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सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 234, कुल 508 में से

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पृष्ठ 234

फिर सभी वानर अलग-अलग समूहों में एकत्र होकर आपस में कहते—'हाय !
सूर्यकुलसंभव (राम) वन में आये ही क्यों ? अपनी पत्नी को राक्षसों के हाथ में खोया
ही क्यों ? उस राक्षस ने जटायु का वध ही क्यों किया ? राम ने उसको देखा ही क्यों?
उस जटायु ने सीता का समाचार उनसे कहा ही क्यों ? राम पंपा सरोवर के तट पर
आये ही क्यों ? वहाँ उन्होंने सुग्रीव से भेंट ही क्यों की ? सुग्रीव उनके मित्र ही क्यों
बने ? राजकुमार ने वालि का वध ही क्यों किया ? इतनी बड़ी कपि-सेना एकत्र ही
क्यों हुई ? सूर्य-पुत्र ने हमें यहाँ भेजा ही क्यों ? हमारी ऐसी दुर्गति ही क्यों हुई ?
हमारे प्राण व्यर्थ क्यों जायँ ? हाय, कैकेयी के वर ने सूर्यवंश के साथ ही हमारे वंश का
भी सर्वनाश कर दिया ।' इस प्रकार सभी वानर विलाप करने लगे ।

१९. संपाति से भेंट

तब एक विशालकाय, यौवन तथा पंखों से हीन एवं अत्यन्त वृद्ध संपाति नामक
पक्षिराज उस पहाड़ की गुफा से बाहर निकला और मृत्यु की इच्छा करते हुए धरती पर
पड़े हुए वानर-समूह को देखकर धीरे-धीरे उनके समीप आया । वह सोचने लगा कि
भगवान् ने बड़ी कृपा करके मुझे आहार भेजा है । उसे देखकर सभी चपल वानर अपने
निश्चय पर पश्चात्ताप करने लगे । तब अंगद ने हनुमान् से कहा—'यह पक्षी नहीं है ।
स्वयं यम् निर्दयी होकर हमारे प्राण लेने के लिए इस रूप में आया है । उस दिन जटायु ने,
राम की पत्नी को चुराकर ले जानेवाले रावण के साथ युद्ध करके उसके प्रखर खड्ग के
प्रहार से मृत्यु प्राप्त की और फलतः सहज ही स्वर्ग का लाभ कर लिया । अब राम के
कार्य के लिए आये हुए हम भी इस महाबली के हाथों में अपने प्राण खो दें, तो अच्छा ही
होगा ।' उनकी बातों को सुनते ही अरुण-पुत्र (संपाति) का कंठ शोक से गद्गद
हो गया । वह उन कपि-वीरों के निकट जाकर पूछने लगा—'हे वानरो, तुम कहाँ से आये हो ?
वह जटायु मेरा प्रिय अनुज है । हम दोनों अरुण के पुत्र हैं । वह पैने तथा भयंकर
नखोंवाला, गुफा के समान मुखवाला, दशरथ का मित्र, सन्त सुखी मृत्यु को कैसे प्राप्त
हुआ ?' तब वालि-पुत्र ने उसे सारा समाचार कह सुनाया । उस समाचार को सुनकर
संपाति अत्यधिक शोक से संतप्त हुआ । दुःखी होनेवाले उस पक्षी को वानरों ने उठाकर
समीप ही रहनेवाले समुद्र के पास पहुँचा दिया, तो उसने समुद्र में स्नान किया और
उसके पश्चात् बड़े दुःख से पीड़ित होते हुए अपनी पूर्व-कथा उन वानरों से कहने लगा ।
उसने कहा—'मैं और जटायु, हम दोनों किसी समय कैलास पर्वत पर एक साथ
रहते थे । अपने यौवन तथा शक्ति के गर्व से प्रेरित होकर एक दिन प्रभात के समय हम
दोनों साथ-साथ आकाश में उड़ते-उड़ते बहुत दूर चले गये । मध्याह्न के समय हम सूर्य-
मंडल के समीप पहुँचे । जटायु सूर्य की किरणों के लगने से जलने लगा । तब मैंने उसे
अपने पंखों के नीचे छिपा लिया । तब मेरे पक्ष भी जल गये । पंखों के जल जाने से,
अपनी सारी शक्ति खोकर, मैं इस आश्रम-भूमि में गिर पड़ा । पता नहीं, जटायु कहाँ चला गया ।
तुम लोगों से यह समाचार सुनकर भी मैं आज चुप बैठा हुआ हूँ । यदि पहले
की तरह मेरे पक्ष होते, तो मैं अपनी शक्ति से अपने भाई का प्रतिशोध लेता और राम