रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
आत्म-चरित्र 21
को कत्ल किया जाए, उनकी महिलाओं की बेइज्जती हो, आदि। किंतु यह सब
स्वप्न है”। “यह सब स्वप्न है” इन्हीं शब्दों को पढ़कर डिप्टी कमिश्नर कहता
कि हम तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते।
स्वामी सोमदेव भ्रमण करते हुए बंबई पहुँचे। वहाँ पर आपके उपदेशों को
सुनकर जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा। एक व्यक्ति, जो श्री अबुल कलाम आजाद
के बड़े भाई थे, आपका व्याख्यान सुनकर मोहित हो गए। वह आपको अपने घर
ले गए। इस समय तक आप गेरुआ कपड़ा नहीं पहनते थे। केवल एक लुंगी
और कुर्ता पहनते थे, और साफा बाँधते थे। श्री अबुल कलाम आजाद के पूर्वज
अरब के निवासी थे। आपके पिता के बंबई में बहुत से प्रशंसक थे और कथा
की तरह कुछ धार्मिक ग्रंथ पढ़ने पर हजारों रुपये चढ़ावे में आया करते थे। वह
सज्जन इतने मोहित हो गए कि उन्होंने धार्मिक कथाओं का पाठ करने के लिए
जाना ही छोड़ दिया। वह दिन-रात आपके पास ही बैठे रहते। जब आप उनसे
कहीं जाने को कहते तो वह रोने लगते और कहते कि मैं तो आपके आत्मिक
ज्ञान (आत्मा से संबंधित जानकारी) के उपदेशों पर मोहित हूँ। मुझे संसार में
किसी वस्तु की इच्छा नहीं। आपने एक दिन नाराज होकर उनके धीरे से चपत
मार दी जिससे वे दिन-भर रोते रहे। उनको घर वालों तथा शिष्यों ने बहुत
समझाया किन्तु वह धार्मिक कथा कहने न जाते। यह देखकर उनके शिष्यों को
बड़ा क्रोध आया कि हमारे धर्मगुरु एक काफिर के चक्कर में फँस गए हैं। एक
संध्या को स्वामी जी अकेले समुद्र के तट पर भ्रमण करने गए थे कि कई मुरीद
मकान पर बंदूक लेकर स्वामी जी को मार डालने के लिए आए। यह समाचार
जानकर उन्होंने स्वामीजी के प्राणों का भय देख स्वामीजी से बंबई छोड़ देने की
प्रार्थना की। प्रातःकाल एक स्टेशन पर स्वामीजी को तार मिला कि आपके प्रेमी
श्री अबुल कलाम आजाद के भाई साहब ने आत्महत्या कर ली। तार पाकर
आपको बड़ा क्लेश हुआ। जिस समय आपको इन बातों का स्मरण हो आता था
तो बड़े दुखी होते थे। मैं एक संध्या के समय आपके निकट बैठा था, अंधेरा
22 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
काफी हो गया था। स्वामीजी ने बड़ी गहरी ठंडी साँस ली। मैंने चेहरे की ओर
देखा तो आँखों से आँसू बह रहे थे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने कई घंटे
प्रार्थना की, तब आपने उपरोक्त विवरण सुनाया।
अंग्रेजी की योग्यता आपकी बड़ी उच्चकोटि की थी। आपका शास्त्र-विषयक
ज्ञान बड़ा गंभीर था। आप बड़े निर्भीक वक्ता थे। आपकी योग्यता को देखकर
एक बार मद्रास की कांग्रेस कमेटी ने आपको अखिल भारतीय कांग्रेस का
प्रतिनिधि चुनकर भेजा था। आगरा की आर्य मित्र सभा के वार्षिकोत्सव पर
आपके व्याख्यानों को श्रवण कर राजा महेन्द्र प्रताप जी बड़े मुग्ध हुए थे। राजा
साहब ने आपके पैर छुए और आपको अपनी कोठी पर लिवा ले गए। उस समय
से राजा साहब बहुधा आपके उपदेश सुना करते और आपको अपना गुरु मानते
थे। इतना साफ निर्भीक बोलने वाला मैंने आज तक नहीं देखा। सन् 1913 ई.
में मैंने आपका पहला व्याख्यान शाहजहाँपुर में सुना था। आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव
पर आप पधारे थे। उस समय आप बरेली में निवास करते थे। आपका शरीर
बहुत दुबला-पतला था, क्योंकि आपको एक अजीब रोग हो गया था। आप जब
शौच जाते थे, तब आपके खून गिरता था। कभी दो छटाँक, कभी चार छटाँक
और कभी-कभी तो एक सेर तक खून गिर जाता था। बवासीर आपको नहीं थी।
ऐसा कहते थे कि किसी प्रकार योग की क्रिया बिगड़ जाने से पेट की आँत में
कुछ विकार उत्पन्न हो गया। आँत सड़ गई। पेट चिरवाकर आँत कटवानी पड़ी
और तभी से यह रोग हो गया था। बड़े-बड़े वैद्य-डाक्टरों की औषधिं की किन्तु
कुछ लाभ नहीं हुआ। इतने कमजोर होने पर भी जब व्याख्यान देते तब इतने
जोर से बोलते कि तीन-चार फर्लांग से आपका व्याख्यान साफ सुनाई देता था।
दो-तीन वर्ष तक आपको हर साल आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर बुलाया जाता।
सन् 1915 ई. में कतिपय सज्जनों की प्रार्थना पर आप आर्यसमाज मंदिर
शाहजहाँपुर में ही निवास करने लगे। इसी समय से मैंने आपकी सेवा में समय
व्यतीत करना आरंभ कर दिया।
आत्म-चरित्र 23
'स्वामीजी मुझे धार्मिक तथा राजनीतिक उपदेश देते थे और इस प्रकार की
पुस्तकें पढ़ने का भी आदेश देते थे। राजनीति में भी आपका ज्ञान उच्च कोटि
का था। लाला हरदयाल से आपका बहुत परामर्श होता था। एक बार महात्मा
मुंशीरामजी (स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानंदजी) को आपने पुलिस के प्रकोप से बचाया।
आचार्य रामदेवजी तथा श्री कृष्णजी से आपका बड़ा स्नेह था। राजनीति में आप
मुझसे अधिक खुलते न थे। आप मुझसे बहुधा कहा करते थे कि एंट्रेंस पास कर
लेने के बाद यूरोप-यात्रा अवश्य करना। इटली जाकर महात्मा मेजिनी⁵ की
जन्मभूमि के दर्शन अवश्य करना। सन् 1916 ई. में लाहौर षड्यंत्र का मामला
चला। मैं समाचार-पत्रों में उसका सब वृत्तांत बड़े चाव से पढ़ा करता था। श्री
भाई परमानंदजी में मेरी बड़ी श्रद्धा थी, क्योंकि उनकी लिखी हुई "तवारीख
हिन्द" पढ़कर मेरे हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। लाहौर षड्यंत्र का फैसला
अखबारों में छपा। भाई परमानंदजी को फाँसी की सजा पढ़कर मेरे शरीर में आग
लग गई।—⁶ मैंने विचारा कि अंग्रेज बड़े अत्याचारी हैं, इनके राज्य में न्याय नहीं,
जो इतने बड़े महानुभाव को फाँसी की सजा का हुक्म दे दिया। मैंने प्रतिज्ञा की
कि इसका बदला अवश्य लूँगा। जीवन-भर अंग्रेजी राज्य को नष्ट करने का प्रयत्न
करता रहूँगा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा कर चुकने के पश्चात् मैं स्वामीजी के पास
आया। सब समाचार सुनाए और अखबार दिया। अखबार पढ़कर स्वामीजी बड़े
दुखित हुए। तब मैंने अपनी प्रतिज्ञा के संबंध में कहा। स्वामीजी कहने लगे कि
प्रतिज्ञा करना सरल है, किन्तु उस पर दृढ़ रहना कठिन है। मैंने स्वामीजी को
प्रणाम कर उत्तर दिया कि यदि श्रीचरणों की कृपा रहेगी तो प्रतिज्ञा-पूर्ति में किसी
प्रकार की त्रुटि न करूँगा। उस दिन से स्वामीजी कुछ-कुछ खुले। आप बहुत-सी
बातें बताया करते थे। उसी दिन से मेरे क्रांतिकारी जीवन का सूत्रपात हुआ।
यद्यपि आप आर्यसमाज के सिद्धांतों को सर्वप्रकारेण मानते थे किन्तु परमहंस
रामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ तथा महात्मा कबीरदास के उपदेशों
का वर्णन प्रायः किया करते थे।
क्रान्तिकारी जीवन का प्रारम्भ, मैनपुरी षड्यन्त्र व मातृवेदी दल
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24 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
धार्मिक तथा आत्मिक जीवन में जो दृढ़ता मुझमें उत्पन्न हुई, वह स्वामीजी
महाराज के सदुपदेशों का ही परिणाम है। आपकी दया से ही मैं ब्रह्मचर्य-पालन में
सफल हुआ। आपने मेरे भविष्य-जीवन के संबंध में जो-जो बातें कही थीं, वे
अक्षरशः सत्य हुईं। आप कहा करते थे कि दुख है कि यह शरीर न रहेगा और
तेरे जीवन में बड़ी विचित्र-विचित्र समस्याएँ आएँगी, जिनको सुलझाने वाला कोई
न मिलेगा। यदि यह शरीर नष्ट न हुआ, जो असंभव है, तो तेरा जीवन भी
संसार में एक आदर्श जीवन होगा। मेरा दुर्भाग्य था कि जब आपके अंतिम दिन
बहुत निकट आं गए, तब आपने मुझे योगाभ्यास संबंधी कुछ क्रियाएँ बताने की
इच्छा प्रकट की, किन्तु आप इतनें दुर्बल हो गए थे कि जरा-सा परिश्रम करने या
दस-बीस कदम चलने पर ही आपको बेहोशी आ जाती थी। आप फिर कभी इस
योग्य न हो सके कि कुछ देर बैठकर कुछ क्रियाएँ मुझे बता सकते। आपने कहा
था, मेरा योग भ्रष्ट हो गया। प्रयत्न करूँगा, मरण समय पास रहना, मुझसे पूछ
लेना कि मैं कहाँ जन्म लूँगा। संभव है कि मैं बता सकूँ। नित्य-प्रति सेर-आध-सेर
खून गिर जाने पर भी आप कभी भी क्षुब्ध न होते थे। आपकी आवाज़ भी कभी
कमजोर न हुई। जैसे अद्वितीय आप वक्ता थे, वैसे ही आप लेखक भी थे।
आपके कुछ लेख तथा पुस्तकें आपके एक भक्त के पास थीं, जो यों ही नष्ट हो
गईं। कुछ लेख तथा पुस्तकें श्री स्वामी अनुभवानंदजी शांत ले गए थे। कुछ लेख
आपने प्रकाशित भी कराए थे। लगभग 48 वर्ष की उम्र में आपका निधन हो
गया। इस स्थान पर मैं महात्मा कबीरदास के कुछ अमृत वचनों का उल्लेख
करता हूँ, जो मुझे बड़े प्रिय तथा शिक्षाप्रद मालूम हुए :
'कबिरा' शरीर सराय है भाड़ा देके बस।
जब भठियारी खुश रहे तब जीवन का रस।। 1।।
'कबिरा' क्षुधा है कूक़री करत भजन में भंग।
याको टुकरा डारि के सुमिरन करो निशंक।। 2।।
आत्म-चरित्र 25
'नींद निसारी मीच की उठ्ठ 'कबिरा' जाग।
और रसायन त्याग के नाम रसायन चाख।। 3।।
चलना है रहना नहीं चलना बिसयें बीस।
'कबिरा' ऐसे सुहाग पर कौन बँधावे सीस।। 4।।
अपने-अपने चोर को सब कोई डारे मारि।
मेरा चोर जो मोहिं मिले सर्बस डारूँ वारि।। 5।।
कहे सुने की है नहीं देखा देखी बात।
दूल्हा दुल्हिन मिलि गए सूनी परी बरात।। 6।।
नैनन की करि कोठरी पुतरी पलंग बिछाय।
पलकन की चिक डारि के पीतम लेह रिझाय।। 7।।
प्रेम पियाला जो पिये सीस दच्छिना देय।
लोभी सीस न दै सके, नाम प्रेम का लेय।। 8।।
सीस उतारे भुइँ धरै, तापे राखै पाँव।
दास 'कबिरा' यूँ कहै ऐसा होय तो आव।। 9।।
निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छबाय।
बिन पानी साबुन उज्ज्वल करे सुभाय।। 10।।
ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन
वर्तमान समय में इस देश की कुछ ऐसी दुर्दशा हो रही है कि जितने धनी
तथा गणमान्य व्यक्ति हैं, उनमें 99 प्रतिशत ऐसे हैं जो अपनी संतान-रूपी अमूल्य
धन-राशि को अपने नौकर तथा नौकरानियों के हाथ में सौंप देते हैं। उनकी जैसी
इच्छा हो, वे उन्हें बनावें। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति भी अपने व्यवसाय तथा नौकरी
इत्यादि में फँसे रहने के कारण संतान की ओर अधिक ध्यान नहीं दे सकते।
सस्ता कामचलाऊ नौकर या नौकरानी रखते हैं और उन्हीं पर बाल-बच्चों का भार
सौंप देते हैं, वे नौकर बच्चों को नष्ट करते हैं। यदि कुछ भगवान की दया हो
26 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गई, और, बच्चे नौकर-नौकरानियों के हाथ से बच गए तो मुहल्ले की गंदगी से
बचना बड़ा कठिन है। रहे-सहे स्कूल में पहुँचकर पारंगत हो जाते हैं। कालिज
पहुँचते-पहुँचते आजकल के नवयुवकों के सोलहों संस्कार हो जाते हैं। कालिज में
पहुँचकर ये लोग समाचार-पत्रों में दिए हुए औषधियों के विज्ञापन देख-देखकर
दवाइयों को मँगा-मँगाकर धन नष्ट करना आरंभ करते हैं। 95 प्रतिशत की आँखें
खराब हो जाती हैं। कुछ को शारीरिक दुर्बलता तथा कुछ को फैशन के विचार से
ऐनक लगाने की बुरी आदत पड़ जाती है। सौन्दर्योपासना तो उनकी रग-रग में
कूट-कूट कर भर जाती है। शायद ही कोई विद्यार्थी ऐसा हो जिसकी प्रेम कथाएँ
प्रचलित न हों। ऐसी अजीब-अजीब बातें सुनने में आती हैं कि जिनका उल्लेख
करने से भी ग्लानि होती है। यदि कोई विद्यार्थी सच्चरित्र बनने का प्रयत्न भी
करता है और स्कूल या कालिज जीवन में उसे कुछ अच्छी शिक्षा भी मिल
जाती है, तो परिस्थितियाँ जिनमें उसे निर्वाह करना पड़ता है, उसे सुधरने नहीं
देतीं। वे विचारते हैं कि थोड़ा-सा इस जीवन का आनंद ले लें, यदि कुछ
खराबी पैदा हो गई तो दवाई खाकर पौष्टिक पदार्थों का सेवन करके दूर कर
लेंगे। यह उनकी बड़ी भारी भूल है। अंग्रेजी की कहावत है "ओनली फॉर वन्स
एंड फॉर एवर"।
तात्पर्य यह है कि यदि एक समय कोई बात पैदा हुई, मानो सदा के लिए
रास्ता खुल गया। दवाइयाँ कोई लाभ नहीं पहुँचातीं। अंडों का जूस, मछली के
तेल, मांस आदि पदार्थ भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं। सबसे आवश्यक बात चरित्र
सुधारना ही होती है। विद्यार्थियों तथा उनके अध्यापकों के लिए उचित है कि वे
देश की दुर्दशा पर दया करके अपने चरित्र को सुधारने का प्रयत्न करें। सार में
ब्रह्मचर्य ही संसारी शक्तियों का मूल है, बिना ब्रह्मचर्य-व्रत पालन किए मनुष्य-जीवन
नितांत शुष्क तथा नीरस प्रतीत होता है। विद्या, बल और बुद्धि सब ब्रह्मचर्य के
प्रताप से ही प्राप्त होते हैं। संसार में जितने बड़े आदमी हुए हैं, उनमें से
अधिकतर ब्रह्मचर्य-व्रत के प्रताप से ही बड़े बने और सैकड़ों-हजारों वर्ष बाद भी
आत्म-चरित्र 27
उनका यशगान करके मनुष्य अपने आपको कृतार्थ करते हैं। ब्रह्मचर्य की महिमा
यदि जानना हो तो परशुराम, राम, लक्ष्मण, कृष्ण, भीष्म, ईसा, मेजिनी, बंदा,
रामकृष्ण, दयानंद तथा राममूर्ति की जीवनियों का अध्ययन करो।
जिन विद्यार्थियों को बाल्यावस्था में कोई बुरी आदत पड़ जाती है, या जो
बुरी संगत में पड़कर अपना आचरण बिगाड़ लेते हैं और फिर अच्छी शिक्षा पाने
पर आचरण सुधारने का प्रयत्न करते हैं, परंतु सफल मनोरथ नहीं होते, उन्हें भी
निराश नहीं होना चाहिए। मनुष्य-जीवन अभ्यासों का एक समूह है। मनुष्य के
मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक विचार तथा भाव उत्पन्न होते रहते हैं। उनमें
जो उसे रुचिकर होते हैं, वे प्रथम कार्य-रूप में परिणत होते हैं। क्रिया के
बार-बार होने से ऐच्छिक भाव निकल जाता है और उसमें तात्कालिक प्रेरणा उत्पन्न
हो जाती है। इन तात्कालिक प्रेरक क्रियाओं को, जो पुनरावृत्ति का फल है,
"अभ्यास" कहते हैं। मानवी चरित्र इन्हीं अभ्यासों द्वारा बनता है। अभ्यास से
तात्पर्य आदत, स्वभाव, बान है। अभ्यास अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होते हैं।
यदि हमारे मन में निरंतर अच्छे विचार उत्पन्न हों, तो उनका फल अच्छे अभ्यास
होंगे और यदि मन बुरे विचारों में लिप्त रहे, तो निश्चय ही अभ्यास बुरे होंगे।
मन इच्छाओं का केन्द्र है। इन्हीं की पूर्ति के लिए मनुष्य को प्रयत्न करना पड़ता
है। अभ्यासों के बनने में पैतृक संस्कार, अर्थात माता-पिता के अभ्यासों के
अनुसार अनुकरण ही बच्चों के अभ्यास का सहायक होता है। दूसरे, जैसी
परिस्थितियों में निवास होता है, वैसे ही अभ्यास भी पड़ते हैं। तीसरे, प्रयत्न से
भी अभ्यासों का निर्माण होता है। यह शक्ति इतनी प्रबल हो सकती है कि इसके
द्वारा मनुष्य पैतृक संसार तथा परिस्थितियों को भी जीत सकता है। हमारे जीवन
का प्रत्येक कार्य अभ्यासों के अधीन है। यदि अभ्यासों द्वारा हमें कार्य में सुगमता
न प्रतीत होती, तो हमारा जीवन बड़ा दुखमय प्रतीत होता। लिखने का अभ्यास,
वस्त्र पहनना, पठन-पाठन इत्यादि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। यदि हमें प्रारंभिक
समय की भाँति सदैव सावधानी से काम लेना हो, तो कितनी कठिनाई प्रतीत हो।
28 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
इसी प्रकार बालक का खड़ा होना और चलना भी है कि उस समय वह कितना
कष्ट अनुभव करता है, किन्तु एक मनुष्य मीलों तक चला जाता है। बहुत लोग
तो चलते-चलते नींद भी ले लेते हैं। जैसे जेल में बाहरी दीवार पर घड़ी में चाबी
लगाने वाले, जिन्हें बराबर छः घंटे चलना होता है, वे प्रायः चलते-चलते सो लिया
करते हैं।
मानसिक भावों को शुद्ध रखते हुए अंतःकरण को उच्च विचारों में बलपूर्वक
संलग्न करने का अभ्यास करने से अवश्य सफलता मिलेगी। प्रत्येक विद्यार्थी या
नवयुवक को, जोकि ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करने की इच्छा रखता है, उचित है
कि अपनी दिनचर्या निश्चित करे। खान-पान आदि का विशेष ध्यान रखे।
महात्माओं के जीवन-चरित्र तथा चरित्र-गठन संबंधी पुस्तकों का अवलोकन करें।
प्रेमालाप तथा उपन्यासों में समय नष्ट न करे। खाली समय अकेला न बैठे। जिस
समय कोई बुरे विचार उत्पन्न हों, तुरंत शीतल जलपान कर घूमने लगे या किसी
अपने से बड़े के पास जाकर बातचीत करने लगे। अश्लील (इश्कभरी) ग़ज़लों,
शेरों तथा गानों को न पढ़े और न सुने।
विद्यार्थी प्रातःकाल सूर्य उदय होने से एक घंटा पहले शैया त्याग कर
शौचादि से निवृत्त हो व्यायाम करे या वायु-सेवनार्थ बाहर मैदान में जाए। सूर्य
उदय होने के पाँच-दस मिनट पूर्व स्नान से निवृत्त होकर यथा-विश्वास परमात्मा
का ध्यान करे। सदैव कुएँ के ताजे जल से स्नान करे। यदि कुएँ का जल प्राप्त
न हो तो जाड़ों में जल को थोड़ा-सा गुनगुना कर ले और गर्मियों में शीतल जल
से स्नान करे। स्नान करने के पश्चात् एक खुरखुरे तौलिए या अँगोछे से शरीर
खूब मले। उपासना के पश्चात् थोड़ा-सा जलपान करे। कोई फल, शुष्क मेवा, दूध
अथवा सबसे उत्तम यह है कि गेहूँ का दलिया रंधवाकर यथा-रुचि मीठा या नमक
डालकर खाए। फिर अध्ययन करे और दस बजे से ग्यारह बजे के मध्य में भोजन
कर ले। भोजन में मांस, मछली, चरपरे, खट्टे, गरिष्ठ, बासी तथा उत्तेजक पदार्थों
का त्याग करे। प्याज, लहसुन, लाल मिर्च, आम की खटाई और अधिक मसालेदार
आत्म-चरित्र 29
भोजन कभी न खाए। सात्विक भोजन करे। शुष्क भोजन का भी त्याग करे। जहाँ
तक हो साग-सब्जी अधिक खाए। भोजन खूब चबा-चबा कर करे। अधिक गरम
या अधिक् ठंडा भोजन भी वर्जित है। स्कूल अथवा कालिज से आकर थोड़ा-सा
आराम करके एक घंटा लिखने का काम करके खेलने के लिए जाए। मैदान में
थोड़ा-सा घूमे भी। घूमने के लिए चौक बाजार की गंदी हवा में जाना ठीक नहीं।
स्वच्छ वायु का सेवन करे। संध्या समय भी शौच अवश्य जाए। थोड़ा-सा ध्यान
करके हल्का-सा भोजन कर ले। रात्रि के समय साढ़े दस बजे तक पठन-पाठन
करे और फिर सो जाए। सदैव खुली हवा में सोना चाहिए। बहुत मुलायम और
चिकने बिस्तर पर न सोए। अधिक पाठ न करना हो तो साढ़े नौ या दस बजे
सो जाए। प्रातःकाल साढ़े तीन या चार बजे उठकर कुल्ला करके शीतल जलपान
करे और शौच से निवृत्त हो पठन-पाठन करे। सूर्योदय के निकट फिर नित्य की
भाँति व्यायाम या भ्रमण करे। सब व्यायामों में दंड-बैठक सर्वोत्तम है। जहाँ जी
चाहे, व्यायाम कर लो। यदि हो सके तो प्रोफेसर राममूर्ति की विधि से दंड-बैठक
करे। प्रोफेसर साहब की रीति विद्यार्थियों के लिए लाभदायक है। थोड़े समय में ही
पर्याप्त परिश्रम हो जाता है। दंड-बैठक के अलावा शीर्षासन और पद्मासन का
भी अभ्यास करना चाहिए और अपने कमरे में वीरों और महात्माओं के चित्र
रखने चाहिएँ।
द्वितीय खण्ड
स्वदेश-प्रेम
पूज्यपाद श्रीस्वामी सोमदेव का देहांत हो जाने के पश्चात् जब मैं अंग्रेजी के
नवें दर्जे में आया, कुछ स्वदेश संबंधी पुस्तकों का अवलोकन आरंभ हुआ।
शाहजहाँपुर में सेवा-समिति की नींव पं. श्रीराम वाजपेयीजी ने डाली, उसमें भी बड़े
उत्साह से कार्य किया। दूसरों की सेवा का भाव हृदय में उदय हुआ। कुछ समझ
में आने लगा कि वास्तव में देशवासी बड़े दुखी हैं। उसी वर्ष मेरे पड़ोसी तथा
मित्र, जिनसे मेरा स्नेह अधिक था, एंट्रेंस की परीक्षा पास करके कालिज में शिक्षा
पाने चले गए। कालिज की स्वतंत्र वायु में उनके हृदय में भी स्वदेश के भाव
उत्पन्न हुए। उसी साल लखनऊ में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ।
मैं भी उसमें सम्मिलित हुआ। कतिपय सज्जनों से भेंट हुई। देश-दशा का कुछ
अनुमान हुआ, और निश्चय हुआ कि देश के लिए कोई विशेष कार्य किया जाए।
देश में जो कुछ हो रहा है उसकी उत्तरदायी सरकार ही है। भारतवासियों के दुख
तथा दुर्दशा की जिम्मेदारी सरकार पर ही है, अतएव सरकार को पलटने का
प्रयत्न करना चाहिए। मैंने भी इस प्रकार के विचारों में योग दिया। कांग्रेस में
महात्मा तिलक के पधारने की खबर थी, इस कारण से गरम दल के अधिक
व्यक्ति आए हुए थे। कांग्रेस के सभापति का स्वागत बड़ी धूमधाम से हुआ था।
उसके दूसरे दिन लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की स्पेशल गाड़ी आने का
समाचार मिला। लखनऊ स्टेशन पर बड़ा जमाव था। स्वागतकारिणी समिति के
स्वदेश-प्रेम 31
सदस्यों से मालूम हुआ कि लोकमान्य का स्वागत केवल स्टेशन पर ही किया
जाएगा और शहर में सवारी नहीं निकाली जाएगी जिसका कारण यह था कि
स्वागतकारिणी समिति के प्रधान पं. जगतनारायणजी थे। अन्य गण्यमान सदस्यों में
पं. गोकरणनाथजी तथा अन्य उदार दल वालों (माडरेटों) की संख्या अधिक थी।
माडरेटों को भय था कि यदि लोकमान्य की सवारी शहर में निकाली गई तो
कांग्रेस के प्रधान से भी अधिक सम्मान होगा, जिसे वे उचित न समझते थे।
अतः उन सबने प्रबंध किया कि जैसे ही लोकमान्य तिलक पधारें, उन्हें मोटर में
बिठाकर शहर के बाहर-बाहर निकाल ले जाएँ। इन सब बातों को सुनकर
नवयुवकों को बड़ा खेद हुआ। कालेज के एक एम.ए. के विद्यार्थी ने इस प्रबंध
का विरोध करते हुए कहा कि लोकमान्य का स्वागत अवश्य होना चाहिए। मैंने
भी इस विद्यार्थी के कथन में सहयोग दिया। इसी प्रकार कई नवयुवकों ने निश्चय
किया कि जैसे ही लोकमान्य, स्पेशल रेलगाड़ी से उतरें उन्हें घेरकर गाड़ी में बिठा
लिया जाए और सवारी निकाली जाए। स्पेशल रेलगाड़ी आने पर लोकमान्य सबसे
पहले उतरे। स्वागतकारिणी के सदस्यों ने कांग्रेस के स्वयं-सेवकों का घेरा बनाकर
लोकमान्य को मोटर में जां बिठाया। मैं तथा एक एम.ए. का विद्यार्थी मोटर के
आगे लेट गए। सब कुछ समझाया गया, मगर किसी की एक न सुनी। हम लोगों
की देखा-देखी और कई नवयुवक भी मोटर के सामने आकर बैठ गए। उस समय
मेरे उत्साह का यह हाल था कि मुँह से बात न निकलती थी, केवल रोता था
और कहता था, “मोटर मेरे ऊपर से निकाल ले जाओ।” स्वागतकारिणी के
सदस्यों से कांग्रेस के प्रधान को ले जाने वाली गाड़ी माँगी, उन्होंने देना स्वीकार
न किया। एक नवयुवक ने मोटर का टायर काट दिया। लोकमान्य जी बहुत कुछ
समझाते किन्तु वहाँ सुनता कौन ? एक किराए की गाड़ी से घोड़े खोलकर
लोकमान्य के पैरों पर सिर रख उन्हें उसमें बिठाया और सबने मिलकर हाथों से
गाड़ी खींचनी शुरु की। इस प्रकार लोकमान्य का इस धूमधाम से स्वागत हुआ
कि किसी नेता की उतने जोरों से सवारी न निकाली गई। लोगों के उत्साह का
32 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
यह हाल था कि कहते थे कि एक बार गाड़ी में हाथ लगा लेने दो, जीवन सफल
हो जाए। लोकमान्य पर फूलों की जो वर्षा की जाती थी, उसमें से जो फूल नीचे
गिर जाते थे उन्हें उठाकर लोग पल्ले में बाँध लेते थे। जिस स्थान पर लोकमान्य
के पैर पड़ते, वहाँ की धूल सबके माथों पर दिखाई देती। कुछ उस धूल को भी
अपने रुमाल में बाँध लेते थे। इस स्वागत से माडरेटों की बड़ी भद्द हुई।
क्रांतिकारी आंदोलन
कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर लखनऊ में ही मालूम हुआ कि एक
गुप्त समिति है, जिसका मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेना है। यहीं
से क्रांतिकारी समिति की चर्चा सुनकर कुछ समय बाद मैं भी क्रांतिकारी समिति
के कार्य में योग देने लगा। अपने एक मित्र द्वारा क्रांतिकारी समिति का सदस्य
हो गया। थोड़े ही दिनों में मैं कार्यकारिणी का सदस्य बना लिया गया। समिति
में धन की बहुत कमी थी, उधर हथियारों की भी जरूरत थी। जब घर वापस
आया, तब विचार हुआ कि एक पुस्तक प्रकाशित की जाए और उसमें जो लाभ
हो उससे हथियार खरीदे जाएँ। पुस्तक प्रकाशित कराने के लिए धन कहाँ से
आए? विचार करते-करते मुझे एक चाल सूझी। मैंने अपनी माताजी से कहा कि
मैं कुछ रोजगार करना चाहता हूँ, उसमें अच्छा लाभ होगा। यदि रुपये दे सकें तो
बड़ा अच्छा हो। उन्होंने 200 रुपये दिए। “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली”
नामक पुस्तक लिखी जा चुकी थी। प्रकाशित होने का प्रबंध हो गया। थोड़े रुपये
की जरूरत और पड़ी, मैंने माताजी से 200 रुपये और लिए। पुस्तक की बिक्री
हो जाने पर माताजी के रुपये पहले चुका दिए। लगभग 200 रुपये और बचे।
पुस्तकें अभी बिकने के लिए बहुत बाकी थीं। उसी समय “देशवासियों से
निवेदन” नामक एक पर्चा छपवाया गया, क्योंकि पं. गेंदालालजी, ब्रह्मचारीजी के
दल सहित ग्वालियर में गिरफ्तार हो गए थे। अब सब विद्यार्थियों ने अधिक
उत्साह के साथ काम करने की प्रतिज्ञा की। पर्चे कई जिलों में लगाए गए और
स्वदेश-प्रेम 33
बाँटे गए। पर्चे तथा “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली” पुस्तक दोनों संयुक्त
प्रांत की सरकार ने जब्त कर लिए।
हथियारों की खरीद
अधिकतर लोगों का विचार है कि देशी राज्यों में हथियार (रिवाल्वर,
पिस्तौल तथा राइफलें इत्यादि) सब कोई रखता है, और बंदूक आदि पर लाइसेंस
नहीं होता। अतएव इस प्रकार के अस्त्र बड़ी सुगमता से प्राप्त हो सकते हैं। देशी
राज्यों में हथियारों पर कोई लाइसेंस नहीं, यह बात बिल्कुल ठीक है और हर एक
को बंदूक आदि रखने की आज़ादी भी है। किंतु कारतूसी हथियार बहुत कम
लोगों के पास रहते हैं, जिसका कारण यह है कि कारतूस या विलायती बारूद
खरीदने पर पुलिस में सूचना देनी होती है। राज्य में तो कोई ऐसी दुकान नहीं
होती, जिस पर कारतूस या कारतूसी हथियार मिल सकें। यहाँ तक कि विलायती
बारूद और बंदूक की टोपी भी नहीं मिलती, क्योंकि ये सब चीजें बाहर से मँगानी
पड़ती हैं। जितनी चीजें इस प्रकार की बाहर से मँगाई जाती हैं, उनके लिए
रेजिडेंट (गवर्नमेंट का प्रतिनिधि, जो रियासतों में रहता है) की आज्ञा लेनी पड़ती
है। बिना रेजिडेंट की मंजूरी के हथियारों संबंधी कोई चीज बाहर से रियासत में
नहीं आ सकती। इस कारण इस खटखट से बचने के लिए रियासत में ही
टोपीदार बंदूकें बनती हैं और देशी बारूद भी वहीं के लोग शोरा, गंधक तथा
कोयला मिलाकर बना लेते हैं। बंदूक की टोपी चुरा-छिपाकर मँगा लेते हैं। नहीं
तो टोपी के स्थान पर भी मनसल और पुटाश अलग-अलग पीसकर दोनों को
मिलाकर उसी से काम चलाते हैं। हथियार रखने की आज़ादी होने पर भी गाँवों
में किसी एक-दो धनी या जमींदार के यहाँ टोपीदार बंदूक या टोपीदार छोटे
पिस्तौल होते हैं, जिसमें ये लोग रियासत की बनी हुई बारूद काम में लाते हैं।
यह बारूद बरसात में सील खा जाती है और काम नहीं देती। एक बार मैं
अकेला रिवाल्वर खरीदने गया। उस समय मैं समझता था कि हथियारों की दूकान
34 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
होगी, सीधे जाकर दाम देंगे और रिवाल्वर लेकर चले आएँगे। प्रत्येक दूकान देखी,
कहीं किसी पर बंदूक आदि का विज्ञापन या कोई दूसरा निशान न पाया। फिर
एक ताँगे पर सवार होकर सब शहर घूमा। ताँगे वाले ने पूछा कि क्या चाहिए।
मैंने उससे डरते-डरते अपना उद्देश्य कहा। उसी ने दो-तीन दिन घूम-फिरकर
एक टोपीदार रिवाल्वर खरीदवा दिया और देशी बनी हुई बारूद एक दूकान से
दिला दी। मैं कुछ जानता तो था नहीं, एकदम दो सेर बारूद खरीदी, जो घर पर
संदूक में रखे-रखे बरसात में सील खाकर पानी हो गई। मुझे बड़ा दुख हुआ।
दूसरी बार जब मैं क्रांतिकारी समिति का सदस्य हो चुका था, तब दूसरे सहयोगियों
की राय से दो सौ रुपये लेकर हथियार खरीदने गया। इस बार मैंने बहुत प्रयत्न
किया तो एक कबाड़ी की-सी दूकान पर कुछ तलवारें, खंजर, कटार तथा दो-चार
टोपीदार बंदूकें रखी देखीं। मैंने बड़ा साहस करके उससे पूछा कि क्या आप ये
चीजें बेचते हैं, उसने जब हाँ में उत्तर दिया तो मैंने दो-चार चीजें देखीं। दाम
पूछे। इसी प्रकार वार्तालाप करके पूछा कि क्या आप कारतूसी हथियार नहीं बेचते
या और कहीं नहीं बिकते। तब उसने सब विवरण सुनाया। उस समय उसके पास
टोपीदार एक नली के छोटे-छोटे दो पिस्तौल थे। मैंने वे दोनों खरीद लिए। एक
कटार भी खरीदी। उसने वादा किया कि यदि आप फिर आएँ तो कुछ कारतूसी
हथियार जुटाने का प्रयत्न किया जाए। लालच बुरी बला है, इस कहावत के
अनुसार तथा इसलिए भी कि हम लोगों को कोई दूसरा ऐसा जरिया भी न था,
जहाँ से हथियार मिल सकते, मैं कुछ दिनों बाद फिर गया। इस समय उसी ने
एक बड़ा सुंदर कारतूसी रिवाल्वर दिया। कुछ पुराने कारतूस दिए। रिवाल्वर था तो
पुराना, किन्तु बड़ा ही उत्तम था। दाम उसके नए के बराबर देने पड़े। अब उसे
विश्वास हो गया कि यह हथियारों के खरीदार हैं। उसने प्राणपण-से चेष्टा की
और कई रिवाल्वर तथा दो-तीन राइफलें जुटाईं। उसे भी अच्छा लाभ हो जाता
था। प्रत्येक वस्तु पर वह बीस-तीस रुपये मुनाफा ले लेता था। किसी-किसी चीज़
पर दूना नफा खा लेता था।
स्वदेश-प्रेम 35
इसके बाद हमारी संस्था के दो-तीन सदस्य मिलकर गए। दूकानदार ने भी
हमारी उत्कट इच्छा को देखकर इधर-उधर से पुराने हथियारों को खरीदकर उनकी
मरम्मत की, और नया-सा करके हमारे हाथ बेचना शुरू किया। खूब ठगा। हम
लोग कुछ जानते नहीं थे। इस प्रकार अभ्यास करने से कुछ नया पुराना समझने
लगे। एक दूसरे सिक्लीगर से भेंट हुई। वह स्वयं कुछ नहीं जानता था, किन्तु
उसने वचन दिया कि वह कुछ रईसों से हमारी भेंट करा देगा। उसने एक रईस
से मुलाकात कराई जिसके पास एक रिवाल्वर था। रिवाल्वर खरीदने की हमने
इच्छा प्रकट की। उन महाशय ने उस रिवाल्वर के डेढ़ सौ रुपये माँगे। रिवाल्वर
नया था। बड़े कहने-सुनने पर सौ कारतूस उन्होंने दिए और 155 रुपये लिए।
150 रुपये उन्होंने स्वयं लिए और 5 रुपये सिक्लीगर को कमीशन के तौर पर
देने पड़े। रिवाल्वर चमकता हुआ नया था, समझे अधिक दामों का होगा। खरीद
लिया। विचार हुआ कि इस प्रकार ठगे जाने से काम न चलेगा। किसी प्रकार
कुछ जानने का प्रयत्न किया जाए। बड़ी कोशिश के , बाद कलकत्ता, बंबई से
बंदूक-विक्रेताओं की लिस्टें मँगाकर देखीं, देखकर आँखें खुल गईं। जितने रिवाल्वर
या बंदूकें हमने खरीदे थे, एक को छोड़ सबके दुगने दाम दिए थे। 155 रुपये के
रिवाल्वर के दाम केवल 30 रुपये ही थे और 10 रुपये के सौ कारतूस, इस
प्रकार कुल सामान 40 रुपये का था, जिसके बदले 155 रुपये देने पड़े। बड़ा खेद
हुआ। करें तो क्या करें। और कोई दूसरा जरिया भी तो न था।
कुछ समय पश्चात कारखानों की लिस्टें लेकर तीन-चार सदस्य मिलकर गए।
खूब जाँच-खोज की। किसी प्रकार रियासत की पुलिस को पता चल गया। एक
खुफिया पुलिस वाला मुझे मिला, उसने कई हथियार दिलाने का वादा किया, और
वह मुझे पुलिस इंस्पेक्टर के घर ले गया। दैवात् उस समय पुलिस इंस्पेक्टर घर
पर मौजूद न थे। उनके द्वार पर एक पुलिस का सिपाही बैठा था, जिसे मैं
भली-भाँति जानता था। मुहल्ले में खुफिया पुलिस वाले की आँख बचाकर पूछा कि
अमुक घर किसका है ? मालूम हुआ पुलिस इंस्पेक्टर का। मैं जैसे-तैसे निकल
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आया। और अतिशीघ्र अपने ठहरने का स्थान बदल लिया। उस समय हम लोगों
के पास दो राइफलें, चार रिवाल्वर तथा दो पिस्तौल खरीदे हुए मौजूद थे। किसी
प्रकार उस खुफिया पुलिस वाले को एक कारीगर से, जहाँ पर हम अपने हथियारों
की मरम्मत कराते थे, मालूम हुआ कि हम में से एक व्यक्ति उसी दिन जाने
वाला था, उसने चारों ओर स्टेशन पर तार दिलवाए। रेलगाड़ियों की तलाशी ली
गई। पर पुलिस की असावधानी के कारण हम बाल-बाल बच गए।
रुपये की चपत बुरी होती है। एक पुलिस सुपरिटेंडेंट के पास एक राइफल
थी। मालूम हुआ वह बेचते हैं। हम लोग पहुँचे। अपने आप को रियासत का
रहने वाला बतलाया। उन्होंने निश्चय करने के लिए बहुत से प्रश्न पूछे, क्योंकि
हम लड़के तो थे ही। पुलिस सुपरिटेंडेंट पेंशनभोगी मुसलमान थे। हमारी बातों पर
उन्हें पूर्ण विश्वास न हुआ। कहा कि अपने थानेदार से लिखा लाओ कि वह तुम्हें
जानता है। मैं गया। जिस स्थान का रहने वाला बताया था, वहाँ के थानेदार का
नाम मालूम किया, और एक-दो जमींदारों के नाम मालूम किए। फिर एक पत्र
लिखा कि मैं उस स्थान के रहने वाले अमुक जमींदार का पुत्र हूँ और वे लोग
मुझे भली-भाँति जानते हैं। उसी पत्र पर जमींदारों के हिन्दी में और पुलिस के
दारोगा के अंग्रेजी में हस्ताक्षर बना, पत्र ले जाकर पुलिस कप्तान को दिया। बड़े
गौर से देखने के बाद वह बोले, "मैं थाने में दर्याफ्त कर लूँ। तुम्हें भी थाने
चलकर इत्तला देनी होगी कि राइफल खरीद रहे हैं।" हम लोगों ने कहा कि
हमने आपके इत्मीनान के लिए इतनी मुसीबत झेली, दस-बारह रुपये खर्च किए,
अगर अब भी विश्वास न हो तो मजबूरी है। हम पुलिस में नहीं जाएँगे। राइफल
के दाम लिस्ट में 180 रुपये लिखे थे, वह 250 रुपये माँगते थे, साथ में दो सौ
कारतूस भी दे रहे थे। कारतूस भरने का सामान भी देते थे, जो लगभग 50
रुपये का होता था। इस प्रकार पुरानी राइफल के नई के समान दाम माँगते थे।
हम लोग भी 250 रुपये देते थे। पुलिस कप्तान ने भी सोचा कि पूरे दाम मिल
रहे हैं। स्वयं वृद्ध हो चुके थे। कोई पुत्र भी नहीं था। अतएव 250 रुपये लेकर
स्वदेश-प्रेम 37
राइफल दे दी। पुलिस में कुछ पूछने न गए। उन्हीं दिनों राज्य के एक उच्च
पदाधिकारी के नौकर से मिलकर उनके यहाँ से रिवाल्वर चोरी कराया। जिसके
दाम लिस्ट में 75 रुपये थे, उसे 100 रुपये में खरीदा। एक माउजर पिस्तौल भी
चोरी कराया, जिसके दांम लिस्ट में उस समय 200 रुपये थे। हमें माउजर
पिस्तौल की प्राप्ति की बड़ी इच्छा थी। बड़े भारी प्रयत्न के बाद यह माउजर
पिस्तौल मिला, जिसका मूल्य 300 रुपये देना पड़ा। कारतूस एक भी न मिला।
हमारे पुराने मित्र कबाड़ी महोदय के पास माउजर पिस्तौल के पचास कारतूस पड़े
थे। उन्होंने बड़ा काम दिया। हममें से किसी ने भी पहले माउजर पिस्तौल देखा
भी न था। कुछ न समझ सके कि कैसे प्रयोग किया जाता है। बड़े कठिन
परिश्रम से उसका प्रयोग समझ में आया।
हमने तीन राइफलें, एक बारह बोर की दोनाली कारतूसी बंदूक, दो टोपीदार
बंदूकें, तीन टोपीदार रिवाल्वर और पाँच कारतूसी रिवाल्वर खरीदे। प्रत्येक हथियार
के साथ पचास या सौ कारतूस भी ले लिए। इन सब में लगभग चार हजार रुपये
व्यय हुए। कुछ कटार तथा तलवारें इत्यादि भी खरीदीं थीं।
मैनपुरी षड्यंत्र
इधर तो हम लोग अपने कार्य में व्यस्त थे, उधर मैनपुरी के एक सदस्य पर
लीडरी का भूत सवार हुआ। उन्होंने अपना पृथक संगठन किया। कुछ अस्त्र-शस्त्र
भी एकत्रित किए। धन की कमी की पूर्ति के लिए एक सदस्य से कहा कि अपने
किसी परिवार के सदस्य के यहाँ डाका डलवाओ। उस सदस्य ने कोई उत्तर न
दिया। उसे आज्ञापत्र दिया गया और मार डालने की धमकी दी गई। वह पुलिस
के पास गया। मामला खुला। मैनपुरी में धर-पकड़ शुरू हो गई। हम लोगों को
भी समाचार मिला। दिल्ली में कांग्रेस का अधिवेशन होने वाला था। विचार किया
गया कि "अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली" नामक पुस्तक, जो यू.पी. सरकार
ने जब्त कर ली थी, कांग्रेस के अवसर पर बेच दी जाए। कांग्रेस के अधिवेशन
38 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
के उत्सव पर मैं शाहजहाँपुर की सेवा-समिति के साथ अपनी एम्बुलेंस की टोली
लेकर गया था। एम्बुलेंस वालों को प्रत्येक स्थान पर बिना रोक जाने की आज्ञा
थी। अधिवेशन पंडाल के बाहर खुले रूप में नवयुवक यह कह कर पुस्तक बेच
रहे थे- “यू.पी. में जब्त किताब “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली”।”
खुफिया पुलिस वालों ने कांग्रेस का कैम्प घेर लिया। सामने ही आर्यसमाज का
कैम्प था। वहाँ पर पुलिस ने पुस्तक विक्रेताओं की तलाशी लेनी आरंभ कर दी।
मैंने कांग्रेस कैम्प पर अपने स्वयंसेवक इसलिए छोड़ दिए कि वे बिना स्वागत
समिति के मंत्री या प्रधान की आज्ञा पाए किसी पुलिस वाले को कैम्प में न
घुसने दें। आर्यसमाज के कैम्प में गया। सब पुस्तकें एक टेंट में जमा थीं। मैंने
अपने ओवरकोट में सब पुस्तकें लपेटीं, जो लगभग दो सौ होंगी और उन्हें कंधे
पर डालकर पुलिस वालों के सामने से निकला। मैं वर्दी पहने था, टोप लगाए हुए
था। एम्बुलेंस का बड़ा-सा लाल बिल्ला मेरे हाथ पर लगा हुआ था, किसी ने कोई
सन्देह भी न किया और पुस्तकें बच गईं।
दिल्ली कांग्रेस से लौटकर शाहजहाँपुर आए। वहाँ भी पकड़-धकड़ शुरु हुई।
हम लोग वहाँ से चलकर दूसरे शहर के एक मकान में ठहरे हुए थे। रात्रि के
समय मकान मालिक ने बाहर से मकान में ताला लगा दिया। ग्यारह बजे के
लगभग हमारा एक साथी बाहर से आया। उसने बाहर से ताला पड़ा देख पुकारा।
हम लोगों को भी संदेह हुआ। सबके सब दीवार पर से उतर कर मकान छोड़कर
चल दिए। अंधेरी रात थी। थोड़ी दूर गए थे कि जोर की आवाज़ आई, “खड़े
हो जाओ कौन जाता है ?” हम लोग सात-आठ थे। समझे कि घिर गए। कदम
उठाना ही चाहते थें कि फिर आवाज़ आई, “खड़े हो जाओ, नहीं तो गोली मारते
हैं।” हम लोग खड़े हो गए। थोड़ी देर में एक पुलिस के दारोगा बंदूक हमारी
तरफ किए हुए, रिवाल्वर कंधे में लटकाए, कई सिपाहियों को लिए हुए आ
पहुँचे। पूछा- “कौन हो ? कहाँ जाते हो ?” हम लोगों ने कहा- “विद्यार्थी हैं,
स्टेशन जाते हैं।” “कहाँ जाओगे ?” “लखनऊ।” उस समय रात के दो बजे थे।
Uploaded By Rajesh Tanti.
स्वदेश-प्रेम ३९
लखनऊ की गाड़ी पाँच बजे जाती थी। दारोगा जी को शक हुआ। लालटेन आई,
हम लोगों के चेहरे रोशनी में देखकर उनका शक जाता रहा। कहने लगे- "रात
के समय लालटेन लेकर चला कीजिए। गलती हुई, माफ कीजिए।" हम लोग भी
सलाम झाड़कर चलते बने। एक बाग में फूँस की मड़ैया पड़ी थी। उसमें जा बैठे।
पानी बरसने लगा। मूसलाधार पानी गिरा। सब कपड़े भीग गए। जमीन पर भी
पानी भर गया। जनवरी का महीना था। खूब जाड़ा पड़ रहा था। रातभर भीगते
और ठिठुरते रहे। बड़ा कष्ट हुआ। प्रातःकाल धर्मशाला में जाकर कपड़े सुखाए।
दूसरे दिन शाहजहाँपुर आकर, बंदूकें जमीन में गाड़कर प्रयाग पहुँचे।
विश्वासघात
प्रयाग (इलाहाबाद) की एक धर्मशाला में दो-तीन दिन निवास करके विचार
किया गया कि एक व्यक्ति बहुत कमजोर है, यदि वह पकड़ा गया तो सब भेद
खुल जाएगा, अतः उसे मार दिया जाए। मैंने कहा- "मनुष्य-हत्या ठीक नहीं।"
पर अंत में निश्चय हुआ कि कल चला जाए और उसकी हत्या कर दी जाए। मैं
चुप हो गया। हम लोग चार सदस्य साथ थे। हम चारों तीसरे पहर झूँसी का
किला देखने गए। जब लौटे तब संध्या हो चुकी थी। उसी समय गंगा पार करके
यमुना-तट पर गए। शौचादि से निवृत्त होकर मैं संध्या समय उपासना करने के
लिए रेती पर बैठ गया। एक महाशय ने कहा- "यमुना के निकट बैठो।" मैं
तट से दूर एक ऊँचे स्थान पर बैठा था। मैं वहीं बैठा रहा। वे तीनों भी मेरे
पास ही आकर बैठ गए। मैं आँखें बंद किए ध्यान कर रहा था। थोड़ी देर में
खट से आवाज़ हुई। समझा कि साथियों में से कोई कुछ कर रहा होगा। तुरंत
ही फायर हुआ। गोली सन से मेरे कान के पास से निकल गई। मैं समझ गया
कि मेरे ऊपर ही फायर हुआ है। मैं रिवाल्वर निकालता हुआ आगे को बढ़ा।
पीछे फिर कर देखा, वह महाशय माउज़र हाथ में लिए मेरे ऊपर गोली चला रहे
हैं। कुछ दिन पहले मुझसे उनका झगड़ा हो चुका था, किन्तु बाद में समझौता हो
40 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गया था। फिर भी उन्होंने यह कार्य किया। मैं भी सामना करने को प्रस्तुत हुआ।
तीसरा फायर करके वह भाग खड़े हुए। उनके साथ प्रयाग में ठहरे हुए दो सदस्य
और भी थे। वे तीनों भाग गए। मुझे देर इसलिए हुई कि मेरा रिवाल्वर चमड़े के
खोल में रखा था। यदि आधा मिनट और उनमें कोई भी खड़ा रह जाता तो मेरी
गोली का निशाना बन जाता। जब सब भाग गए, तब मैं गोली चलाना व्यर्थ
जान, वहाँ से चला आया। मैं बाल-बाल बच गया। मुझसे दो गज के फासले पर
से माउजर पिस्तौल से गोलियाँ चलाई गईं और उस अवस्था में जबकि मैं बैठा
हुआ था। मेरी समझ में नहीं आया कि मैं बच कैसे गया। पहला कारतूस फटा
नहीं। तीन फायर हुए। मैं गद्गद् होकर परमात्मा को स्मरण करने लगा। खुशी में
मुझे मूर्छा आ गई। मेरे हाथ से रिवाल्वर तथा खोल दोनों गिर गए। यदि उस
समय कोई निकट होता तो मुझे आराम से मार सकता था। मेरी यह दशा
लगभग एक मिनट तक रही होगी कि मुझसे किसी ने कहा, “उठ!” मैं उठा।
रिवाल्वर उठा लिया। खोल उठाने का स्मरण ही न रहा। 22 जनवरी की घटना
है। मैं केवल एक कोट और एक तहमद पहने था। बाल बढ़ रहे थे। नंगे सिर,
पैर में जूता भी नहीं। ऐसी हालत में कहाँ जाऊँ ? अनेक विचार उठ रहे थे।
इन्हीं विचारों में डूबा यमुना-तट पर बड़ी देर तक घूमता रहा। ध्यान आया
कि धर्मशाला चलकर ताला तोड़ सामान निकाल लूँ। फिर सोचा कि धर्मशाला
जाने से गोली चलेगी, व्यर्थ में खून होगा। अभी ठीक नहीं। अकेले बदला लेना
उचित नहीं। और कुछ साथियों को लेकर फिर बदला लिया जाएगा। मेरे एक
साधारण मित्र प्रयाग में रहते थे। उनके पास जाकर बड़ी मुश्किल से एक चादर
ली और रेल से लखनऊ आया। लखनऊ आकर बाल बनवाए। धोती-जूता खरीदे,
क्योंकि मेरे पास रुपये थे। रुपये न भी होते तो भी मैं सदैव जो चालीस-पचास
रुपये की सोने की अंगूठी पहने रहता था, उसे काम में ला सकता था। वहाँ से
आकर अन्य सदस्यों से मिलकर सब विवरण कह सुनाया। कुछ दिन जंगल में
रहा। इच्छा थी कि संन्यासी हो जाऊँ। संसार कुछ नहीं। बाद में फिर माताजी के