रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 233, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंगुफा के बाहर पहुँचा दिया और स्वयं फिर उस गुफा में चली गई । सभी वानर-पुगव
उस स्त्री की प्रशंसा करते हुए आगे बढ़े । वे श्रेष्ठ वीर-वानर, मार्ग में पड़नेवाले एक
विशाल सरोवर में जल पीकर फिर महेन्द्राद्रि पर पहुँचे ।
१८. वानरों की व्याकुलता
तब अंगद इस प्रकार दुख करने लगा—'सूर्य-पुत्र की दी हुई अवधि समाप्त
हो गई', किन्तु अबतक सूर्यवंशी (राम) की पत्नी का पता हम नहीं लगा सके । आज्ञा-
पालन को विशेष महत्त्व देनेवाले सुग्रीव, यह कहकर हमारा वध कर देंगे कि इन्होंने मेरी
आज्ञा का उल्लंघन किया । इसलिए कपिराज के दर्शनार्थ हमारा जाना उचित नहीं है ।
हम जिस गुफा से अभी बाहर आये, उसी में प्रवेश करके, वही सुख से रहेंगे । वहाँ का
मार्ग अष्ट-दिक्पालों के लिए भी अभेद्य है । वहाँ के वन विविध प्रकार के पके हुए फलों
से भरे हुए हैं । वहाँ कोई भी प्रवेश नहीं कर पायेगा ।' कुछ वानरों ने अंगद की बातों
का समर्थन किया ।
तब मारुति ने क्रुद्ध होकर कहा—'तुम बड़े बुद्धिमान् हो ! काका की आज्ञा से
बड़े वीर के समान राम का कार्य करने चले । अब चंचल-चित्त हो कपियों के साथ उस
गुफा में प्रवेश करने का जो प्रस्ताव तुम करते हो, क्या यह सूर्य-पुत्र की आज्ञा का
तिरस्कार नहीं हुआ ? मैं, नील, तार और नल—चारों इसके लिए किसी भी प्रकार
सहमत नहीं हो सकते । अन्य वानर भी अपने सगे-संबंधियों को छोड़कर तुम्हारी सेवा में
नहीं रह सकेंगे । इतना ही नहीं, पूर्वकाल में इन्द्र ने अपने वज्र के आघात से उस गुफा
का निर्माण किया था । लक्ष्मण के पास उनके वज्र की समता करनेवाले पैने अस्त्रों की
कमी नहीं है । क्या वे बात-की-बात में तुम्हें और तुम्हारे सैनिक-बल का सर्वनाश नहीं
कर देंगे ? इसलिए यह दुर्बुद्धि छोड़ दो । हम सूर्य-पुत्र की सेवा में पहुँचकर कहेंगे कि हम
सीता को नहीं देख सके । वे तुम्हें और हमें अवश्य ही क्षमा करेंगे । सौजन्य के कारण
मुझ पर, और तुम्हारी माता पर अनुरक्त होने के कारण तुम पर, वे क्रोध नहीं करेंगे ।
तुम उनके पुत्र हो, इसलिए वे तुमको ही राज्य देंगे ।'
तब वालि-पुत्र ने कहा—'मेरे काका पितृ-तुल्य वालि का वध कराके, उनकी स्त्री
के साथ विवाह करके, उपकार करनेवाले राम के कार्य को भूलकर, भोग-विलास में
निमग्न रहे । लक्ष्मण के क्रोध करने पर ही तो वे राम के पास आये । क्या, तुम उनका
नीच व्यवहार नहीं जानते ? ऐसे कृतघ्न तथा कामांध का विश्वास कैसे किया जाय ?
इतना ही क्यों ? श्रीराम का कार्य किये बिना वहाँ पहुँचकर उस रवि-पुत्र के हाथों मरने
की अपेक्षा यहीं मर जाना अच्छा है । अब प्रायोपवेश के लिए तत्पर हो जाओ ।'
ऐसा कहकर अंगद तथा अन्य कपि दर्भ-शय्या पर लेट गये । अपना प्रयत्न विफल
होने से वे मन-ही-मन दुःखी होने लगे । प्रायोपवेश करते रहने से तथा मानसिक पीड़ा
से परितप्त होते रहने से वे बहुत ही निर्बल हो गये । कभी वे उठकर बैठते, कभी लेट
जाते, कभी चारों दिशाओं में शून्य दृष्टियों से देखते, कभी अपने पुत्र तथा सगे-संबंधियों
का स्मरण करते और कहते—'हे भगवान्, आप इस प्रकार हमारे प्राण क्यों लेना चाहते हैं ?