रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ से चौदह योजन से अधिक की दूरी पर स्थित मेरु पर्वत पर ढूँढना । उस मेरु पर्वत
के चारो ओर चक्कर काटनेवाले सूर्य के चरणों में वन्दना करना और उसी प्रकार वाल-
खिल्य आदि को भी प्रणाम करना। उसके पश्चात् उदयाद्रि में भी सीताजी का अन्वेषण करके
रावण के निवास-का पता लगाकर हमें समाचार देना । (उदयाद्रि के) उस पार की भूमि
पर रवि का प्रकाश न पडने के कारण, वहाँ सदा अधकार व्याप्त रहता है । अत मैं
वहाँ के प्रदेशो के सवध में नही जानता । तुम तुरन्त यहाँ से प्रस्थान करो और एक मास
के भीतर वापस लौट आओ । ऐसा न करने से तुम्हें अपमानित होना पडेगा ।'
तब विनत ने वालि के भाई सूर्य-पुत्र को अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम किया
और एक लाख वानरो को साथ लेकर पूर्व की दिशा में प्रस्थान कर गया । इसके पश्चात्
सूर्य-पुत्र ने सुशीर, नील, हनुमान्, अगद, जाववान्, गज, गधमादन, गवाक्ष, विजय, मैन्द,
द्विविद और तार आदि वानरो को बुलाकर कहा—'अब तुम योग्य वानरो को साथ लेकर
शीघ्र दक्षिण दिशा में चल पडो । विंध्याचल से प्रारभ करके तुम नर्मदा तथा दशार्ण
नगर में ढूंढना । फिर दण्डकवन में अवश्य उनकी खोज करना । वहाँ से चलकर गोदावरी
के तट पर ढूंढना, फिर वेत्रवती के निकट देखना । तदनतर तुम कलिंग तथा निष्ध देशो
में अन्वेषण करना । फिर कर्णाटक, आध्र, चोल, चेर, केरल, तथा पाण्ड्य देशो में ढूंढना ।
तत्पश्चात् मलय-पर्वत तथा कावेरी के किनारे देखना, फिर अगस्त्य के आश्रम में जाना
और उस महात्मा की आज्ञा प्राप्त करके ताम्रपर्णी नदी को पार करना । उसके बाद
समुद्र के तट पर स्थित वनो में ढूंढना, और फिर स्वर्णपुरी में उनकी खोज करना । वहाँ
से बडी तत्परता से महेन्द्र पर्वत पर जाकर देखना, उसके उस पार रहनेवाले विप्रमाद्रि
में ढूंढना, फिर पुष्पाद्री में देखना और क्रैव कुजर नामक पहाड पर अन्वेषण करना । वहाँ
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित अगस्त्य का आश्रम है । वहाँ भी सीता को ढूंढना । उसके पश्चात्
अजना नदी को पार करना । अजना नदी के उस पार भोगवती नामक नगर है, जो मणियो
से पूर्ण तथा फणियो से रक्षित है । तुम अवश्य उस नगर में प्रवेश करके वहाँ सीता का
अन्वेषण करना । वहाँ से चलकर तुम वृषभाद्रि पर जाना । उस पर्वत पर गधर्व, अप्सराएँ
तथा सुर रहते हैं । वहाँ भी तुम सीताजी को ढूंढना और विना विचलित हुए वैंतरणी
पार करके वैवस्वत नगर में चले जाना । वहाँ यम की अनुमति प्राप्त करके समस्त पितृ-
लोक में सीताजी की खोज करना और उनका समाचार जानकर एक महीने के भीतर
अवश्य लौट आना । वैवस्वत नगर के उस पार का प्रदेश अधकारावृत हैं । वहाँ देवता
भी नही जा सकते ।
१५. हनुमान् को मुद्रिका देना
तब वे सब कपिश्रेष्ठ, आनद के समुद्र में गोते लगाते हुए, सूर्य के तेज से भी
अधिक दीप्तिमान् राम-भूपति को अपनी शक्ति का परिचय देते हुए कहने लगे—“हे राजन्,
किसी भी प्रकार से क्यो न हो, हम जानकी का पता लगाये विना वापस नही लौटेंगे ।
तब राम, भावी कार्यों का निश्चय करते हुए बडी कृपापूर्ण दृष्टि मे हनुमान् की ओर
देखकर तथा उन्हें अपने निकट बुलाकर कहा— हे पवनसुत, तुम मेरे निकट आओ । तुम