रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 230, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ें२०० रंगनाथ रामायण
अवश्य ही जानकी को देख सकोगे । हे अनघ, तुम्हारे द्वारा कार्य की सिद्धि होगी । तुम
कार्य करने की शक्ति रखते हो । तुम्हारा बाहुबल भी वैसा है । यह मेरी मुद्रिका लो ।
इसे सीता को देना और उस रमणी के चित्त का दुःख दूर करना । सीता से हमारे कुशल-
समाचार कहना और उसका कुशल सुनाने के लिए तुम शीघ्र यहाँ लौट आना ।' इस
प्रकार कहकर राम ने अगूठी हनुमान् को दी, तो उसने उसे अपने सिर पर इस प्रकार रख
लिया, मानो उदयाचल ने अपने शिखर पर सूर्य को धारण कर लिया हो ।
तब हनुमान् अत्यधिक हर्ष से उछल पड़ा और हाथ जोड़कर बोला—'हे सूर्य-कुल
के अधीश्वर, चाहे जितनी भी दूर जाना पड़े, मैं अवश्य जाकर सीताजी का पता लगाकर
आऊँगा । आवश्यकता हुई तो सूर्य तथा चंद्र को भी रोककर पृथ्वी, समुद्र तथा आकाश में
भी प्रवेश करके सीता की खोज करूँगा । रावण के निवास में इस प्रकार प्रविष्ट होऊँगा
कि मेरी अनुपम शक्ति की सब लोग प्रशंसा करेंगे । अब मैं जाता हूँ ।' ऐसा कहकर
वायु-पुत्र ने अंगद आदि के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान किया ।
उसके पश्चात् वानरेश्वर ने सुषेण से कहा—'तुम एक लाख वानरों को साथ लेकर
सौराष्ट्र में जाकर वहाँ सीताजी का अन्वेषण करो । वहाँ से निकलकर धैर्य के साथ बाह्लीक
देश में प्रवेश करो और वहाँ ढूँढ़ने के पश्चात् श्रीसपन्न सिंधु, सौवीर, तथा कैकय देश में
जाकर देखो । तत्पश्चात् अच्छी तरह पुन्नाग वन में ढूँढो और पश्चिमी सागर में ढूँढो ।
तदनंतर ललित नारिकेल वनों में देखो और बिना क्लान्त हुए वज्राद्रि पर पहुँच जाओ ।
वहाँ से निकलकर पारियात्रक (पर्वत के) वन में पहुँचो और वहाँ रहनेवाले गंधर्वो का
परिचय प्राप्त करके सीताजी का अन्वेषण करो । उसके पश्चात् तुम उस चक्रवन्त पर्वत पर
चले जाओ, जहाँ विष्णु ने हयग्रीव तथा पंचजन्य नामक राक्षसो का वध करके शंख तथा
चक्र प्राप्त किये थे । वहाँ से तुम मेघाद्रि पर चले जाना और वहाँ पर स्थित साठ
कचनाद्रियों में सीताजी को ढूँढ़ना । फिर जिस स्थान पर सूर्य अस्त होता है, उस अस्ताद्रि में
जाकर सौवर्ण नामक पर्वत पर ढूँढो और फिर वरुण की राजधानी में देखो । तदनंतर वहाँ
पर रहनेवाले मेरु सावर्णि नामक मुनि के दर्शन करके एक महीने के अंदर सीताजी का
समाचार लेकर वापस आओ । उसके बाद की पृथ्वी सूर्य-रहित तथा सीमाहीन होने के
कारण, मैं उसके संबंध में कुछ नहीं जानता ।' इस आदेश को मानकर सुषेण पश्चिम की
ओर चल पड़ा ।
फिर सूर्य-पुत्र ने शतबली को बुलाकर कहा—"तुम एक लाख सैनिको को लेकर
पुलिंदो के देश में प्रवेश कर वहाँ सीताजी को ढूँढो । फिर शूरसेन प्रदेश में देखो और
वहाँ से समस्त भरत भूमि में ढूँढ़ते हुए यवनराजा के देशो में जाओ । वहाँ ढूढकर,
कांबोज तथा कोकण प्रदेशों को देखते हुए हेमत पर्वत पर चले जाओ । वहाँ के सोमाश्रमो
में ढूँढ़कर, श्रीसमन्वित कालाख्य शिखर पर पहुँच जाओ । वहाँ देखने के पश्चात् तुम सुदर्शन
नामक पर्वत पर ढूँढो और फिर कनकाद्रि पर पहुँच जाओ । वहाँ से कैलास पर्वत पर चले
जाओ और कौवेर वन में देखो । फिर कुवेर के नगर में तथा उसके सरोवर के तट पर
देखो । उसके पश्चात् कुवेर की आज्ञा प्राप्त करके क्रौंचाद्रि में जाकर सीतांजी का अन्वेषण करो ।