रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ से मैनाक पर्वत पर पहुँच जाओ और वहाँ वैखानस नामक सरोवर में ढूँढो ।
उस सरोवर के पार जो शैलोदया नामक नदी बहती है, उसे लाँघकर उत्तर कुरुभूमि
में अन्वेषण करो । उन प्रदेशों में गंधर्व तथा अप्सराएँ अपनी इच्छा से विचरण करती
रहती हैं । उन प्रदेशों में तुम सीताजी का अन्वेषण करो और वहाँ न ठहरकर उत्तर समुद्र
को पार करके सोमाद्रि पर पहुँच जायो । वहाँ ब्रह्मा तथा शिव अविचल समाधि में रहते हैं ।
तब तुम वहाँ से लौटकर एक महीने में समाचार ले आओ ।' इस आदेश के अनुसार शतवली
रामचन्द्र की आज्ञा लेकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ।
इसके पश्चात् रघुराम ने सूर्य-पुत्र को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, तुमने इन सब
प्रदेशों को कब देखा ?' तब सुग्रीव ने कहा—'हे देव, जिस दिन में वालि से भयभीत
होकर भागा था और वालि मेरा पीछा करने लगा था, उस दिन मैंने पृथ्वी के चारों ओर
चक्कर काटकर इन सब प्रदेशों को देखा था ।'
इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हुए । राम की आज्ञा के अनुसार पूर्व तथा पश्चिम
दिशाओं में गये हुए वानर सीता का अन्वेषण करते हुए पृथ्वी के उस भाग तक गये, जहाँ
तक सूर्य की किरणें पहुँचती हैं और वहाँ से लौटकर राम से निवेदन किया कि हम कहीं
भी सीताजी का पता नहीं लगा सके । तब राम तथा सुग्रीव बड़ी उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करते
हुए सोचते रहे कि न जाने अंगद आदि वानर-वीर क्या समाचार लायेंगे ।
अंगद आदि वानर-वीर एक दूसरे से स्पर्धा करते हुए बड़े हर्ष के साथ अपनी
शक्ति तथा प्रताप का प्रदर्शन करते हुए, सुग्रीव के आदेश का अक्षरश पालन करते हुए,
पहले विंध्याचल पर गये । वहाँ की गुफाओं तथा वनों में उन्होंने सीताजी को ढूँढा ।
वहाँ से वे दक्षिण की ओर चले । मार्ग में पड़नेवाली पुष्प-लता-समूहों में, पेड़ों में, नदियों में
पहाड़ों में, तथा नगरों में सीताजी को ढूँढ़ते हुए, वे आगे बढ़ते जाते थे । किन्तु कहीं
भी सीता का पता न लगने से वे बहुत चिंतित थे । वे उस वन में से होकर जाने लगे,
जो महामुनि कडु की शापाग्नि से निर्जन, छायाहीन तथा जल-रहित हो गया था । अपने
दस वर्ष की अवस्था के पुत्र की मृत्यु के तीव्र दुःख से अभिभूत होकर कडु मुनि ने अपने
शाप से उस वन को ऐसा बना दिया था ।
१६. महर्षि कंडु के आश्रम में
वानर अत्यंत क्लांत हो, पानी ढूँढ़ते हुए उस वन में फिर रहे थे । तब एक राक्षस ने
उनका मार्ग रोककर भयंकर गर्जन करके कहा—'मेरे हाथों मरे विना अब तुम कहाँ
जाओगे ? तब अंगद ने क्रुद्ध होकर उस पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस मुँह से
रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा । तब सब वानर थककर एक महान् वृक्ष की छाया
में बैठ गये और प्यास से व्याकुल होते हुए सोचने लगे कि यहाँ जल कहाँ मिलेगा ?
वहाँ उन्होंने एक गुफा के द्वार से कुछ जल-पक्षियों को उड़ते हुए देखा और निश्चय किया
कि अवश्य वहाँ जल मिल सकता है । यो सोचकर उन्होंने उस गुफा में प्रवेश किया ।
गुफा में अंधकार व्याप्त रहने के कारण उन्हें मार्ग न दीखता था । फिर भी धैर्य के साथ,
एक दूसरे का आधार लेते हुए वे आगे बढ़ते गये । कुछ दूर जाने पर मार्ग का अंधकार
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