रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 235, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंके पास पहुँचकर उनसे अपने पौरुष की प्रशंसा प्राप्त करता । लेकिन अब उन बातो से
क्या प्रयोजन है ?'
तब जाम्बवान् ने हनुमान् तथा अगद को अत्यत हर्षित करते हुए उस पक्षी से कहा-
'ऐसे शक्तिशाली जटायु के अग्रज तुम्हारा इस ससार में कौन सामना कर सकता है ?
कोई ऐसा स्थान नही होगा, जिसे तुमने नही देखा हो । तुम कृपया हमें बताओ कि रावण ने
रघुराम की पत्नी को कहाँ छिपा रखा है ?'
२०. सीता का पता बताना
सपाति का सदेह दूर हुआ । उसने कहा—'मेरा पुत्र सुपार्श्व, दुर्दम पराक्रमी तथा
महान् पितृभक्त है । पखो के जलने से असमर्थ हो यहाँ पर पड़े हुए मुझे वह प्रति दिन
बडी भक्ति के साथ भोजन लाकर दिया करता है । एक दिन की बात है कि वह बहुत
विलव से, बिना भोजन लाये ही यहाँ आया । जब मैने उससे विलब का कारण पूछा तब
उसने उत्तर दिया—'पिताजी, आपके लिए आहार प्राप्त करने के उद्देश्य से मै हेमेन्द्र गिरि
के समीप समुद्र-तट पर बैठा था। उसी समय काजल के पर्वत के सदृश एक राक्षस, सूर्य-प्रभा
के समान एक रमणी को साथ लिये हुए आया और मुझसे मीठी-मीठी बातें करने लगा ।
मेरे मार्ग देने पर वह शीघ्र वहाँ से चला गया । तब वहाँ रहनेवाले मुनि मुझे देखकर
हर्ष से कहने लगे कि आज तुम मृत्यु के मुख से बच गये । वह (काला पुरुष) यम रूपी
रावण था । श्रीराम की पत्नी को चुराकर वह लका को ले जा रहा था । इसी कारण
से मुझे यहाँ आने में विलब हुआ है । अब इसमें कोई सदेह नही है कि जानकी, वादलो
से घिरी हुई चद्रिका की तरह, राक्षस-रमणियो से परिवृत हो लका में रहती है । मेरी
दृष्टि इस पृथ्वी पर शत योजन तक देख सकती है । सभी पक्षियो की अपेक्षा मेरी दृष्टि
तथा गमन-शक्ति अधिक है ।'
सपाति ने आगे कहा—'जब मेरे दोनो पख जल गये और मै मृत्यु से बचकर,
मूर्च्छित होकर यहाँ गिर पडा, तब कई वर्ष तक प्यास से व्याकुल हो, कराहते हुए यहाँ
पडा रहा । एक दिन मेरे सौभाग्य से सकल जनो का ताप हरण करनेवाले, साक्षात् निशाकर
(चंद्रमा) के समान गुणवाले निशाकर (नामक मुनि) को मैने देखा । सूर्य-तेज से दग्ध
अपने पखो का वृत्तात मैने उनसे कहा । वे मुनि-शिरोमणि पहले से ही मुझे जानते थे ।
इसलिए दयार्द्र होकर बोले— आश्रितवत्सल, परात्पर विष्णु महाराज दशरथ के यहाँ जन्म
लेंगे । वह सूर्य-वश-तिलक वनवास के लिए भयकर वनो में आयेंगे, उनकी पत्नी को
रावण चुराकर ले जायगा । उस रमणी को अमृताशु (चन्द्र) अमृतान्न देंगे, जिससे वह
क्षुधा तथा तृषा से मुक्त होकर रहेगी । तब राम शीघ्र आकर इन्द्र-पुत्र (वालि) का
सहार करके सूर्य-पुत्र की रक्षा करेंगे और सीता के अन्वेषणार्थ वानरो को चारो दिशाओ
में भेजेंगे । जिस दिन तुम राम के उन भटो को यह वृत्तात सुनाओगे, उसी दिन तुम्हारे
पख तुम्हें मिल जायेंगे । उनके आदेशानुसार मैने तुम लोगो से यह वृत्तात सुनाया । लो,
देखो, मुझे अपने पख भी मिल गये ।' इतना कहकर वह एकदम उछलकर आकाश में
उड़ा और कहने लगा—'देखा मैने सीता को । लका के समीप एक वन में मैंने सीता को देखा ।