रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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आत्म-चरित्र 13
किया। कुछ व्यक्तियों ने बड़ी सहानुभूति दिखलाई परंतु रोग ठीक न हो सका।
स्वामीजी मुझे कई प्रकार के उपदेश दिया करते थे। मैं उन उपदेशों को सुनकर
उन पर अमल करने का पूरा प्रयत्न करता था। वास्तव में वह मेरे गुरुदेव तथा
पथ-प्रदर्शक थे। उनकी शिक्षाओं ने मेरे जीवन में आत्मिक बल का संचार किया
जिनके संबंध में मैं अलग से वर्णन करूँगा।
कुछ नवयुवकों ने मिलकर आर्यसमाज मंदिर में आर्य कुमार-सभा खोली थी,
जिसके साप्ताहिक अधिवेशन प्रत्येक शुक्रवार को हुआ करते थे। वहीं पर धार्मिक
पुस्तकों का पठन, विषय-विशेष पर निबंध-लेखन और पठन तथा वाद-विवाद होता
था। कुमार-सभा से ही मैंने जनता के सम्मुख बोलने का अभ्यास किया। प्रायः
कुमार-सभा के नवयुवक मिलकर शहर के मेलों में प्रचार करने जाया करते थे।
बाजारों में व्याख्यान देकर आर्यसमाज के सिद्धांतों का प्रचार करते थे। ऐसा
करते-करते मुसलमानों से बहस होने लगी। अतएव पुलिस ने झगड़े का भय
देखकर बाजारों में व्याख्यान देना बंद करा दिया। आर्यसमाज के सदस्यों ने
कुमार-सभा के प्रयत्न को देखकर उस पर अपना शासन जमाना चाहा, किन्तु
कुमार किसी का अनुचित शासन कब मानने वाले थे। आर्यसमाज के मंदिर में
ताला डाल दिया गया कि कुमार-सभा वाले आर्यसमाज मंदिर में अधिवेशन न
करें। यह भी कहा गया कि यदि वे वहाँ अधिवेशन करेंगे, तो पुलिस को बुलाकर
उन्हें मंदिर से निकलवा दिया जाएगा। कई महीनों तक हम लोग मैदान में अपनी
सभा के अधिवेशन करते रहे, किन्तु बालक ही तो थे, कब तक इस प्रकार कार्य
चला सकते थे ? कुमार-सभा टूट गई। तब आर्यसमाजियों को शांति हुई।
जब लखनऊ में कांग्रेस हुई तो अखिल भारतीय कुमार सम्मेलन का भी
वार्षिक अधिवेशन वहाँ हुआ। उस अवसर पर सबसे अधिक पुरस्कार लाहौर और
शाहजहाँपुर की कुमार सभाओं ने पाए थे, जिनकी प्रशंसा समाचार-पत्रों में
प्रकाशित हुई थी। उन्हीं दिनों मिशन स्कूल के एक विद्यार्थी से मेरा परिचय
हुआ। वह कभी-कभी कुमार-सभा में आ जाया करते थे। मेरे भाषण का उन पर
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अधिक प्रभाव हुआ। वैसे तो वह मेरे मकान के निकट ही रहते थे। किन्तु आपस
में कोई मेल न था। बैठने-उठने से आपस में प्रेम बढ़ गया। वह एक ग्राम के
निवासी थे। जिस गाँव में उनका घर था वह गाँव बड़ा प्रसिद्ध है। वहाँ का
प्रत्येक निवासी अपने घर में बिना लाइसेंस अस्त्र-शस्त्र रखता है। बहुत से लोगों
के यहाँ बंदूक तथा तमंचे भी रहते हैं, जो गाँव में ही बन जाते हैं। ये सब
टोपीदार होते हैं। उनके पास भी एक नाली का छोटा-सा पिस्तौल था जिसे वह
अपने साथ शहर में रखते थे। जब मुझसे अधिक प्रेम बढ़ा तो उन्होंने वह
पिस्तौल मुझे रखने के लिए दिया। इस प्रकार के हथियार रखने की मेरी अधिक
इच्छा थी, क्योंकि मेरे पिता के कई शत्रु थे, जिन्होंने पिताजी पर अकारण ही
लाठियों का प्रहार किया था। मैं चाहता था कि यदि पिस्तौल मिल जाए तो मैं
पिताजी के शत्रुओं को मार डालूँ। यह एक नाली का पिस्तौल वह अपने पास
रखते तो थे, किन्तु उसको चलाकर न देखा था। मैंने उसे चलाकर देखा तो वह
नितांत बेकार सिद्ध हुआ। मैंने उसे ले जाकर एक कोने में डाल दिया। उनसे
स्नेह इतना बढ़ गया कि सायंकाल को मैं अपने घर से खीर की थाली ले जाकर
उनके साथ-साथ उनके मकान पर ही भोजन किया करता था। वह मेरे साथ श्री
स्वामी सोमदेवजी के पास भी जाया करते थे। उनके पिता जब शहर आए तो
उनको यह बड़ा बुरा मालूम हुआ। उन्होंने मुझसे अपने लड़के के पास न आने
या उसे कहीं साथ न ले जाने के लिए बहुत ताड़ना की और कहा कि यदि मैं
उनका कहना न मानूँगा तो वह गाँव से आदमी लाकर मुझे पिटवाएँगे। मैंने उनके
पास जाना-आना त्याग दिया, किन्तु वह मेरे यहाँ आते-जाते रहे।
लगभग अट्ठारह वर्ष की उम्र तक मैं रेल पर न चढ़ा था। मैं इतना दृढ़
सत्यवक्ता हो गया था कि एक समय रेल पर चढ़ कर तीसरे दर्जे का टिकट
खरीदा था, पर इंटर क्लास में बैठकर दूसरों के साथ-साथ चला गया। इस बात
से मुझे बड़ा खेद हुआ। मैंने अपने साथियों से अनुरोध किया कि यह तो एक
प्रकार की चोरी है। सबको मिलकर इंटर क्लास का भाड़ा स्टेशन मास्टर को दे
आत्म-चरित्र १५
देना चाहिए। एक समय मेरे पिताजी दीवानी में किसी पर दावा करके वकील से
कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे करा लें। कुछ आवश्यकता पड़ने पर
वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे
पर कर दूँ। मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म के विरुद्ध होगा, इस प्रकार
का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत कुछ समझाया कि
एक सौ रुपये से अधिक का दावा है, मुकदमा खारिज हो जाएगा। किन्तु मुझ
पर कुछ भी प्रभाव न हुआ, न मैंने हस्ताक्षर किए। अपने जीवन में हमेशा सत्य
का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था।
मेरी माता मेरे धर्म-कार्यों में तथा शिक्षादि में बड़ी सहायता करती थीं। वह
प्रातःकाल चार बजे ही मुझे जगा दिया करती थीं। मैं नित्य-प्रति नियमपूर्वक हवन
किया करता था। मेरी छोटी बहन का विवाह करने के लिए माताजी और पिताजी
ग्वालियर गए। मैं और श्री दादीजी शाहजहाँपुर में ही रह गए, क्योंकि मेरी
वार्षिक परीक्षा थी। परीक्षा समाप्त करके मैं भी बहन के विवाह में सम्मिलित होने
को गया। बारात आ चुकी थी। मुझे गाँव के बाहर ही मालूम हो गया कि बारात
में वेश्या आई है। मैं घर न गया और न बारात में सम्मिलित हुआ। मैंने विवाह
में कोई भी भाग न लिया। मैंने माताजी से थोड़े रुपये माँगे। माताजी ने मुझे
लगभग 125 रुपये दिए, जिनको लेकर मैं ग्वालियर गया। यह अवसर रिवाल्वर
खरीदने का अच्छा लगा। मैंने सुन रखा था कि रियासत में बड़ी आसानी से
हथियार मिल जाते हैं। बड़ी खोज की। टोपीदार बंदूक तथा पिस्तौल तो मिलते
थे, किन्तु कारतूसी हथियारों का कहीं पता नहीं लगा। पता लगा भी तो एक
महाशय ने मुझे ठग लिया और 75 रुपये में टोपीदार पाँच फायर करने वाला एक
रिवाल्वर दिया। रियासत की बनी हुई बारूद और थोड़ी-सी टोपियाँ दे दीं। मैं इसी
को लेकर बड़ा प्रसन्न हुआ। सीधा शाहजहाँपुर पहुँचा। रिवाल्वर को भरकर
चलाया तो गोली केवल पंद्रह या बीस गज पर ही गिरी, क्योंकि बारूद अच्छी न
थी। मुझे बड़ा खेद हुआ। माताजी भी जब लौट कर शाहजहाँपुर आईं तो उन्होंने
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मुझसे पूछा कि क्या लाए ? मैंने कुछ कह कर टाल दिया। रुपये सब खर्च हो
गए थे। शायद एक गिन्नी बची थी, सो मैंने माताजी को लौटा दी।
मुझे जब किसी बात के लिए धन की आवश्यकता होती तो मैं माताजी से
कहता और वह मेरी माँग पूरी कर देती थीं। मेरा स्कूल घर से एक मील दूर
था। मैंने माताजी से प्रार्थना की कि मुझे साइकिल ले दें। उन्होंने लगभग एक सौ
रुपये दिए। मैंने साइकिल खरीद ली। उस समय मैं अंग्रेजी के नवें दर्जे में आ
गया था। किसी धार्मिक या देश संबंधी पुस्तक पढ़ने की इच्छा होती तो माताजी
से ही दाम ले जाता। लखनऊ कांग्रेस जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी। दादीजी
और पिताजी तो बहुत विरोध करते रहे, किन्तु माताजी ने मुझे खर्च दे ही दिया।
उसी समय शाहजहाँपुर में सेवा-समिति का आरंभ हुआ था। मैं बड़े उत्साह के
साथ सेवा-समिति में सहयोग देता था। पिताजी और दादीजी को मेरे इस प्रकार
के कार्य अच्छे न लगते थे, किन्तु माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं,
जिसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डाँट-फटकार तथा दंड भी सहन करना
पड़ता था। वास्तव में, मेरी माताजी स्वर्गीय देवी हैं। मुझमें जो कुछ जीवन तथा
साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही
परिणाम है। दादीजी और पिताजी मेरे विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किन्तु
माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा।
माताजी के प्रोत्साहन तथा सद्व्यवहार ने मेरे जीवन में वह दृढ़ता उत्पन्न की कि
किसी आपत्ति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा।
मेरी माँ
ग्यारह वर्ष की उम्र में माताजी विवाह कर शाहजहाँपुर आई थीं। उस समय
वह नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान थीं। शाहजहाँपुर आने के थोड़े
दिनों बाद श्री दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को
गृहकार्य की शिक्षा दी। थोड़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ
आत्म-चरित्र 17
लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं। मेरे जन्म होने के पाँच या
सात वर्ष बाद उन्होंने हिन्दी पढ़ना आरंभ किया। पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही
पैदा हुआ था। मुहल्ले की सखी-सहेली जो घर पर आया करती थीं, उन्हीं में जो
शिक्षित थीं, माताजी उनसे अक्षर-बोध करतीं। इस प्रकार, घर का सब काम कर
चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं। परिश्रम के
फल से थोड़े दिनों में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं। मेरी
बहनों को छोटी आयु में, माताजी ही उन्हें शिक्षा दिया करती थीं। जब से मैंने
आर्यसमाज में प्रवेश किया, तब से माताजी से खूब वार्तालाप होता। उस समय
की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गए हैं। यदि मुझे ऐसी माता न
मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन
निर्वाह करता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही
सहायता की है, जैसी मेजिनी-5 की उनकी माता ने की थी। यथासमय मैं उन
सारी बातों का उल्लेख करूँगा। माताजी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यही था
कि किसी की प्राणहानि न हो। उनका कहना था कि अपने शत्रु को भी कभी
प्राण दंड न देना। उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक
बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।
जन्मदात्री जननी ! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण उतारने के प्रयत्न करने
का भी अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या यदि अनेक जन्मों में भी सारे
जीवन, प्रयत्न करूँ तो भी तुमसे उऋण नहीं हो सकता। जिस प्रेम तथा दृढ़ता के
साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है। मुझे जीवन
की प्रत्येक घटना का स्मरण है कि तुमने जिस प्रकार अपनी देव-वाणी का उपदेश
करके मेरा सुधार किया है। तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में संलग्न हो सका।
धार्मिक जीवन में भी तुम्हारे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैंने
ग्रहण की उसका भी श्रेय तुम्हीं को है। जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश
करती थीं, उसका स्मरण कर तुम्हारी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और
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मस्तक झुक जाता है। तुम्हें यदि मुझे ताड़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्नेह से हर
बात को समझा दिया। यदि मैंने धृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुमने प्रेम भरे शब्दों
में यही कहा कि तुम्हें जो अच्छा लगे, वह करो, किन्तु ऐसा करना ठीक नहीं,
इसका परिणाम अच्छा न होगा। जीवनदात्री ! तुमने इस शरीर को जन्म देकर
केवल पालन-पोषण ही नहीं किया किन्तु आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति
में तुम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं। जन्म-जन्मांतर परमात्मा ऐसी ही माता दें।
महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया। सदैव
अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सांत्वना देती रहीं। तुम्हारी दया की
छाया में मैंने अपने जीवन-भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार में मेरी
किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं। केवल एक इच्छा है, वह यह
कि एक बार श्रद्धापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल
बना लेता। किन्तु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुम्हें मेरी मृत्यु की
दुखभरी खबर सुनाई जाएगी। माँ ! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य
धारण करोगी कि तुम्हारा पुत्र माताओं की माता- भारत माता की सेवा में अपने
जीवन को बलि-देवी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कोख कलंकित न की,
अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तो
उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षरों में तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा। गुरु
गोविंदसिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रों की मृत्यु की खबर सुनी तो बहुत
प्रसन्न हुई थीं और गुरु के नाम पर धर्म-रक्षार्थ अपने पुत्रों के बलिदान पर
मिठाई बाँटी थी। जन्मदात्री ! वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार
विचलित न हो और तुम्हारे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण
करता हुआ शरीर-त्याग करूँ।
मेरे गुरुदेव
माताजी के अतिरिक्त जो कुछ जीवन तथा शिक्षा मैंने प्राप्त की वह
पूज्यपाद श्री 108 स्वामी सोमदेवजी की कृपा का परिणाम है। आपका नाम
आत्म-चरित्र 19
श्रीयुत ब्रजलाल चोपड़ा था। पंजाब के लाहौर शहर में आपका जन्म हुआ था।
आपका परिवार प्रसिद्ध था, क्योंकि आपके दादा महाराजा रणजीत सिंह के मंत्रियों
में से एक थे। आपके जन्म के कुछ समय बाद आपकी माता का देहांत हो गया
था। आपकी दादी ने ही आपका पालन-पोषण किया था। आप अपने पिता की
अकेली संतान थे। जब आप बड़े हुए तो चाचियों ने दो-तीन बार आपको जहर
देकर मार देने का प्रयत्न किया, ताकि उनके लड़कों को ही जायदाद का अधिकार
मिल जाए। आपके चाचा आप पर बड़ा स्नेह रखते थे और शिक्षादि की ओर
विशेष ध्यान रखते थे। अपने चचेरे भाइयों के साथ-साथ आप भी अंग्रेजी स्कूल
में पढ़ते थे। जब आपने एंट्रेंस की परीक्षा दी तो परीक्षा-फल प्रकाशित होने पर
आप यूनिवर्सिटी में प्रथम आए और चाचा के लड़के फेल हो गए। घर में बड़ा
शोक मनाया गया। भोजन तक नहीं बना। आपकी प्रशंसा तो दूर, किसी ने उस
दिन भोजन करने को भी न पूछा और बड़ी उपेक्षा की दृष्टि से देखा। आपका
हृदय पहले से ही घायल था, इस घटना से आपके जीवन को और भी बड़ा
आघात पहुँचा।
चाचाजी के कहने-सुनने पर कालिज में नाम लिखा तो लिया, किन्तु बड़े
उदासीन रहने लगे। आपके हृदय में दया बहुत थी। प्रायः अपनी किताबें तथा
कपड़े दूसरे सह-पाठियों को बाँट दिया करते थे। नए कपड़े बाँटकर पुराने कपड़े
स्वयं पहना करते थे। एक-दो बार चाचाजी से दूसरे लोगों ने कहा कि ब्रजलाल
को कपड़े भी आप नहीं बनवा देते, जो वह पुराने फटे-कपड़े पहने फिरते हैं।
चाचाजी को बड़ा आश्चर्य हुआ, क्योंकि उन्होंने कई जोड़े कपड़े थोड़े दिनों पहले
ही बनवाए थे। आपके संदूकों की तलाशी ली गई। उनमें दो-चार जोड़ी पुराने
कपड़े निकले, तब चाचाजी ने पूछा तो मालूम हुआ कि वे नए कपड़े निर्धन
विद्यार्थियों को बाँट दिया करते हैं। चाचाजी ने कहा कि जब कपड़े बाँटने की
इच्छा हो, कह दिया करो, हम विद्यार्थियों को कपड़े बनवा दिया करेंगे, अपने
कपड़े न बाँटा करो। आप प्रायः निर्धन विद्यार्थियों को अपने घर पर ही भोजन
20 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
कराया करते थे। चाचियों तथा चचेरे भाइयों के व्यवहार से आपको बड़ा क्लेश
होता था। इसी कारण से आपने विवाह नहीं किया। घरेलू दुर्व्यवहार से दुखी
होकर आपने घर त्याग देने का निश्चय कर लिया और एक रात को जब सब
सो रहे थे, चुपचाप उठकर घर से निकल गए। कुछ भी सामान साथ में न
लिया। बहुत दिनों तक इधर-उधर भटकते रहे। भटकते-भटकते आप हरिद्वार
पहुँचे। वहाँ एक सिद्ध योगी से भेंट हुई। श्रीं ब्रजलाल जी को जिस वस्तु की
इच्छा थी, वह प्राप्त हो गई। उसी स्थान पर रहकर श्री ब्रजलाल जी ने योग-विद्या
की पूर्ण शिक्षा पाई। योगीराज़ की कृपा से आप 18-20 घंटे की समाधि लगा
लेने लगे। कई वर्ष तक आप वहाँ रहे। इस समय आपको योग का इतना
अभ्यास हो गया था कि अपने शरीर को आप इतना हल्का कर लेते थे कि पानी
पर पृथ्वी के समान चले जाते थे। अब आपको देश-भ्रमण तथा अध्ययन करने
की इच्छा हुई। अनेक स्थानों में भ्रमण करते हुए अध्ययन करते रहे। जर्मनी तथा
अमेरिका से बहुत-सी पुस्तकें मँगाईं, जो शास्त्रों के संबंध में थीं।
जब लाला लाजपतराय को देश-निर्वासन का दंड मिला था, उस समय आप
लाहौर में थे। वहाँ आपने एक समाचार-पत्र की संपादकी के लिए डिक्लेरेशन
दाखिल किया। डिप्टी कमिश्नर उस समय किसी के भी समाचार-पत्र के डिक्लेरेशन
को स्वीकार न करता था। जब आपसे भेंट हुई, तो वह बहुत प्रभावित हुआ और
उसने डिक्लेरेशन मंजूर कर लिया। अखबार का पहला ही अग्रलेख “अंग्रेजों को
चेतावनी” के नाम से निकला। लेख इतना उत्तेजनापूर्ण था कि थोड़ी देर में ही
समाचार-पत्र की सब प्रतियाँ बिक गईं और जनता के अनुरोध पर उसी अंक का
दूसरा संस्करण प्रकाशित करना पड़ा। डिप्टी कमिश्नर के पास रिपोर्ट हुई। उसने
आपको दर्शनार्थ बुलाया। वह बड़ा क्रुद्ध था। लेख को पढ़कर काँपता, और क्रोध
में आकर मेज पर हाथ दे मारता था। किन्तु अंतिम शब्दों को पढ़कर चुप हो
जाता। उस लेख के कुछ शब्द यों थे कि “यदि अंग्रेज अब भी न समझेंगे तो
वह दिन दूर नहीं कि सन् 1857 के दृश्य फिर दिखाई दें और अंग्रेजों के बच्चों
आत्म-चरित्र 21
को कत्ल किया जाए, उनकी महिलाओं की बेइज्जती हो, आदि। किंतु यह सब
स्वप्न है”। “यह सब स्वप्न है” इन्हीं शब्दों को पढ़कर डिप्टी कमिश्नर कहता
कि हम तुम्हारा कुछ नहीं कर सकते।
स्वामी सोमदेव भ्रमण करते हुए बंबई पहुँचे। वहाँ पर आपके उपदेशों को
सुनकर जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ा। एक व्यक्ति, जो श्री अबुल कलाम आजाद
के बड़े भाई थे, आपका व्याख्यान सुनकर मोहित हो गए। वह आपको अपने घर
ले गए। इस समय तक आप गेरुआ कपड़ा नहीं पहनते थे। केवल एक लुंगी
और कुर्ता पहनते थे, और साफा बाँधते थे। श्री अबुल कलाम आजाद के पूर्वज
अरब के निवासी थे। आपके पिता के बंबई में बहुत से प्रशंसक थे और कथा
की तरह कुछ धार्मिक ग्रंथ पढ़ने पर हजारों रुपये चढ़ावे में आया करते थे। वह
सज्जन इतने मोहित हो गए कि उन्होंने धार्मिक कथाओं का पाठ करने के लिए
जाना ही छोड़ दिया। वह दिन-रात आपके पास ही बैठे रहते। जब आप उनसे
कहीं जाने को कहते तो वह रोने लगते और कहते कि मैं तो आपके आत्मिक
ज्ञान (आत्मा से संबंधित जानकारी) के उपदेशों पर मोहित हूँ। मुझे संसार में
किसी वस्तु की इच्छा नहीं। आपने एक दिन नाराज होकर उनके धीरे से चपत
मार दी जिससे वे दिन-भर रोते रहे। उनको घर वालों तथा शिष्यों ने बहुत
समझाया किन्तु वह धार्मिक कथा कहने न जाते। यह देखकर उनके शिष्यों को
बड़ा क्रोध आया कि हमारे धर्मगुरु एक काफिर के चक्कर में फँस गए हैं। एक
संध्या को स्वामी जी अकेले समुद्र के तट पर भ्रमण करने गए थे कि कई मुरीद
मकान पर बंदूक लेकर स्वामी जी को मार डालने के लिए आए। यह समाचार
जानकर उन्होंने स्वामीजी के प्राणों का भय देख स्वामीजी से बंबई छोड़ देने की
प्रार्थना की। प्रातःकाल एक स्टेशन पर स्वामीजी को तार मिला कि आपके प्रेमी
श्री अबुल कलाम आजाद के भाई साहब ने आत्महत्या कर ली। तार पाकर
आपको बड़ा क्लेश हुआ। जिस समय आपको इन बातों का स्मरण हो आता था
तो बड़े दुखी होते थे। मैं एक संध्या के समय आपके निकट बैठा था, अंधेरा
22 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
काफी हो गया था। स्वामीजी ने बड़ी गहरी ठंडी साँस ली। मैंने चेहरे की ओर
देखा तो आँखों से आँसू बह रहे थे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने कई घंटे
प्रार्थना की, तब आपने उपरोक्त विवरण सुनाया।
अंग्रेजी की योग्यता आपकी बड़ी उच्चकोटि की थी। आपका शास्त्र-विषयक
ज्ञान बड़ा गंभीर था। आप बड़े निर्भीक वक्ता थे। आपकी योग्यता को देखकर
एक बार मद्रास की कांग्रेस कमेटी ने आपको अखिल भारतीय कांग्रेस का
प्रतिनिधि चुनकर भेजा था। आगरा की आर्य मित्र सभा के वार्षिकोत्सव पर
आपके व्याख्यानों को श्रवण कर राजा महेन्द्र प्रताप जी बड़े मुग्ध हुए थे। राजा
साहब ने आपके पैर छुए और आपको अपनी कोठी पर लिवा ले गए। उस समय
से राजा साहब बहुधा आपके उपदेश सुना करते और आपको अपना गुरु मानते
थे। इतना साफ निर्भीक बोलने वाला मैंने आज तक नहीं देखा। सन् 1913 ई.
में मैंने आपका पहला व्याख्यान शाहजहाँपुर में सुना था। आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव
पर आप पधारे थे। उस समय आप बरेली में निवास करते थे। आपका शरीर
बहुत दुबला-पतला था, क्योंकि आपको एक अजीब रोग हो गया था। आप जब
शौच जाते थे, तब आपके खून गिरता था। कभी दो छटाँक, कभी चार छटाँक
और कभी-कभी तो एक सेर तक खून गिर जाता था। बवासीर आपको नहीं थी।
ऐसा कहते थे कि किसी प्रकार योग की क्रिया बिगड़ जाने से पेट की आँत में
कुछ विकार उत्पन्न हो गया। आँत सड़ गई। पेट चिरवाकर आँत कटवानी पड़ी
और तभी से यह रोग हो गया था। बड़े-बड़े वैद्य-डाक्टरों की औषधिं की किन्तु
कुछ लाभ नहीं हुआ। इतने कमजोर होने पर भी जब व्याख्यान देते तब इतने
जोर से बोलते कि तीन-चार फर्लांग से आपका व्याख्यान साफ सुनाई देता था।
दो-तीन वर्ष तक आपको हर साल आर्यसमाज के वार्षिकोत्सव पर बुलाया जाता।
सन् 1915 ई. में कतिपय सज्जनों की प्रार्थना पर आप आर्यसमाज मंदिर
शाहजहाँपुर में ही निवास करने लगे। इसी समय से मैंने आपकी सेवा में समय
व्यतीत करना आरंभ कर दिया।
आत्म-चरित्र 23
'स्वामीजी मुझे धार्मिक तथा राजनीतिक उपदेश देते थे और इस प्रकार की
पुस्तकें पढ़ने का भी आदेश देते थे। राजनीति में भी आपका ज्ञान उच्च कोटि
का था। लाला हरदयाल से आपका बहुत परामर्श होता था। एक बार महात्मा
मुंशीरामजी (स्वर्गीय स्वामी श्रद्धानंदजी) को आपने पुलिस के प्रकोप से बचाया।
आचार्य रामदेवजी तथा श्री कृष्णजी से आपका बड़ा स्नेह था। राजनीति में आप
मुझसे अधिक खुलते न थे। आप मुझसे बहुधा कहा करते थे कि एंट्रेंस पास कर
लेने के बाद यूरोप-यात्रा अवश्य करना। इटली जाकर महात्मा मेजिनी⁵ की
जन्मभूमि के दर्शन अवश्य करना। सन् 1916 ई. में लाहौर षड्यंत्र का मामला
चला। मैं समाचार-पत्रों में उसका सब वृत्तांत बड़े चाव से पढ़ा करता था। श्री
भाई परमानंदजी में मेरी बड़ी श्रद्धा थी, क्योंकि उनकी लिखी हुई "तवारीख
हिन्द" पढ़कर मेरे हृदय पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। लाहौर षड्यंत्र का फैसला
अखबारों में छपा। भाई परमानंदजी को फाँसी की सजा पढ़कर मेरे शरीर में आग
लग गई।—⁶ मैंने विचारा कि अंग्रेज बड़े अत्याचारी हैं, इनके राज्य में न्याय नहीं,
जो इतने बड़े महानुभाव को फाँसी की सजा का हुक्म दे दिया। मैंने प्रतिज्ञा की
कि इसका बदला अवश्य लूँगा। जीवन-भर अंग्रेजी राज्य को नष्ट करने का प्रयत्न
करता रहूँगा। इस प्रकार की प्रतिज्ञा कर चुकने के पश्चात् मैं स्वामीजी के पास
आया। सब समाचार सुनाए और अखबार दिया। अखबार पढ़कर स्वामीजी बड़े
दुखित हुए। तब मैंने अपनी प्रतिज्ञा के संबंध में कहा। स्वामीजी कहने लगे कि
प्रतिज्ञा करना सरल है, किन्तु उस पर दृढ़ रहना कठिन है। मैंने स्वामीजी को
प्रणाम कर उत्तर दिया कि यदि श्रीचरणों की कृपा रहेगी तो प्रतिज्ञा-पूर्ति में किसी
प्रकार की त्रुटि न करूँगा। उस दिन से स्वामीजी कुछ-कुछ खुले। आप बहुत-सी
बातें बताया करते थे। उसी दिन से मेरे क्रांतिकारी जीवन का सूत्रपात हुआ।
यद्यपि आप आर्यसमाज के सिद्धांतों को सर्वप्रकारेण मानते थे किन्तु परमहंस
रामकृष्ण, स्वामी विवेकानंद, स्वामी रामतीर्थ तथा महात्मा कबीरदास के उपदेशों
का वर्णन प्रायः किया करते थे।
क्रान्तिकारी जीवन का प्रारम्भ, मैनपुरी षड्यन्त्र व मातृवेदी दल
Uploaded By Rajesh Tanti.
24 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
धार्मिक तथा आत्मिक जीवन में जो दृढ़ता मुझमें उत्पन्न हुई, वह स्वामीजी
महाराज के सदुपदेशों का ही परिणाम है। आपकी दया से ही मैं ब्रह्मचर्य-पालन में
सफल हुआ। आपने मेरे भविष्य-जीवन के संबंध में जो-जो बातें कही थीं, वे
अक्षरशः सत्य हुईं। आप कहा करते थे कि दुख है कि यह शरीर न रहेगा और
तेरे जीवन में बड़ी विचित्र-विचित्र समस्याएँ आएँगी, जिनको सुलझाने वाला कोई
न मिलेगा। यदि यह शरीर नष्ट न हुआ, जो असंभव है, तो तेरा जीवन भी
संसार में एक आदर्श जीवन होगा। मेरा दुर्भाग्य था कि जब आपके अंतिम दिन
बहुत निकट आं गए, तब आपने मुझे योगाभ्यास संबंधी कुछ क्रियाएँ बताने की
इच्छा प्रकट की, किन्तु आप इतनें दुर्बल हो गए थे कि जरा-सा परिश्रम करने या
दस-बीस कदम चलने पर ही आपको बेहोशी आ जाती थी। आप फिर कभी इस
योग्य न हो सके कि कुछ देर बैठकर कुछ क्रियाएँ मुझे बता सकते। आपने कहा
था, मेरा योग भ्रष्ट हो गया। प्रयत्न करूँगा, मरण समय पास रहना, मुझसे पूछ
लेना कि मैं कहाँ जन्म लूँगा। संभव है कि मैं बता सकूँ। नित्य-प्रति सेर-आध-सेर
खून गिर जाने पर भी आप कभी भी क्षुब्ध न होते थे। आपकी आवाज़ भी कभी
कमजोर न हुई। जैसे अद्वितीय आप वक्ता थे, वैसे ही आप लेखक भी थे।
आपके कुछ लेख तथा पुस्तकें आपके एक भक्त के पास थीं, जो यों ही नष्ट हो
गईं। कुछ लेख तथा पुस्तकें श्री स्वामी अनुभवानंदजी शांत ले गए थे। कुछ लेख
आपने प्रकाशित भी कराए थे। लगभग 48 वर्ष की उम्र में आपका निधन हो
गया। इस स्थान पर मैं महात्मा कबीरदास के कुछ अमृत वचनों का उल्लेख
करता हूँ, जो मुझे बड़े प्रिय तथा शिक्षाप्रद मालूम हुए :
'कबिरा' शरीर सराय है भाड़ा देके बस।
जब भठियारी खुश रहे तब जीवन का रस।। 1।।
'कबिरा' क्षुधा है कूक़री करत भजन में भंग।
याको टुकरा डारि के सुमिरन करो निशंक।। 2।।
आत्म-चरित्र 25
'नींद निसारी मीच की उठ्ठ 'कबिरा' जाग।
और रसायन त्याग के नाम रसायन चाख।। 3।।
चलना है रहना नहीं चलना बिसयें बीस।
'कबिरा' ऐसे सुहाग पर कौन बँधावे सीस।। 4।।
अपने-अपने चोर को सब कोई डारे मारि।
मेरा चोर जो मोहिं मिले सर्बस डारूँ वारि।। 5।।
कहे सुने की है नहीं देखा देखी बात।
दूल्हा दुल्हिन मिलि गए सूनी परी बरात।। 6।।
नैनन की करि कोठरी पुतरी पलंग बिछाय।
पलकन की चिक डारि के पीतम लेह रिझाय।। 7।।
प्रेम पियाला जो पिये सीस दच्छिना देय।
लोभी सीस न दै सके, नाम प्रेम का लेय।। 8।।
सीस उतारे भुइँ धरै, तापे राखै पाँव।
दास 'कबिरा' यूँ कहै ऐसा होय तो आव।। 9।।
निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छबाय।
बिन पानी साबुन उज्ज्वल करे सुभाय।। 10।।
ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन
वर्तमान समय में इस देश की कुछ ऐसी दुर्दशा हो रही है कि जितने धनी
तथा गणमान्य व्यक्ति हैं, उनमें 99 प्रतिशत ऐसे हैं जो अपनी संतान-रूपी अमूल्य
धन-राशि को अपने नौकर तथा नौकरानियों के हाथ में सौंप देते हैं। उनकी जैसी
इच्छा हो, वे उन्हें बनावें। मध्यम श्रेणी के व्यक्ति भी अपने व्यवसाय तथा नौकरी
इत्यादि में फँसे रहने के कारण संतान की ओर अधिक ध्यान नहीं दे सकते।
सस्ता कामचलाऊ नौकर या नौकरानी रखते हैं और उन्हीं पर बाल-बच्चों का भार
सौंप देते हैं, वे नौकर बच्चों को नष्ट करते हैं। यदि कुछ भगवान की दया हो
26 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गई, और, बच्चे नौकर-नौकरानियों के हाथ से बच गए तो मुहल्ले की गंदगी से
बचना बड़ा कठिन है। रहे-सहे स्कूल में पहुँचकर पारंगत हो जाते हैं। कालिज
पहुँचते-पहुँचते आजकल के नवयुवकों के सोलहों संस्कार हो जाते हैं। कालिज में
पहुँचकर ये लोग समाचार-पत्रों में दिए हुए औषधियों के विज्ञापन देख-देखकर
दवाइयों को मँगा-मँगाकर धन नष्ट करना आरंभ करते हैं। 95 प्रतिशत की आँखें
खराब हो जाती हैं। कुछ को शारीरिक दुर्बलता तथा कुछ को फैशन के विचार से
ऐनक लगाने की बुरी आदत पड़ जाती है। सौन्दर्योपासना तो उनकी रग-रग में
कूट-कूट कर भर जाती है। शायद ही कोई विद्यार्थी ऐसा हो जिसकी प्रेम कथाएँ
प्रचलित न हों। ऐसी अजीब-अजीब बातें सुनने में आती हैं कि जिनका उल्लेख
करने से भी ग्लानि होती है। यदि कोई विद्यार्थी सच्चरित्र बनने का प्रयत्न भी
करता है और स्कूल या कालिज जीवन में उसे कुछ अच्छी शिक्षा भी मिल
जाती है, तो परिस्थितियाँ जिनमें उसे निर्वाह करना पड़ता है, उसे सुधरने नहीं
देतीं। वे विचारते हैं कि थोड़ा-सा इस जीवन का आनंद ले लें, यदि कुछ
खराबी पैदा हो गई तो दवाई खाकर पौष्टिक पदार्थों का सेवन करके दूर कर
लेंगे। यह उनकी बड़ी भारी भूल है। अंग्रेजी की कहावत है "ओनली फॉर वन्स
एंड फॉर एवर"।
तात्पर्य यह है कि यदि एक समय कोई बात पैदा हुई, मानो सदा के लिए
रास्ता खुल गया। दवाइयाँ कोई लाभ नहीं पहुँचातीं। अंडों का जूस, मछली के
तेल, मांस आदि पदार्थ भी व्यर्थ सिद्ध होते हैं। सबसे आवश्यक बात चरित्र
सुधारना ही होती है। विद्यार्थियों तथा उनके अध्यापकों के लिए उचित है कि वे
देश की दुर्दशा पर दया करके अपने चरित्र को सुधारने का प्रयत्न करें। सार में
ब्रह्मचर्य ही संसारी शक्तियों का मूल है, बिना ब्रह्मचर्य-व्रत पालन किए मनुष्य-जीवन
नितांत शुष्क तथा नीरस प्रतीत होता है। विद्या, बल और बुद्धि सब ब्रह्मचर्य के
प्रताप से ही प्राप्त होते हैं। संसार में जितने बड़े आदमी हुए हैं, उनमें से
अधिकतर ब्रह्मचर्य-व्रत के प्रताप से ही बड़े बने और सैकड़ों-हजारों वर्ष बाद भी
आत्म-चरित्र 27
उनका यशगान करके मनुष्य अपने आपको कृतार्थ करते हैं। ब्रह्मचर्य की महिमा
यदि जानना हो तो परशुराम, राम, लक्ष्मण, कृष्ण, भीष्म, ईसा, मेजिनी, बंदा,
रामकृष्ण, दयानंद तथा राममूर्ति की जीवनियों का अध्ययन करो।
जिन विद्यार्थियों को बाल्यावस्था में कोई बुरी आदत पड़ जाती है, या जो
बुरी संगत में पड़कर अपना आचरण बिगाड़ लेते हैं और फिर अच्छी शिक्षा पाने
पर आचरण सुधारने का प्रयत्न करते हैं, परंतु सफल मनोरथ नहीं होते, उन्हें भी
निराश नहीं होना चाहिए। मनुष्य-जीवन अभ्यासों का एक समूह है। मनुष्य के
मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के अनेक विचार तथा भाव उत्पन्न होते रहते हैं। उनमें
जो उसे रुचिकर होते हैं, वे प्रथम कार्य-रूप में परिणत होते हैं। क्रिया के
बार-बार होने से ऐच्छिक भाव निकल जाता है और उसमें तात्कालिक प्रेरणा उत्पन्न
हो जाती है। इन तात्कालिक प्रेरक क्रियाओं को, जो पुनरावृत्ति का फल है,
"अभ्यास" कहते हैं। मानवी चरित्र इन्हीं अभ्यासों द्वारा बनता है। अभ्यास से
तात्पर्य आदत, स्वभाव, बान है। अभ्यास अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होते हैं।
यदि हमारे मन में निरंतर अच्छे विचार उत्पन्न हों, तो उनका फल अच्छे अभ्यास
होंगे और यदि मन बुरे विचारों में लिप्त रहे, तो निश्चय ही अभ्यास बुरे होंगे।
मन इच्छाओं का केन्द्र है। इन्हीं की पूर्ति के लिए मनुष्य को प्रयत्न करना पड़ता
है। अभ्यासों के बनने में पैतृक संस्कार, अर्थात माता-पिता के अभ्यासों के
अनुसार अनुकरण ही बच्चों के अभ्यास का सहायक होता है। दूसरे, जैसी
परिस्थितियों में निवास होता है, वैसे ही अभ्यास भी पड़ते हैं। तीसरे, प्रयत्न से
भी अभ्यासों का निर्माण होता है। यह शक्ति इतनी प्रबल हो सकती है कि इसके
द्वारा मनुष्य पैतृक संसार तथा परिस्थितियों को भी जीत सकता है। हमारे जीवन
का प्रत्येक कार्य अभ्यासों के अधीन है। यदि अभ्यासों द्वारा हमें कार्य में सुगमता
न प्रतीत होती, तो हमारा जीवन बड़ा दुखमय प्रतीत होता। लिखने का अभ्यास,
वस्त्र पहनना, पठन-पाठन इत्यादि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। यदि हमें प्रारंभिक
समय की भाँति सदैव सावधानी से काम लेना हो, तो कितनी कठिनाई प्रतीत हो।
28 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
इसी प्रकार बालक का खड़ा होना और चलना भी है कि उस समय वह कितना
कष्ट अनुभव करता है, किन्तु एक मनुष्य मीलों तक चला जाता है। बहुत लोग
तो चलते-चलते नींद भी ले लेते हैं। जैसे जेल में बाहरी दीवार पर घड़ी में चाबी
लगाने वाले, जिन्हें बराबर छः घंटे चलना होता है, वे प्रायः चलते-चलते सो लिया
करते हैं।
मानसिक भावों को शुद्ध रखते हुए अंतःकरण को उच्च विचारों में बलपूर्वक
संलग्न करने का अभ्यास करने से अवश्य सफलता मिलेगी। प्रत्येक विद्यार्थी या
नवयुवक को, जोकि ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करने की इच्छा रखता है, उचित है
कि अपनी दिनचर्या निश्चित करे। खान-पान आदि का विशेष ध्यान रखे।
महात्माओं के जीवन-चरित्र तथा चरित्र-गठन संबंधी पुस्तकों का अवलोकन करें।
प्रेमालाप तथा उपन्यासों में समय नष्ट न करे। खाली समय अकेला न बैठे। जिस
समय कोई बुरे विचार उत्पन्न हों, तुरंत शीतल जलपान कर घूमने लगे या किसी
अपने से बड़े के पास जाकर बातचीत करने लगे। अश्लील (इश्कभरी) ग़ज़लों,
शेरों तथा गानों को न पढ़े और न सुने।
विद्यार्थी प्रातःकाल सूर्य उदय होने से एक घंटा पहले शैया त्याग कर
शौचादि से निवृत्त हो व्यायाम करे या वायु-सेवनार्थ बाहर मैदान में जाए। सूर्य
उदय होने के पाँच-दस मिनट पूर्व स्नान से निवृत्त होकर यथा-विश्वास परमात्मा
का ध्यान करे। सदैव कुएँ के ताजे जल से स्नान करे। यदि कुएँ का जल प्राप्त
न हो तो जाड़ों में जल को थोड़ा-सा गुनगुना कर ले और गर्मियों में शीतल जल
से स्नान करे। स्नान करने के पश्चात् एक खुरखुरे तौलिए या अँगोछे से शरीर
खूब मले। उपासना के पश्चात् थोड़ा-सा जलपान करे। कोई फल, शुष्क मेवा, दूध
अथवा सबसे उत्तम यह है कि गेहूँ का दलिया रंधवाकर यथा-रुचि मीठा या नमक
डालकर खाए। फिर अध्ययन करे और दस बजे से ग्यारह बजे के मध्य में भोजन
कर ले। भोजन में मांस, मछली, चरपरे, खट्टे, गरिष्ठ, बासी तथा उत्तेजक पदार्थों
का त्याग करे। प्याज, लहसुन, लाल मिर्च, आम की खटाई और अधिक मसालेदार
आत्म-चरित्र 29
भोजन कभी न खाए। सात्विक भोजन करे। शुष्क भोजन का भी त्याग करे। जहाँ
तक हो साग-सब्जी अधिक खाए। भोजन खूब चबा-चबा कर करे। अधिक गरम
या अधिक् ठंडा भोजन भी वर्जित है। स्कूल अथवा कालिज से आकर थोड़ा-सा
आराम करके एक घंटा लिखने का काम करके खेलने के लिए जाए। मैदान में
थोड़ा-सा घूमे भी। घूमने के लिए चौक बाजार की गंदी हवा में जाना ठीक नहीं।
स्वच्छ वायु का सेवन करे। संध्या समय भी शौच अवश्य जाए। थोड़ा-सा ध्यान
करके हल्का-सा भोजन कर ले। रात्रि के समय साढ़े दस बजे तक पठन-पाठन
करे और फिर सो जाए। सदैव खुली हवा में सोना चाहिए। बहुत मुलायम और
चिकने बिस्तर पर न सोए। अधिक पाठ न करना हो तो साढ़े नौ या दस बजे
सो जाए। प्रातःकाल साढ़े तीन या चार बजे उठकर कुल्ला करके शीतल जलपान
करे और शौच से निवृत्त हो पठन-पाठन करे। सूर्योदय के निकट फिर नित्य की
भाँति व्यायाम या भ्रमण करे। सब व्यायामों में दंड-बैठक सर्वोत्तम है। जहाँ जी
चाहे, व्यायाम कर लो। यदि हो सके तो प्रोफेसर राममूर्ति की विधि से दंड-बैठक
करे। प्रोफेसर साहब की रीति विद्यार्थियों के लिए लाभदायक है। थोड़े समय में ही
पर्याप्त परिश्रम हो जाता है। दंड-बैठक के अलावा शीर्षासन और पद्मासन का
भी अभ्यास करना चाहिए और अपने कमरे में वीरों और महात्माओं के चित्र
रखने चाहिएँ।
द्वितीय खण्ड
स्वदेश-प्रेम
पूज्यपाद श्रीस्वामी सोमदेव का देहांत हो जाने के पश्चात् जब मैं अंग्रेजी के
नवें दर्जे में आया, कुछ स्वदेश संबंधी पुस्तकों का अवलोकन आरंभ हुआ।
शाहजहाँपुर में सेवा-समिति की नींव पं. श्रीराम वाजपेयीजी ने डाली, उसमें भी बड़े
उत्साह से कार्य किया। दूसरों की सेवा का भाव हृदय में उदय हुआ। कुछ समझ
में आने लगा कि वास्तव में देशवासी बड़े दुखी हैं। उसी वर्ष मेरे पड़ोसी तथा
मित्र, जिनसे मेरा स्नेह अधिक था, एंट्रेंस की परीक्षा पास करके कालिज में शिक्षा
पाने चले गए। कालिज की स्वतंत्र वायु में उनके हृदय में भी स्वदेश के भाव
उत्पन्न हुए। उसी साल लखनऊ में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन हुआ।
मैं भी उसमें सम्मिलित हुआ। कतिपय सज्जनों से भेंट हुई। देश-दशा का कुछ
अनुमान हुआ, और निश्चय हुआ कि देश के लिए कोई विशेष कार्य किया जाए।
देश में जो कुछ हो रहा है उसकी उत्तरदायी सरकार ही है। भारतवासियों के दुख
तथा दुर्दशा की जिम्मेदारी सरकार पर ही है, अतएव सरकार को पलटने का
प्रयत्न करना चाहिए। मैंने भी इस प्रकार के विचारों में योग दिया। कांग्रेस में
महात्मा तिलक के पधारने की खबर थी, इस कारण से गरम दल के अधिक
व्यक्ति आए हुए थे। कांग्रेस के सभापति का स्वागत बड़ी धूमधाम से हुआ था।
उसके दूसरे दिन लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की स्पेशल गाड़ी आने का
समाचार मिला। लखनऊ स्टेशन पर बड़ा जमाव था। स्वागतकारिणी समिति के
स्वदेश-प्रेम 31
सदस्यों से मालूम हुआ कि लोकमान्य का स्वागत केवल स्टेशन पर ही किया
जाएगा और शहर में सवारी नहीं निकाली जाएगी जिसका कारण यह था कि
स्वागतकारिणी समिति के प्रधान पं. जगतनारायणजी थे। अन्य गण्यमान सदस्यों में
पं. गोकरणनाथजी तथा अन्य उदार दल वालों (माडरेटों) की संख्या अधिक थी।
माडरेटों को भय था कि यदि लोकमान्य की सवारी शहर में निकाली गई तो
कांग्रेस के प्रधान से भी अधिक सम्मान होगा, जिसे वे उचित न समझते थे।
अतः उन सबने प्रबंध किया कि जैसे ही लोकमान्य तिलक पधारें, उन्हें मोटर में
बिठाकर शहर के बाहर-बाहर निकाल ले जाएँ। इन सब बातों को सुनकर
नवयुवकों को बड़ा खेद हुआ। कालेज के एक एम.ए. के विद्यार्थी ने इस प्रबंध
का विरोध करते हुए कहा कि लोकमान्य का स्वागत अवश्य होना चाहिए। मैंने
भी इस विद्यार्थी के कथन में सहयोग दिया। इसी प्रकार कई नवयुवकों ने निश्चय
किया कि जैसे ही लोकमान्य, स्पेशल रेलगाड़ी से उतरें उन्हें घेरकर गाड़ी में बिठा
लिया जाए और सवारी निकाली जाए। स्पेशल रेलगाड़ी आने पर लोकमान्य सबसे
पहले उतरे। स्वागतकारिणी के सदस्यों ने कांग्रेस के स्वयं-सेवकों का घेरा बनाकर
लोकमान्य को मोटर में जां बिठाया। मैं तथा एक एम.ए. का विद्यार्थी मोटर के
आगे लेट गए। सब कुछ समझाया गया, मगर किसी की एक न सुनी। हम लोगों
की देखा-देखी और कई नवयुवक भी मोटर के सामने आकर बैठ गए। उस समय
मेरे उत्साह का यह हाल था कि मुँह से बात न निकलती थी, केवल रोता था
और कहता था, “मोटर मेरे ऊपर से निकाल ले जाओ।” स्वागतकारिणी के
सदस्यों से कांग्रेस के प्रधान को ले जाने वाली गाड़ी माँगी, उन्होंने देना स्वीकार
न किया। एक नवयुवक ने मोटर का टायर काट दिया। लोकमान्य जी बहुत कुछ
समझाते किन्तु वहाँ सुनता कौन ? एक किराए की गाड़ी से घोड़े खोलकर
लोकमान्य के पैरों पर सिर रख उन्हें उसमें बिठाया और सबने मिलकर हाथों से
गाड़ी खींचनी शुरु की। इस प्रकार लोकमान्य का इस धूमधाम से स्वागत हुआ
कि किसी नेता की उतने जोरों से सवारी न निकाली गई। लोगों के उत्साह का
32 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
यह हाल था कि कहते थे कि एक बार गाड़ी में हाथ लगा लेने दो, जीवन सफल
हो जाए। लोकमान्य पर फूलों की जो वर्षा की जाती थी, उसमें से जो फूल नीचे
गिर जाते थे उन्हें उठाकर लोग पल्ले में बाँध लेते थे। जिस स्थान पर लोकमान्य
के पैर पड़ते, वहाँ की धूल सबके माथों पर दिखाई देती। कुछ उस धूल को भी
अपने रुमाल में बाँध लेते थे। इस स्वागत से माडरेटों की बड़ी भद्द हुई।
क्रांतिकारी आंदोलन
कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर लखनऊ में ही मालूम हुआ कि एक
गुप्त समिति है, जिसका मुख्य उद्देश्य क्रांतिकारी आंदोलन में भाग लेना है। यहीं
से क्रांतिकारी समिति की चर्चा सुनकर कुछ समय बाद मैं भी क्रांतिकारी समिति
के कार्य में योग देने लगा। अपने एक मित्र द्वारा क्रांतिकारी समिति का सदस्य
हो गया। थोड़े ही दिनों में मैं कार्यकारिणी का सदस्य बना लिया गया। समिति
में धन की बहुत कमी थी, उधर हथियारों की भी जरूरत थी। जब घर वापस
आया, तब विचार हुआ कि एक पुस्तक प्रकाशित की जाए और उसमें जो लाभ
हो उससे हथियार खरीदे जाएँ। पुस्तक प्रकाशित कराने के लिए धन कहाँ से
आए? विचार करते-करते मुझे एक चाल सूझी। मैंने अपनी माताजी से कहा कि
मैं कुछ रोजगार करना चाहता हूँ, उसमें अच्छा लाभ होगा। यदि रुपये दे सकें तो
बड़ा अच्छा हो। उन्होंने 200 रुपये दिए। “अमेरिका को स्वाधीनता कैसे मिली”
नामक पुस्तक लिखी जा चुकी थी। प्रकाशित होने का प्रबंध हो गया। थोड़े रुपये
की जरूरत और पड़ी, मैंने माताजी से 200 रुपये और लिए। पुस्तक की बिक्री
हो जाने पर माताजी के रुपये पहले चुका दिए। लगभग 200 रुपये और बचे।
पुस्तकें अभी बिकने के लिए बहुत बाकी थीं। उसी समय “देशवासियों से
निवेदन” नामक एक पर्चा छपवाया गया, क्योंकि पं. गेंदालालजी, ब्रह्मचारीजी के
दल सहित ग्वालियर में गिरफ्तार हो गए थे। अब सब विद्यार्थियों ने अधिक
उत्साह के साथ काम करने की प्रतिज्ञा की। पर्चे कई जिलों में लगाए गए और