स्त्री) की मैं सखी हूँ । मेरे पति महान् आत्मा सौवर्णी है । मेरा
नाम स्वयंप्रभा है और उस देव-स्त्री की आज्ञा से तप में निरत होकर मैं यहाँ रहती हूँ।'
इतना कहकर उसने कंद-मूल-फल देकर सब वानरो का सत्कार किया, जल देकर उनकी
प्यास बुझाई और फिर पूछने लगी—'हे अनघ, तुम कौन हो और यहाँ क्यो आये हो ?
यहाँ पहुँचना देवताओ के लिए भी कठिन है । तुम लोग यहाँ किस प्रकार आये ?'
तब हनुमान् ने उस स्त्री से कहा—'हे साध्वी, अपने पिता की आज्ञा से जब राम
मुनि-वेश धारण कर दण्डक-वन में निवास करते थे, तब उनकी पत्नी कमलाक्षी सीता को
(रावण) चुरा ले गया । राम की आज्ञा से हम उनके (सीता के) अन्वेषण में निकले हैं ।
मार्ग में प्यास के कारण अत्यत क्लात हो हमने एक गुफा में प्रवेश किया और उस
गुफा के अधकार से विचलित न होकर हम आगे बढ़ते गये और सयोग से तुम्हारे इस
आश्रम में आ पहुँचे । यहाँ से निकलकर जाने का मार्ग न जानकर विवश हो हम कई
दिनो से यही भटक रहे है ।'
तब उसने वडी भक्ति से उन्हें देखकर कहा—'तुम लोग राम के कार्य के लिए
आये हो । तुम पुण्यात्मा हो । तुम लोग जो चाहो, सो मुझ से माँगो ।' तब उन्होने कहा-
'तुम हमें यहाँ से बाहर जाने का मार्ग बताओ । हम शीघ्र यहाँ से सीता के अन्वेषण में
जाना चाहते हैं ।' तब उस स्त्री ने अत्यत आनंद से कहा—'तुम सब अपनी आँखें बद
कर लो ।' उसके पश्चात् वह अपनी तपस्या की शक्ति से सहज ही एक क्षण-मात्र में उन्हें

गुफा के बाहर पहुँचा दिया और स्वयं फिर उस गुफा में चली गई । सभी वानर-पुगव
उस स्त्री की प्रशंसा करते हुए आगे बढ़े । वे श्रेष्ठ वीर-वानर, मार्ग में पड़नेवाले एक
विशाल सरोवर में जल पीकर फिर महेन्द्राद्रि पर पहुँचे ।

१८. वानरों की व्याकुलता

तब अंगद इस प्रकार दुख करने लगा—'सूर्य-पुत्र की दी हुई अवधि समाप्त
हो गई', किन्तु अबतक सूर्यवंशी (राम) की पत्नी का पता हम नहीं लगा सके । आज्ञा-
पालन को विशेष महत्त्व देनेवाले सुग्रीव, यह कहकर हमारा वध कर देंगे कि इन्होंने मेरी
आज्ञा का उल्लंघन किया । इसलिए कपिराज के दर्शनार्थ हमारा जाना उचित नहीं है ।
हम जिस गुफा से अभी बाहर आये, उसी में प्रवेश करके, वही सुख से रहेंगे । वहाँ का
मार्ग अष्ट-दिक्पालों के लिए भी अभेद्य है । वहाँ के वन विविध प्रकार के पके हुए फलों
से भरे हुए हैं । वहाँ कोई भी प्रवेश नहीं कर पायेगा ।' कुछ वानरों ने अंगद की बातों
का समर्थन किया ।
तब मारुति ने क्रुद्ध होकर कहा—'तुम बड़े बुद्धिमान् हो ! काका की आज्ञा से
बड़े वीर के समान राम का कार्य करने चले । अब चंचल-चित्त हो कपियों के साथ उस
गुफा में प्रवेश करने का जो प्रस्ताव तुम करते हो, क्या यह सूर्य-पुत्र की आज्ञा का
तिरस्कार नहीं हुआ ? मैं, नील, तार और नल—चारों इसके लिए किसी भी प्रकार
सहमत नहीं हो सकते । अन्य वानर भी अपने सगे-संबंधियों को छोड़कर तुम्हारी सेवा में
नहीं रह सकेंगे । इतना ही नहीं, पूर्वकाल में इन्द्र ने अपने वज्र के आघात से उस गुफा
का निर्माण किया था । लक्ष्मण के पास उनके वज्र की समता करनेवाले पैने अस्त्रों की
कमी नहीं है । क्या वे बात-की-बात में तुम्हें और तुम्हारे सैनिक-बल का सर्वनाश नहीं
कर देंगे ? इसलिए यह दुर्बुद्धि छोड़ दो । हम सूर्य-पुत्र की सेवा में पहुँचकर कहेंगे कि हम
सीता को नहीं देख सके । वे तुम्हें और हमें अवश्य ही क्षमा करेंगे । सौजन्य के कारण
मुझ पर, और तुम्हारी माता पर अनुरक्त होने के कारण तुम पर, वे क्रोध नहीं करेंगे ।
तुम उनके पुत्र हो, इसलिए वे तुमको ही राज्य देंगे ।'
तब वालि-पुत्र ने कहा—'मेरे काका पितृ-तुल्य वालि का वध कराके, उनकी स्त्री
के साथ विवाह करके, उपकार करनेवाले राम के कार्य को भूलकर, भोग-विलास में
निमग्न रहे । लक्ष्मण के क्रोध करने पर ही तो वे राम के पास आये । क्या, तुम उनका
नीच व्यवहार नहीं जानते ? ऐसे कृतघ्न तथा कामांध का विश्वास कैसे किया जाय ?
इतना ही क्यों ? श्रीराम का कार्य किये बिना वहाँ पहुँचकर उस रवि-पुत्र के हाथों मरने
की अपेक्षा यहीं मर जाना अच्छा है । अब प्रायोपवेश के लिए तत्पर हो जाओ ।'
ऐसा कहकर अंगद तथा अन्य कपि दर्भ-शय्या पर लेट गये । अपना प्रयत्न विफल
होने से वे मन-ही-मन दुःखी होने लगे । प्रायोपवेश करते रहने से तथा मानसिक पीड़ा
से परितप्त होते रहने से वे बहुत ही निर्बल हो गये । कभी वे उठकर बैठते, कभी लेट
जाते, कभी चारों दिशाओं में शून्य दृष्टियों से देखते, कभी अपने पुत्र तथा सगे-संबंधियों
का स्मरण करते और कहते—'हे भगवान्, आप इस प्रकार हमारे प्राण क्यों लेना चाहते हैं ?

फिर सभी वानर अलग-अलग समूहों में एकत्र होकर आपस में कहते—'हाय !
सूर्यकुलसंभव (राम) वन में आये ही क्यों ? अपनी पत्नी को राक्षसों के हाथ में खोया
ही क्यों ? उस राक्षस ने जटायु का वध ही क्यों किया ? राम ने उसको देखा ही क्यों?
उस जटायु ने सीता का समाचार उनसे कहा ही क्यों ? राम पंपा सरोवर के तट पर
आये ही क्यों ? वहाँ उन्होंने सुग्रीव से भेंट ही क्यों की ? सुग्रीव उनके मित्र ही क्यों
बने ? राजकुमार ने वालि का वध ही क्यों किया ? इतनी बड़ी कपि-सेना एकत्र ही
क्यों हुई ? सूर्य-पुत्र ने हमें यहाँ भेजा ही क्यों ? हमारी ऐसी दुर्गति ही क्यों हुई ?
हमारे प्राण व्यर्थ क्यों जायँ ? हाय, कैकेयी के वर ने सूर्यवंश के साथ ही हमारे वंश का
भी सर्वनाश कर दिया ।' इस प्रकार सभी वानर विलाप करने लगे ।

१९. संपाति से भेंट

तब एक विशालकाय, यौवन तथा पंखों से हीन एवं अत्यन्त वृद्ध संपाति नामक
पक्षिराज उस पहाड़ की गुफा से बाहर निकला और मृत्यु की इच्छा करते हुए धरती पर
पड़े हुए वानर-समूह को देखकर धीरे-धीरे उनके समीप आया । वह सोचने लगा कि
भगवान् ने बड़ी कृपा करके मुझे आहार भेजा है । उसे देखकर सभी चपल वानर अपने
निश्चय पर पश्चात्ताप करने लगे । तब अंगद ने हनुमान् से कहा—'यह पक्षी नहीं है ।
स्वयं यम् निर्दयी होकर हमारे प्राण लेने के लिए इस रूप में आया है । उस दिन जटायु ने,
राम की पत्नी को चुराकर ले जानेवाले रावण के साथ युद्ध करके उसके प्रखर खड्ग के
प्रहार से मृत्यु प्राप्त की और फलतः सहज ही स्वर्ग का लाभ कर लिया । अब राम के
कार्य के लिए आये हुए हम भी इस महाबली के हाथों में अपने प्राण खो दें, तो अच्छा ही
होगा ।' उनकी बातों को सुनते ही अरुण-पुत्र (संपाति) का कंठ शोक से गद्गद
हो गया । वह उन कपि-वीरों के निकट जाकर पूछने लगा—'हे वानरो, तुम कहाँ से आये हो ?
वह जटायु मेरा प्रिय अनुज है । हम दोनों अरुण के पुत्र हैं । वह पैने तथा भयंकर
नखोंवाला, गुफा के समान मुखवाला, दशरथ का मित्र, सन्त सुखी मृत्यु को कैसे प्राप्त
हुआ ?' तब वालि-पुत्र ने उसे सारा समाचार कह सुनाया । उस समाचार को सुनकर
संपाति अत्यधिक शोक से संतप्त हुआ । दुःखी होनेवाले उस पक्षी को वानरों ने उठाकर
समीप ही रहनेवाले समुद्र के पास पहुँचा दिया, तो उसने समुद्र में स्नान किया और
उसके पश्चात् बड़े दुःख से पीड़ित होते हुए अपनी पूर्व-कथा उन वानरों से कहने लगा ।
उसने कहा—'मैं और जटायु, हम दोनों किसी समय कैलास पर्वत पर एक साथ
रहते थे । अपने यौवन तथा शक्ति के गर्व से प्रेरित होकर एक दिन प्रभात के समय हम
दोनों साथ-साथ आकाश में उड़ते-उड़ते बहुत दूर चले गये । मध्याह्न के समय हम सूर्य-
मंडल के समीप पहुँचे । जटायु सूर्य की किरणों के लगने से जलने लगा । तब मैंने उसे
अपने पंखों के नीचे छिपा लिया । तब मेरे पक्ष भी जल गये । पंखों के जल जाने से,
अपनी सारी शक्ति खोकर, मैं इस आश्रम-भूमि में गिर पड़ा । पता नहीं, जटायु कहाँ चला गया ।
तुम लोगों से यह समाचार सुनकर भी मैं आज चुप बैठा हुआ हूँ । यदि पहले
की तरह मेरे पक्ष होते, तो मैं अपनी शक्ति से अपने भाई का प्रतिशोध लेता और राम

के पास पहुँचकर उनसे अपने पौरुष की प्रशंसा प्राप्त करता । लेकिन अब उन बातो से
क्या प्रयोजन है ?'
तब जाम्बवान् ने हनुमान् तथा अगद को अत्यत हर्षित करते हुए उस पक्षी से कहा-
'ऐसे शक्तिशाली जटायु के अग्रज तुम्हारा इस ससार में कौन सामना कर सकता है ?
कोई ऐसा स्थान नही होगा, जिसे तुमने नही देखा हो । तुम कृपया हमें बताओ कि रावण ने
रघुराम की पत्नी को कहाँ छिपा रखा है ?'
२०. सीता का पता बताना
सपाति का सदेह दूर हुआ । उसने कहा—'मेरा पुत्र सुपार्श्व, दुर्दम पराक्रमी तथा
महान् पितृभक्त है । पखो के जलने से असमर्थ हो यहाँ पर पड़े हुए मुझे वह प्रति दिन
बडी भक्ति के साथ भोजन लाकर दिया करता है । एक दिन की बात है कि वह बहुत
विलव से, बिना भोजन लाये ही यहाँ आया । जब मैने उससे विलब का कारण पूछा तब
उसने उत्तर दिया—'पिताजी, आपके लिए आहार प्राप्त करने के उद्देश्य से मै हेमेन्द्र गिरि
के समीप समुद्र-तट पर बैठा था। उसी समय काजल के पर्वत के सदृश एक राक्षस, सूर्य-प्रभा
के समान एक रमणी को साथ लिये हुए आया और मुझसे मीठी-मीठी बातें करने लगा ।
मेरे मार्ग देने पर वह शीघ्र वहाँ से चला गया । तब वहाँ रहनेवाले मुनि मुझे देखकर
हर्ष से कहने लगे कि आज तुम मृत्यु के मुख से बच गये । वह (काला पुरुष) यम रूपी
रावण था । श्रीराम की पत्नी को चुराकर वह लका को ले जा रहा था । इसी कारण
से मुझे यहाँ आने में विलब हुआ है । अब इसमें कोई सदेह नही है कि जानकी, वादलो
से घिरी हुई चद्रिका की तरह, राक्षस-रमणियो से परिवृत हो लका में रहती है । मेरी
दृष्टि इस पृथ्वी पर शत योजन तक देख सकती है । सभी पक्षियो की अपेक्षा मेरी दृष्टि
तथा गमन-शक्ति अधिक है ।'
सपाति ने आगे कहा—'जब मेरे दोनो पख जल गये और मै मृत्यु से बचकर,
मूर्च्छित होकर यहाँ गिर पडा, तब कई वर्ष तक प्यास से व्याकुल हो, कराहते हुए यहाँ
पडा रहा । एक दिन मेरे सौभाग्य से सकल जनो का ताप हरण करनेवाले, साक्षात् निशाकर
(चंद्रमा) के समान गुणवाले निशाकर (नामक मुनि) को मैने देखा । सूर्य-तेज से दग्ध
अपने पखो का वृत्तात मैने उनसे कहा । वे मुनि-शिरोमणि पहले से ही मुझे जानते थे ।
इसलिए दयार्द्र होकर बोले— आश्रितवत्सल, परात्पर विष्णु महाराज दशरथ के यहाँ जन्म
लेंगे । वह सूर्य-वश-तिलक वनवास के लिए भयकर वनो में आयेंगे, उनकी पत्नी को
रावण चुराकर ले जायगा । उस रमणी को अमृताशु (चन्द्र) अमृतान्न देंगे, जिससे वह
क्षुधा तथा तृषा से मुक्त होकर रहेगी । तब राम शीघ्र आकर इन्द्र-पुत्र (वालि) का
सहार करके सूर्य-पुत्र की रक्षा करेंगे और सीता के अन्वेषणार्थ वानरो को चारो दिशाओ
में भेजेंगे । जिस दिन तुम राम के उन भटो को यह वृत्तात सुनाओगे, उसी दिन तुम्हारे
पख तुम्हें मिल जायेंगे । उनके आदेशानुसार मैने तुम लोगो से यह वृत्तात सुनाया । लो,
देखो, मुझे अपने पख भी मिल गये ।' इतना कहकर वह एकदम उछलकर आकाश में
उड़ा और कहने लगा—'देखा मैने सीता को । लका के समीप एक वन में मैंने सीता को देखा ।