रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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आमुख
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् के तत्वावधान में समय-समय पर
किशोरों के लिए विभिन्न प्रकार की पूरक पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन होता रहा है, जिससे
बालकों को विज्ञान एवं अन्य विषयों के विकास की अद्यतन जानकारी प्राप्त होती है। साथ
ही उनको भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं तथा साहित्यिक एवं कलात्मक विरासत की भी
जानकारी मिलती है। इन पूरक पाठ्यपुस्तकों द्वारा बालकों को प्रख्यात विद्वानों, राष्ट्रीय
महापुरुषों, साहित्यिक व्यक्तियों, समाज-सुधारकों एवं लेखकों के जीवन तथा कार्यों का सम्यक्
ज्ञान भी प्राप्त होता है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के तहत तैयार किये गये पाठ्यक्रम में पूरक पठन के लिए
पुस्तकों के पढ़ने की सिफारिश की गई है। यह अपेक्षा की जाती है कि विद्यार्थी पाठ्यपुस्तकों
के अलावा अतिरिक्त पठन के रूप में कुछ पुस्तकें और पढ़ें। अतिरिक्त पठन में बच्चों की
रुचि उत्पन्न करने के लिए परिषद् ने 'अतिरिक्त पठन योजना' के अंतर्गत कुछ पुस्तकें
प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। "रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा" इस श्रृंखला की
पहली कड़ी है। इस पुस्तक का संपादन प्रसिद्ध पत्रकार और लेखक स्व. डॉ. विश्वमित्र
उपाध्याय ने किया है।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर एवं
अध्यक्ष डा. नामवर सिंह के प्रति अत्यंत आभारी हूँ जिन्होंने इस योजना में अपना महत्वपूर्ण
योग दिया एवं मार्गदर्शन भी किया।
सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी शिक्षा विभाग के अध्यक्ष प्रो. अर्जुन देव ने इस योजना
को नई दिशा प्रदान करने में अपना अमूल्य योग दिया। विभाग के सहकर्मी प्रो. रामजन्म शर्मा
ने इस योजना में प्रकाशित होने वाली पुस्तकों का संयोजन किया एवं पांडुलिपियों को अंतिम
रूप प्रदान किया। श्री शिवप्रकाश भसीन ने पुस्तक को तैयार करने में विशेष सहायता की।
मैं इन सभी के प्रति हार्दिक कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।
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इस श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित होने वाली पुस्तकों को सभी दृष्टियों से परिपूर्ण एवं
प्रामाणिक बनाने के लिए राष्ट्रीय स्तर के अनेक विशेषज्ञों, अधिकारी विद्वानों एवं शिक्षकों का
सहयोग प्राप्त किया गया। इन सभी के प्रति मैं विशेष रूप से अनुगृहीत हूँ।
आशा है बालकों की साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं भाषिक योग्यता की अभिवृद्धि में इस
योजना की यह पुस्तक विशेष उपादेय सिद्ध होगी। पुस्तक के बारे में सुविज्ञ जनों द्वारा भेजे
गए सुझावों और परामर्शों का हम स्वागत करेंगे।
अशोक कुमार शर्मा
नई दिल्ली निदेशक
जनवरी 1994 राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्
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प्रस्तावना
शहीद रामप्रसाद बिस्मिल भारत के गौरवपूर्ण क्रांतिकारी आंदोलन के अग्रणी नेता व संगठनकर्ता
थे। यही नहीं बल्कि बिस्मिल बेजोड़ राष्ट्रीय कवि, लेखक व सफल अनुवादक भी थे।
रामप्रसाद बिस्मिल की क्रांतिकारी कार्रवाइयों की तरह उनकी साहित्यिक कृतियों ने स्वतंत्रता-
प्रेमियों को संघर्ष व बलिदान के मार्ग पर अग्रसर किया। स्वतंत्रताप्रेमी जन सभाओं, जेलों की
बैरकों और फाँसी की कोठरियों में बिस्मिल की संघर्ष व बलिदान की भावनाओं से ओतप्रोत
कविताएँ और नज़्में गाते थे। यह पुस्तक इसी क्रांतिवीर रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा है।
इसे पढ़कर आज भी हमारे प्यारे देश के स्वाधीनता संग्राम में किए गए बलिदानों की याद
ताज़ा हो जाती है। रामप्रसाद बिस्मिल ने यह आत्मकथा गोरखपुर जेल में 19 दिसंबर सन्
1927 को हुई अपनी फाँसी से दो दिन पूर्व अत्यंत कठिन परिस्थितियों में लिखकर समाप्त की
थी। बनारसीदास चतुर्वेदी ने लिखा है : "रामप्रसाद बिस्मिल का आत्मचरित्र हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ
आत्मचरित्र है। जिन परिस्थितियों में वह लिखा गया था, उनके बीच में से गुज़रने का मौका
लाखों में से एकाध को ही मिल सकता है।"
बिस्मिल ने अपनी यह आत्मकथा रजिस्टर के साइज के कागजों पर पेंसिल से लिखकर
तीन खेपों में न जाने किस प्रकार गुप्त रूप से गोरखपुर के सुप्रसिद्ध कांग्रेसी नेता दशरथ
प्रसाद द्विवेदी को भिजवाई थी। अंतिम खेप तो फाँसी से एक दिन पूर्व ही द्विवेदीजी के पास
पहुँची थी। द्विवेदीजी ने इसे गणेश शंकर विद्यार्थी को दिया था। विद्यार्थीजी ने इस आत्मकथा
को 'काकोरी के शहीद' नामक पुस्तक के प्रारंभ में प्रकाशित कराया था। यह आत्मकथा
ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण कृति है। इसमें रामप्रसाद बिस्मिल के अभाव-ग्रस्त
पारिवारिक जीवन, उनके सद्चरित्र, देशप्रेम व बलिदान की भावना तथा आम आदमी के सुख
व समृद्धि की उनकी उत्कट अभिलाषा की जानकारी तो मिलती ही है, इसमें देश के
क्रांतिकारी आंदोलन, उसकी विचारधारा, शक्ति और कमजोरियों पर भी प्रकाश पड़ता है। इस
आत्मकथा में बिस्मिल स्वाधीनता-संग्राम में सशस्त्र क्रांतिकारी संघर्ष के योगदान को महत्वपूर्ण
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मानते हैं। परंतु वह अपने अध्ययन और अनुभवों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं
कि युवकों को आतंक और व्यक्तिगत हत्याओं, का मार्ग छोड़कर खुले जन आंदोलन में शामिल
होना चाहिए। वह युवकों, मजदूरों व किसानों को संगठित करके उन्हें आज़ादी की लड़ाई में
उतारने और सच्चे समाजवाद की विचारधारा को अपनाने की सलाह देते हैं।
रामप्रसाद बिस्मिल और उनके परिवार ने गरीबी का जीवन विताया था और देश की
गरीब व अशिक्षित जनता की पीड़ा को निकट से देखा था। वास्तव में वह इसी गरीब जनता
और देशप्रेमी युवकों के सच्चे प्रतिनिधि थे। अनेक अन्य क्रांतिकारियों व स्वाधीनता सेनानियों
की तरह वह यही चाहते थे कि स्वतंत्र भारत में जनता को गरीबी और शोषण से मुक्त
कराया जाए। यही उनका सपना था। उनके सपने और संकल्प को पूरा करना ही आज हमारा
सबसे बड़ा कर्त्तव्य है। इसके अतिरिक्त .रामप्रसाद बिस्मिल हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई सभी
धर्मों, संप्रदायों और जातियों में एकता चाहते थे।
इस पुस्तक में शहीद रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा मूल रूप में दी गई है। परंतु
स्कूली छात्रों को ध्यान में रखकर इसे उनकी रुचि और स्तर के अनुरूप संपादित किया गया
है।
स्वाधीनता के वाद देश में छात्रों व युवकों को स्वाधीनता आंदोलन तथा देश की
आज़ादी के लिए किए गए संघर्ष, त्याग, वलिदान और मुक्ति आंदोलन के मूल्यों व सपनों की
पर्याप्त शिक्षा दी जानी चाहिए। आशा है कि शहीद रामप्रसाद विस्मिल की इस आत्मकथा के
अध्ययन से छात्रों को क्रांतिकारी आंदोलन तथा क्रांतिकारियों के विचारों की जानकारी मिलेगी
और उनके हृदय में देशप्रेम, त्याग व देशसेवा की भावना उत्पन्न होगी।
वी-55, गुलमोहर पार्क विश्वमित्र उपाध्याय
नई दिल्ली-110 049
आभार
इस पुस्तक के निर्माण में कृपापूर्ण योगदान के लिए राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और
प्रशिक्षण परिषद् निम्नलिखित विद्वानों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करती है :
प्रो. नामवर सिंह, प्रो. निर्मला जैन, स्व. प्रो. रवीन्द्र श्रीवास्तव, प्रो. मुजीब रिज़वी,
डॉ. परमानंद श्रीवास्तव, डॉ. गुणाकर मुले, डॉ. के. डी. शर्मा, डॉ. निरंजन कुमार सिंह,
डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. नित्यानंद तिवारी, डॉ. मानसिंह वर्मा, डॉ. जयपाल सिंह तरंग,
डॉ. एस. पी. मित्तल, श्री र. शौरिराजन।
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गांधी जी का जन्तर
तुम्हें एक जन्तर देता हूं । जब भी तुम्हें सन्देह
हो या तुम्हारा अहम् तुम पर हावी होने लगे,
तो यह कसौटी आजमाओ :
जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने
देखा हो, उसकी शक्ल याद करो और अपने
दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार
कर रहे हो, वह उस आदमी के लिए कितना
उपयोगी होगा । क्या उससे उसे कुछ लाभ
पहुंचेगा ? क्या उससे वह अपने ही जीवन और
भाग्य पर कुछ काबू रख सकेगा ? यानि क्या
उससे उन करोड़ों लोगों को स्वराज्य मिल
सकेगा जिनके पेट भूखे हैं और आत्मा अतृप्त है ?
तब तुम देखोगे कि तुम्हारा सन्देह मिट रहा
है और अहम् समाप्त होता जा रहा है ।
[हस्ताक्षर: म० क० गांधी / M. K. Gandhi]
अनुक्रम
प्रथम खण्ड--आत्म-चरित्र
द्वितीय खण्ड--स्वदेश-प्रेम
तृतीय खण्ड--स्वतंत्र जीवन
चतुर्थ खण्ड--बृहत् संगठन
शब्दार्थ एवं टिप्पणियाँ
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प्रथम खण्ड
आत्म-चरित्र
तोमरधार-1 में चंबल नदी के किनारे पर दो ग्राम आबाद हैं, जो ग्वालियर
राज्य में बहुत प्रसिद्ध हैं, क्योंकि इन गाँवों के निवासी बड़े उद्दंड हैं। इन गाँवों
के निवासी राज्य की सत्ता की कोई चिन्ता नहीं करते। ज़मींदारों का यह हाल है
कि जिस साल उनके मन में आता है राज्य को भूमि-कर (लगान) दे देते हैं और
जिस साल उनकी इच्छा नहीं होती, मालगुजारी देने से साफ इंकार कर जाते हैं।
यदि तहसीलदार या कोई और राज्य का अधिकारी आता है तो ये ज़मींदार
बीहड़-2 में चले जाते हैं और महीनों बीहड़ों में ही पड़े रहते हैं। उनके पशु भी
वहीं रहते हैं और उनका खाना-पीना भी बीहड़ों में ही होता है। घर पर कोई
ऐसा मूल्यवान पदार्थ नहीं छोड़ते जिसे नीलाम करके मालगुजारी वसूल की जा
सके। एक ज़मींदार के संबंध में यह कथा प्रचलित है कि मालगुजारी न देने के
कारण ही उसको कुछ भूमि माफी में मिल गई। पहले तो कई साल भागे रहे।
एक बार धोखे से पकड़ लिए गए तो तहसील के अधिकारियों ने उन्हें बहुत
सताया। उनको कई दिनों तक बिना खाना-पानी दिए रस्सी से बाँधकर रखा। अंत
में जलाने की धमकी दे, उसके पैरों पर सूखी घास डाल कर आग लगवा दी।
किन्तु उन ज़मींदार महोदय ने भूमि-कर देना स्वीकार नहीं किया। और यही उत्तर
दिया कि ग्वालियर महाराज को कोष में मेरे कर न देने से ही घाटा नहीं पड़
जाएगा। संसार क्या जानेगा, अमुक व्यक्ति उद्दंडता के कारण ही अपना समय
2 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
व्यतीत करता है। राज्य को लिखा गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उतनी
भूमि उन महाशय को माफी में दे दी गई। इसी प्रकार एक समय इन गाँवों के
निवासियों को एक अद्भुत खेल सूझा। उन्होंने महाराजा के रिसाले के साठ ऊँट
चुराकर बीहड़ों में छिपा दिए। राज्य को लिखा गया, जिसपर राज्य की ओर से
आज्ञा हुई कि दोनों गाँव तोप लगाकर उड़वा दिए जाएँ। न जाने किस प्रकार
समझाने-बुझाने से वे ऊँट वापस किए गए और अधिकारियों को समझाया गया
कि इतने बड़े राज्य में थोड़े से वीर लोगों का निवास है, इनका विध्वंस न करना
ही उचित होगा। तब तोपें लौटाई गईं और गाँव उड़ाए जाने से बचे। ये लोग
अब राज्य के निवासियों को तो अधिक नहीं सताते, किन्तु अनेक बार अंग्रेजी
राज्य-³ में आकर उपद्रव कर जाते हैं और अमीरों के मकानों पर छापा मार कर
रात-ही-रात बीहड़ में दाखिल हो जाते हैं। बीहड़ में पहुँच जाने पर पुलिस या
फौज कोई भी उनका बाल-बाँका नहीं कर सकती। ये दोनों गाँव अंग्रेजी राज्य की
सीमा से लगभग पंद्रह मील की दूरी पर चंबल नदी के तट पर हैं। यहीं के एक
प्रसिद्ध वंश में मेरे पितामह (बाबा) श्री नारायणलाल जी का जन्म हुआ था। वह
पारिवारिक कलह और अपनी भाभी के असहनीय दुर्व्यवहार के कारण मजबूर हो
अपनी जन्मभूमि छोड़ इधर-उधर भटकते रहे। अंत में अपनी धर्मपत्नी व दो पुत्रों
के साथ वह शाहजहाँपुर पहुँचे। उनके इन्हीं दो पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र श्री मुरलीधर
जी मेरे पिता हैं। उस समय उनकी आयु आठ वर्ष और उनके छोटे पुत्र- मेरे
चाचा श्री कल्याणमल- की उम्र छः वर्ष की थी। इस समय यहाँ अकाल का
भयंकर प्रकोप था।
दुर्दिन
अनेक प्रयत्न करने के बाद शाहजहाँपुर में एक अत्तार महोदय की दुकान
पर मेरे बाबा श्री नारायण लाल जी को तीन रुपये मासिक वेतन की नौकरी
मिली। तीन रुपये मासिक में अकाल के समय चार प्राणियों का किस प्रकार
आत्म-चरित्र ३
निर्वाह (गुजर-बसर) हो सकता था ? दादीजी ने बहुत प्रयत्न किया कि अपने आप
केवल एक समय आधा पेट भोजन करके बच्चों का पेट पाला जाए, किन्तु फिर
भी निर्वाह न हो सका। बाजरा, कुकनी, सामा, ज्वार आदि खाकर दिन काटने
चाहे, किन्तु फिर भी गुजारा न हुआ। तब आधा बथुआ, चना या कोई दूसरा
साग, जो सबसे सस्ता हो उसको लेकर, सबसे सस्ता अनाज उसमें आधा मिलाकर
थोड़ा-सा नमक डालकर उसे स्वयं खातीं और लड़कों को चना या जौ की रोटी
देती थीं। दादाजी भी इस प्रकार समय व्यतीत करते थे। आधा पेट खाकर बड़ी
कठिनाई से दिन तो कट जाता, परंतु पेट में घोंटू दबाकर रात काटना कठिन हो
जाता। यह तो भोजन की दशा थी, वस्त्र तथा रहने के स्थान के किराये के लिए
धन कहाँ से आता ? दादीजी ने चाहा कि भले लोगों के घरों में उन्हें कोई
मजदूरी ही मिल जाए, किन्तु अनजान व्यक्ति का, जिसकी भाषा भी अपने देश
की भाषा से न मिलती हो, भले घरों में सहसा कौन विश्वास कर सकता था ?
कोई मजदूरी पर अपना अनाज भी पीसने को न देता था। डर था कि अकाल
का समय है, खा लेगी। बहुत प्रयत्न करने पर दो एक महिलाएँ अपने घर पर
अनाज पिसवाने पर राजी हुईं, किन्तु काम कर रही पुरानी मजदूरिनों को जवाब
कैसे दें ? इसी प्रकार अड़चनों के बाद पाँच-सात सेर अनाज पीसने को मिल
जाता, जिसकी पिसाई उस समय एक पैसे प्रति पंसेरी थी। बड़ी कठिनाई से आधा
पेट एक समय भोजन करके तीन-चार घंटों तक पीसकर एक पैसा या डेढ़ पैसा
मिलता। फिर घर पर आकर बच्चों के लिए भोजन तैयार करना पड़ता था। दो,
तीन वर्ष तक यही दशा रही। दादाजी प्रायः अपने गाँव लौट जाने का विचार
प्रकट करते, किन्तु दादीजी का यही उत्तर होता कि जिनके कारण देश (गाँव)
छूटा, धन-सामग्री सब नष्ट हुई और ये दिन देखने पड़े अब उन्हीं के पैरों में
सिर रखकर दासत्व स्वीकार करने से इसी प्रकार प्राण देना ही श्रेष्ठ है, ये दिन
सदैव न रहेंगे। सब प्रकार के संकट सहे, किन्तु दादीजी देश (गाँव) को लौट
कर न गईं।
4 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
चार-पाँच वर्ष में जब कुछ सज्जन परिचित हो गए और जान लिया कि यह
महिला भले घर की है, कुसमय पड़ने से दीन-दशा को प्राप्त हुई है, तब बहुत-सी
महिलाएँ विश्वास करने लगीं। अकाल भी दूर हो गया था। कभी-कभी किसी
सज्जन के यहाँ से कुछ दान मिल जाता, कोई ब्राह्मण भोजन करा देता। इसी
प्रकार समय व्यतीत होने लगा। कई महानुभावों ने, जिनके कोई संतान न थी
और धनादि पर्याप्त था, दादीजी को अनेक प्रकार के प्रलोभन दिए कि वह अपना
एक लड़का उन्हें दे दें और जितना धन माँगें उतना ले लें। किन्तु दादीजी आदर्श
माता थीं। उन्होंने इस प्रकार के प्रलोभन की जरा भी परवाह न की और अपने
बच्चों का किसी न किसी प्रकार पालन करती रहीं।
मेहनत-मजदूरी तथा पंडिताई द्वारा कुछ धन एकत्रित हुआ। कुछ महानुभावों
के कहने से पिताजी के किसी पाठशाला में शिक्षा पाने का प्रबंध कर दिया गया।
श्री दादाजी ने भी कुछ प्रयत्न किया, उनका वेतन भी बढ़ गया और वह सात
रुपये मासिक पाने लगे। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़, पैसे तथा दुअन्नी,
चवन्नी आदि बेचने की दुकान की। पाँच-सात आने रोज पैदा होने लगे। जो
दुर्दिन आए थें, प्रयत्न तथा साहस से दूर होने लगे। इसका सब श्रेय दादीजी को
ही है। जिस साहस तथा धैर्य से उन्होंने काम लिया वह वास्तव में किसी दैवी
शक्ति की सहायता ही कही जाएगी। अन्यथा एक अशिक्षित ग्रामीण महिला की
क्या सामर्थ्य (शक्ति) है कि वह नितांत अपरिचित स्थान में जाकर मेहनत-मजदूरी
करके अपना तथा अपने बच्चों का पेट पालन करते हुए उनको शिक्षित बनाए
और फिर ऐसी परिस्थितियों में, जबकि उसने कभी भी अपने जीवन में घर से
बाहर पैर न रखा हो और जो ऐसे कट्टर देश की रहने वाली हो कि, जहाँ पर
प्रत्येक हिन्दू-प्रथा का पूर्णतः पालन किया जाता हो, जहाँ के निवासी अपनी
प्रथाओं की रक्षा के लिए प्राणों की जरा भी चिंता न करते हों। किसी ब्राह्मण,
क्षत्री या वैश्य की कुलवधू का क्या साहस, जो डेढ़ हाथ का घूँघट निकाले बिना
एक घर से दूसरे घर चली जाए।
आत्म-चरित्र ५
शूद्र जाति (उत्तर भारत के संदर्भ में) की वधुओं के लिए भी यही नियम
है कि वे रास्ते में बिना घूँघट निकाले न जाएँ। शूद्रों का पहनावा ही अलग है,
ताकि उन्हें देखकर ही दूर से पहचान लिया जाए कि वह किसी निम्न जाति की
स्त्री है। ये प्रथाएँ इतनी प्रचलित हैं कि उन्होंने अत्याचार का रूप धारण कर
लिया है। एक समय किसी चमार की वधू, जो अंग्रेजी राज्य से विवाह करके गई
थी, कुल प्रथानुसार ज़मींदार के घर पैर छूने के लिए गई। वह पैरों में बिछुवे
पहने हुई थी और सब पहनावा चमारों का पहने थी। ज़मींदार महोदय की निगाह
उसके पैरों पर पड़ी। पूछने पर मालूम हुआ कि चमार की बहू है। ज़मींदार साहब
जूता पहनकर आए और उसके पैरों पर खड़े होकर इतने जोर से दबाया कि
उसकी अंगुलियाँ कट गईं। उन्होंने कहा कि यदि चमारों की बहुएँ बिछुवा पहनेंगी
तो ऊँची जाति के घर की स्त्रियाँ क्या पहनेंगी ? ये ऊँची जाति के लोग बहुत
अशिक्षित तथा मूर्ख हैं, किन्तु जाति के अभिमान में चूर रहते हैं। गरीब-से-गरीब
अशिक्षित ब्राह्मण या क्षत्री, चाहे वह किसी आयु का हो, यदि शूद्र जाति की
बस्ती में से गुजरे तो चाहे कितना ही धनी या वृद्ध कोई शूद्र क्यों न हो, उसे
उठकर पालागन या जुहार करनी ही पड़ेगी। यदि ऐसा न करे तो उसी समय वह
ब्राह्मण या क्षत्री उसे जूतों से मार सकता है।
परमात्मा की दया से बुरे दिन समाप्त हुए। पिताजी कुछ शिक्षा पा गए।
और एक मकान भी दादीजी ने खरीद लिया। दरवाज़े-दरवाज़े भटकने वाले कुटुंब
को शांतिपूर्वक बैठने का स्थान मिल गया और फिर श्री पिताजी का विवाह करने
का विचार हुआ। दादीजी दादाजी तथा पिताजी के साथ अपने मायके गईं। वहीं
पिताजी का विवाह कर दिया। वहाँ दो-चार मास रहकर सब लोग वधू की विदाई
कराकर साथ लिवा लाए।
6 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
गृहस्थ जीवन
विवाह हो जाने के बाद पिताजी म्युनिसिपैलिटी में पंद्रह रुपये मासिक वेतन
पर नौकर हो गए। उन्होंने कोई बड़ी शिक्षा प्राप्त न की थी। पिताजी को यह
नौकरी पसंद न आई। उन्होंने एक दो साल के बाद नौकरी छोड़ कर स्वतंत्र
व्यवसाय आरंभ करने का प्रयत्न किया और कचहरी (अदालत) में सरकारी स्टाम्प
बेचने लगे। उनके जीवन का अधिक भाग इसी व्यवसाय में व्यतीत हुआ। साधारण श्रेणी
के गृहस्थ बनकर उन्होंने इसी व्यवसाय द्वारा अपनी संतानों को शिक्षा दी, अपने
परिवार का पालन किया और अपने मुहल्ले के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में गिने जाने
लगे। वह रुपये का लेन-देन भी करते थे। उन्होंने तीन बैलगाड़ियाँ भी बनाई थीं,
जो किराये पर चला करती थीं। पिताजी को व्यवसाय से प्रेम था। उनका शरीर बड़ा
मजबूत और सुडौल था। वह नियमपूर्वक अखाड़े में कुश्ती लड़ा करते थे।
पिताजी के घर में एक पुत्र उत्पन्न हुआ किन्तु वह मर गया। उसके एक
साल बाद लेखक (श्री रामप्रसाद) ने ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष 11 सम्वत् 1954 विक्रमी
को जन्म लिया। बड़े प्रयत्नों से मनौती मानकर अनेक गंडे, ताबीज तथा कवचों
द्वारा श्री दादाजी ने इस शरीर की रक्षा के लिए प्रयत्न किया। सम्भवतः हमारे घर
में बालकों का कोई रोग प्रवेश कर गया था। अतएव जन्म लेने के एक या दो
मास बाद मेरे शरीर की दशा भी पहले बालक जैसी होने लगी। किसी ने बताया
कि सफेद खरगोश को मेरे शरीर पर घुमाकर जमीन पर छोड़ दिया जाए, यदि
बीमारी होगी तो खरगोश तुरंत मर जाएगा। कहते हैं हुआ भी ऐसा ही। एक
सफेद खरगोश मेरे शरीर पर से उतारकर जैसे ही जमीन पर छोड़ा गया, वैसे ही
उसने तीन-चार चक्कर काटे और मर गया। मेरे विचार में किसी अंश में यह
सम्भव भी है, क्योंकि औषधि तीन प्रकार की होती हैं- 1. दैविक (ईश्वरीय),
2. मानुषिक और 3. पैशाचिक। पैशाचिक औषधियों में अनेक प्रकार के पशु या
पक्षियों के मांस या रक्त का उपयोग किया जाता है, जिसका उपयोग वैद्यक के
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आत्म-चरित्र 7
ग्रंथों में पाया जाता है। इनमें से एक बड़ा चमत्कारक तथा आश्चर्यजनक प्रयोग
यह है कि जिस बच्चे को सूखे की बीमारी हो गई हो, यदि उसके सामने
चमगादड़ चीर कर लाया जाए तो एक-दो मास का बालक चमगादड़ को पकड़
कर खून चूस लेगा और बीमारी जाती रहेगी। यह बड़ी उपयोगी औषधि है और
एक महात्मा की बताई हुई है।
जब मैं सात वर्ष का हुआ तो पिताजी ने स्वयं ही मुझे हिन्दी अक्षरों का
लिखना सिखाया और एक मौलवी साहब के मकतब (विद्यालय) में उर्दू पढ़ने के
लिए भेज दिया। मुझे भली भाँति स्मरण है कि पिताजी अखाड़े में कुश्ती लड़ने
जाते थे और अपने से वलिष्ठ (मजबूत) तथा शरीर में डेढ़ गुने पट्ठे को पटक
देते थे। कुछ दिनों बाद पिताजी का एक बंगाली (श्री चटर्जी) महाशय से प्रेम हो
गया। चटर्जी महाशय की अंग्रेजी दवा की दुकान थी। वह बड़े भारी नशाबाज
थे। एक समय में आधा छटाँक चरस की चिलम उड़ाया करते थे। उन्हीं की
संगत में पिताजी ने चरस पीना सीख लिया, जिसके कारण उनका शरीर काफी
कमजोर हो गया। दस वर्ष में ही संपूर्ण शरीर सूख कर हड्डियाँ निकल आईं।
चटर्जी महाशय शराब भी पीने लगे। अतएव उनका कलेजा बढ़ गया और उसी
से उनकी मृत्यु हो गई। मेरे बहुत कुछ समझाने पर पिताजी ने अपनी चरस पीने
की आदत को छोड़ा, किन्तु बहुत दिनों के बाद।
मेरे बाद पाँच बहनों और तीन भाइयों का जन्म हुआ। दादीजी ने कहा कि
कुल की प्रथा के अनुसार कन्याओं को मार डाला जाए, किन्तु माताजी ने इसका
विरोध किया और कन्याओं के प्राणों की रक्षा की। मेरे कुल में यह पहला ही
समय था कि कन्याओं का पोषण हुआ। पर इनमें से दो बहनों और दो भाइयों
का देहांत हो गया। शेष एक भाई इस समय (1927) दस वर्ष का है और तीन
बहनें बचीं। माताजी के प्रयत्न से तीनों बहनों को अच्छी शिक्षा दी गई और
उनके विवाह बड़ी धूमधाम से किए गए। इससे पूर्व हमारे कुल की कन्याएँ किसी
को नहीं ब्याही गईं, क्योंकि वे जीवित ही नहीं रही थीं।
8 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
दादाजी बड़ी सरल प्रकृति के मनुष्य थे। जब तक वे जीवित रहे, पैसे बेचने
का ही व्यवसाय करते रहे। उनको गाय पालने का बहुत बड़ा शौक था। स्वयं
ग्वालियर जाकर बड़ी-बड़ी गायें खरीद लाते थे। वहाँ की गायें काफी दूध देती हैं।
ये गायें बड़ी सीधी भी होती हैं। दूध दूहते समय उनकी टाँगें बाँधने की
आवश्यकता नहीं होती और जब जिसका जी चाहे बिना बच्चे के दूध दूह सकता
है। बचपन में मैं अक्सर जाकर गाय के थन में मुँह लगाकर दूध पिया करता
था। वास्तव में वहाँ की गायें दर्शनीय होती हैं।
दादाजी मुझे खूब दूध पिलाया करते थे। उन्हें अट्ठारह गोटी (बघिया बग्घा)
खेलने का बड़ा शौक था। शाम के समय रोजाना शिव-मंदिर में जाकर दो घंटे
तक परमात्मा का भजन किया करते थे। उनका लगभग पचपन वर्ष की आयु में
देहांत हुआ।
बचपन से ही पिताजी मेरी शिक्षा का अधिक ध्यान रखते थे और जरा-सी
भूल करने पर बहुत पीटते थे। मुझे यह बात अब भी बहुत अच्छी तरह याद है
कि जब मैं देवनागरी (हिन्दी) के अक्षर लिखना सीख रहा था तो मुझे "उ"
लिखना न आया। मैंने बहुत प्रयत्न किया। पर जब पिताजी कचहरी चले गए तो
मैं भी खेलने चला गया। पिताजी ने कचहरी से आकर मुझसे "उ" लिखवाया, मैं
लिख न सका। उन्हें मालूम हो गया कि मैं खेलने चला गया था। इस पर उन्होंने
मुझे बंदूक के लोहे के गज से इतना पीटा कि गज टेढ़ा पड़ गया। मैं भाग कर
दादीजी के पास चला गया, तब बचा। मैं छोटेपन से ही बहुत शरारती था।
पिताजी के पर्याप्त शासन रखने पर भी शरारत करता था। एक समय किसी के
बाग में जाकर आडू के वृक्षों में से सब आडू तोड़ डाले। माली पीछे दौड़ा, किन्तु
मैं उसके हाथ नहीं आया। माली ने सब आडू पिताजी के सामने ला रखे। उस
समय पिताजी ने मुझे इतना पीटा कि मैं दो दिन तक उठ नहीं सका। इसी
प्रकार खूब पिटता था, किन्तु शरारत अवश्य करता था। शायद उस बचपन की
मार से ही यह शरीर बहुत कठोर और सहनशील बन गया।
आत्म-चरित्र 9
मेरी कुमारावस्था
जब मैं उर्दू का चौथा दर्जा पास करके पाँचवें में आया उस समय मेरी आयु
लगभग चौदह वर्ष की होगी। इस बीच मुझे पिताजी के संदूक से रुपये-पैसे चुराने
की आदत पड़ गई थी। इन पैसों से उपन्यास खरीदकर खूब पढ़ता। पुस्तक
विक्रेता महाशय पिताजी के जान-पहचान के थे। उन्होंने मेरी पिताजी से शिकायत
की। अब मेरी कुछ जाँच होने लगी। मैंने उन महाशय के यहाँ से किताब
खरीदना ही छोड़ दिया। मुझमें दो-एक खराब आदतें भी पड़ गईं। मैं सिगरेट पीने
लगा। कभी-कभी भंग भी जमा लेता था। छोटी उम्र में स्वतन्त्रतापूर्वक पैसे हाथ
आ जाने से और उर्दू के प्रेम व रसपूर्ण उपन्यासों और ग़ज़लों की पुस्तकों ने मेरे
चरित्र पर भी अपना बुरा प्रभाव दिखाना आरम्भ कर दिया। घुन लगना आरंभ
हुआ ही था कि परमात्मा ने बड़ी सहायता की। मैं एक रोज भंग पीकर पिताजी
की संदूकची में से रुपये निकालने गया। नशे की हालत में होश ठीक न रहने
के कारण संदूकची खटक गई। माताजी को संदेह हुआ। उन्होंने मुझे पकड़ा दिया।
चाभी भी पकड़ी गई। मेरे संदूक की तलाशी ली गई, बहुत से रुपये निकले और
सारा भेद खुल गया। मेरी किताबों में कई उपन्यास आदि भी पाए गए जो उसी
समय फाड़ डाले गए।
परमात्मा की कृपा से मेरी चोरी पकड़ ली गई, नहीं तो दो चार वर्ष में न
दीन का रहता न दुनिया का। इसके बाद भी मैंने बहुत घातें लगाईं, किन्तु
पिताजी ने संदूकची का ताला बदल दिया था। मेरी कोई चाल न चल सकी। अब
जब कभी भी मौका मिल जाता तो माताजी के रुपयों पर हाथ फेर देता था।
इसी प्रकार की बुरी आदतों के कारण दो बार उर्दू मिडिल की परीक्षा में उत्तीर्ण
न हो सका। तब मैंने अंग्रेज़ी पढ़ने की इच्छा प्रकट की। पिताजी मुझे अंग्रेज़ी
पढ़ाना न चाहते थे और किसी कारोबार में लगाना चाहते थे, किन्तु माताजी की
कृपा से मैं अंग्रेज़ी पढ़ने भेजा गया। दूसरे वर्ष जब मैं उर्दू मिडिल की परीक्षा में
फेल हुआ उसी समय पड़ोस के देव-मंदिर में, जिसकी दीवार मेरे मकान से मिली
10 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
थी, एक पुजारी जी आ गए। वह बहुत अच्छे चरित्र वाले व्यक्ति थे। मैं उनके
पास उठने-बैठने लगा।
मैं मंदिर में आने-जाने लगा। कुछ पूजा-पाठ भी सीखने लगा। मुझ पर
पुजारी जी के उपदेशों का बड़ा उत्तम प्रभाव हुआ। मैं अपना अधिक समय
भजन-पूजन तथा पढ़ने में बिताने लगा। पुजारीजी मुझे ब्रह्मचर्य का पालन करने
का उपदेश देते थे। वह मेरे पथ-प्रदर्शक बने। मैंने एक-दूसरे सज्जन की देखा-देखी
व्यायाम करना भी आरंभ कर दिया। अब तो मुझे भक्ति-मार्ग में कुछ आनंद
प्राप्त होने लगा और चार-पाँच महीने में ही व्यायाम भी खूब करने लगा। मेरी
सब बुरी आदतें और बुरी भावनाएँ जाती रहीं। स्कूलों की छुट्टियाँ समाप्त होने पर
मैंने मिशन स्कूल के अंग्रेजी के पाँचवें दर्जे में नाम लिखा लिया। इस समय मेरी
और सब बुरी आदतें तो छूट गई थीं, किन्तु सिगरेट पीना न छूटता था। मैं
सिगरेट बहुत पीता था। एक दिन में पचास-साठ सिगरेट पी डालता था। मुझे
बड़ा दुख होता था कि मैं इस जीवन में सिगरेट पीने की बुरी आदत को न छोड़
सकूँगा। स्कूल में भरती होने के थोड़े दिनों बाद ही एक सहपाठी श्री सुशीलचंद
सेन से कुछ विशेष स्नेह हो गया। उन्हीं की दया के कारण मेरा सिगरेट पीना
भी छूट गया।
देव-मंदिर में भजन-पूजा करने की प्रवृत्ति को देखकर श्री मुंशी इन्द्रजीत जी
ने मुझे संध्या करने का उपदेश दिया। मुंशीजी उसी मंदिर में रहने वाले किसी
सज्जन के पास आया करते थे। व्यायाम करने के कारण मेरा शरीर बड़ा सुगठित
हो गया था और रंग निखर आया था। मैंने जानना चाहा कि संध्या क्या वस्तु
है। मुंशीजी ने आर्य-समाज संबंधी कुछ उपदेश दिए। इसके बाद मैंने सत्यार्थ
प्रकाश (आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित ग्रंथ) पढ़ा।
इससे तख्ता ही पलट गया। सत्यार्थ प्रकाश के अध्ययन ने मेरे जीवन के इतिहास
में एक नया पृष्ठ खोल दिया। मैंने उसमें लिखित ब्रह्मचर्य के कठिन नियमों का
पालन करना प्रारंभ कर दिया। मैं एक कंबल को तख्त पर बिछा कर सोता और
आत्म-चरित्र 11
प्रातःकाल चार बजे ही बिस्तर से उठ जाता था। स्नान और संध्या आदि करने
के बाद व्यायाम करता, परंतु मन की भावनाएँ ठीक न होतीं। मैंने रात के समय
भोजन करना भी छोड़ दिया। रात को केवल थोड़ा दूध ही पीने लगा। मिर्च
खटाई तो छूता भी न था। मेरा स्वास्थ्य भी दर्शनीय हो गया। सब लोग मेरे
स्वास्थ्य को आश्चर्य से देखा करते थे।
मैं थोड़े दिनों में ही बड़ा कट्टर आर्यसमाजी हो गया। आर्यसमाज के
अधिवेशन में आता-जाता। संन्यासी महात्माओं के उपदेशों को बड़ी श्रद्धा से
सुनता। जब कोई संन्यासी आर्यसमाज में आता तो उसकी हर प्रकार से सेवा
करता, क्योंकि मेरी प्राणायाम सीखने की बहुत इच्छा थी। जिस संन्यासी का नाम
सुनता शहर से तीन-चार मील उसकी सेवा के लिए जाता। मैं इस बात की
परवाह नहीं करता कि वह संन्यासी किस मत का अनुयायी है। जब मैं अंग्रेजी
के सातवें दर्जे में था तब सनातनधर्मी पंडित जगत प्रसाद जी शाहजहाँपुर पधारे।
उन्होंने आर्यसमाज का खंडन करना शुरू किया। आर्यसमाजियों ने भी उनका
विरोध किया और पंडित अखिलानंदजी को बुलाकर शास्त्रार्थ (शास्त्रों का सही
अर्थ जानने के लिए बहस) कराया। शास्त्रार्थ संस्कृत में हुआ। जनता पर अच्छा
प्रभाव पड़ा। मेरे कामों को देखकर मुहल्ले वालों ने पिताजी से मेरी शिकायत की।
पिताजी ने मुझसे कहा कि आर्यसमाजी हार गए। अब तुम आर्यसमाज से अपना
नाम कटा दो। मैंने पिताजी से कहा कि आर्यसमाज के सिद्धांत विश्वव्यापी हैं,
उन्हें कौन हरा सकता है ? अनेक वाद-विवाद के पश्चात् पिताजी जिद्द पकड़ गए
कि आर्यसमाज से त्यागपत्र नहीं देगा तो मैं तुझे रात में सोते समय मार दूँगा,
या तो आर्यसमाज से त्यागपत्र दे दे या घर छोड़ दे।
मैंने यह सोचा कि पिताजी का क्रोध यदि अधिक बढ़ गया और उन्होंने
मुझ पर कोई ऐसी वस्तु दे पटकी जिससे बुरा परिणाम हुआ तो अच्छा न होगा।
अतएव घर छोड़कर चला जाना ही अच्छा है। मैं केवल एक कमीज पहने खड़ा
था और पायजामा उतार कर धोती पहन रहा था। पायजामे के नीचे लंगोट बँधा
12 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
था। पिताजी ने हाथ से धोती छीन ली और कहा, “घर से निकल।” मुझे भी
क्रोध आ गया। मैं पिताजी के पैर छूकर गृह त्याग कर चला गया। कहाँ जाऊँ
कुछ समझ में न आया। शहर में किसी से जान-पहचान न थी कि जहाँ छिपा
रहता। मैं जंगल की ओर चला गया। एक रात और एक दिन मैं पेड़ पर बैठा
रहा। भूख लगने पर खेतों में से हरे चने तोड़कर खाए, नदी में स्नान किया और
जलपान किया। दूसरे दिन शाम को पं. अखिलांनद जी का व्याख्यान आर्यसमाज
में था। मैं आर्यसमाज मंदिर में गया। एक पेड़ के नीचे एकांत में व्याख्यान सुन
रहा था कि पिताजी दो व्यक्तियों को लिए हुए आ पहुँचे और मैं पकड़ लिया
गया। वह उसी समय पकड़ कर मुझे हेडमास्टर के पास ले गए। हेडमास्टर साहब
ईसाई थे। मैंने उन्हें सारी बात कह सुनाई। उन्होंने पिताजी को समझाया कि
समझदार लड़के को मारना-पीटना ठीक नहीं। उन्होंने मुझे भी बहुत कुछ उपदेश
दिया। उस दिन से पिताजी ने कभी भी मुझ पर हाथ नहीं उठाया, क्योंकि मेरे घर से
निकल जाने पर घर में बहुत दुःख रहा। एक रात और एक दिन किसी ने भोजन नहीं
किया, सब बड़े दुखी हुए कि अकेला पुत्र न जाने नदी में डूब गया या रेल से
कट गया। पिताजी के हृदय को भी बहुत भारी धक्का पहुँचा। उस दिन से वह
मेरी हर बात सहन कर लेते थे। मैं काफी मेहनत से पढ़ता था और अपने दर्जे
में प्रथम श्रेणी में पास होता था। यह स्थिति आठवें दर्जे तक रही।
जब मैं आठवें दर्जे में था, उसी समय स्वामी श्री सोमदेव जी 'सरस्वती
आर्यसमाज शाहजहाँपुर में पधारे। उनके व्याख्यानों का जनता पर अच्छा प्रभाव
हुआ। कुछ सज्जनों के अनुरोध पर स्वामीजी कुछ दिनों के लिए शाहजहाँपुर
आर्यसमाज मंदिर में ठहर गए। स्वामीजी की तबियत भी कुछ खराब थी, इस
कारण शाहजहाँपुर का जलवायु लाभदायक देख कर वहाँ ठहरे थे। मैं उनके पास
आया-जाया करता था। मैंने स्वामीजी महाराज की बहुत सेवा की और इसी सेवा
के फलस्वरूप मेरे जीवन में नया परिवर्तन हो गया। मैं रात को दो-तीन बजे तक
और दिन भर उनकी सेवा करता रहा। अनेक प्रकार की औषधियों का प्रयोग