रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
44 रामप्रसाद बिस्मिल कीं आत्मकथा
सप्ताह तक बूट तथा वर्दी न उतारते थे।
जब आप ब्रह्मचारी जी के पास सहायता
लेने गए, तो दुर्भाग्यवश गिरफ़्तार कर लिए
गए। ब्रह्मचारी के दल ने अंग्रेजी राज्य में
कई डाके डाले थे। डाके डालकर ये लोग
चंबल के बीहड़ों में छिप जाते थे। सरकारी
राज्य की ओर से ग्वालियर महाराज को
लिखा गया। इस दल के पकड़ने का प्रबंध
किया गया। सरकार ने तो हिन्दुस्तानी
फौज भी भेजी थी, जो आगरा जिले में
चंबल के किनारे बहुत दिनों तक पड़ी रही।
पुलिस सवार तैनात किए, फिर भी ये लोग
भयभीत न हुए। विश्वासघात से पकड़े गए।
इन्हीं का एक आदमी पुलिस ने मिला लिया।
डाका डालने के लिए दूर एक स्थान निश्चय
किया गया, जहाँ तक जाने के लिए एक
पड़ाव देना पड़ता था। चलते-चलते सब थक
[चित्र-परिचय: गेंदालाल दीक्षित] गए, पड़ाव दिया गया। जो आदमी पुलिस
से मिला हुआ था, उसने भोजन लाने को कहा, क्योंकि उसके किसी संबंधी का
मकान निकट था। वह पूड़ी बनवाकर लाया। सब पूड़ी खाने लग गए। ब्रह्मचारी
जी जो सदैव अपने हाथ से बनाकर भोजन करते थे या आलू अथवा घुइयाँ
भूनकर खा लेते थे, उन्होंने भी उस दिन पूड़ी खाना स्वीकार किया। सब भूखे तो
थे ही, खाने लगे। ब्रह्मचारी जी ने भी एक पूड़ी ही खाई। उनकी जबान ऐंठने
लगी और जो अधिक खा गए थे, वे गिर गए। पूड़ी लाने वाला पानी लेने के
बहाने चल दिया। पूड़ियों में विष मिला हुआ था। ब्रह्मचारी जी ने बंदूक उठाकर
स्वदेश-प्रेम 45
पूड़ी लाने वाले पर गोली चलाई। ब्रह्मचारी जी का गोली चलाना था कि चारों
ओर से गोली चलने लगीं। पुलिस छिपी हुई थी। गोली चलने से ब्रह्मचारी जी को
कई गोलियाँ लगीं। तमाम शरीर घायल हो गया। पं. गेंदालालजी की आँख में
एक छर्रा लगा। बाईं आँख जाती रही। कुछ आदमी जहर के कारण मरे, कुछ
गोली से मारे गए। इस प्रकार 80 आदमियों में से 25-30 जान से मारे गए। सब
पकड़ कर ग्वालियर के किले में बंद कर दिए गए। किले में हम लोग जब पंडित
जी से मिले, तब चिट्ठी भेजकर उन्होंने हमको सब हाल बताया। एक दिन किले
में हम लोगों पर भी संदेह हो गया था, बड़ी कठिनता से एक अधिकारी की
सहायता से हम लोग निकल सके।
जब मैनपुरी षड्यंत्र का अभियोग चला, पंडित गेंदालालजी को सरकार ने
ग्वालियर राज्य से मँगाया। ग्वालियर के किले का जलवायु बड़ा ही हानिकारक
था। पंडितजी को क्षय (टी.बी.) रोग हो गया था। मैनपुरी स्टेशन से जेल जाते
समय ग्यारह बार रास्ते में बैठकर, जेल पहुँचे। पुलिस ने जब हाल पूछा तो उन्होंने
कहा- "बालकों को क्यों गिरफ्तार किया है ? मैं हाल बताऊँगा।" पुलिस को
विश्वास हो गया। आपको जेल से निकालकर दूसरे सरकारी गवाहों के निकट रख
दिया। वहाँ पर सब विवरण जान रात्रि के समय एक और सरकारी गवाह को
लेकर पंडितजी भाग खड़े हुए। भागकर एक गाँव में एक कोठरी में ठहरे। साथी
कुछ काम के लिए बाजार गया था। पंडितजी उसी कोठरी में तीन दिन बिना
अन्न-जल बंद रहे। समझे कि साथी किसी आपत्ति में फँस गया होगा, अंत में
किसी प्रकार जंजीर खुलवाई। रुपये वह सब साथ ही ले गया था। पास एक पैसा
भी न था। कोटा से पैदल आगरा आए। किसी प्रकार अपने घर पहुँचे। बहुत
बीमार थे। पिता ने यह समझकर कि घरवालों पर आपत्ति न आए, पुलिस को
सूचना देनी चाही। पंडितजी ने पिता से बड़ी विनय-प्रार्थना की और दो-तीन दिन
में घर छोड़ दिया। हम लोगों की बहुत खोज की। किसी का कुछ पता न पा
दिल्ली में एक प्याऊ पर पानी पिलाने की नौकरी कर ली। अवस्था दिनों-दिन
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बिगड़ रही थी। रोग भीषण रूप धारण कर रहा था। छोटे भाई तथा पत्नी को
बुलाया। भाई किंकर्त्तव्यविमूढ़। वह क्या कर सकता था ? सरकारी अस्पताल में
भर्ती कराने ले गया। पंडितजी की धर्मपत्नी को दूसरे स्थान में भेजकर जब वह
अस्पताल आया, तो जो देखा उसे लिखते हुए लेखनी काँपने लगती है।
पंडितजी शरीर त्याग चुके थे। केवल उनका मृत शरीरमात्र ही पड़ा हुआ था।
स्वदेश की कार्य सिद्धि में पं. गेंदालालजी दीक्षित ने जिस निःसहाय अवस्था में
अंतिम बलिदान दिया, उसकी स्वप्न में भी आशंका न थी। पंडितजी की प्रबल
इच्छा थी कि उनकी मृत्यु गोली लगकर हो। भारतवर्ष की एक महान आत्मा
विलीन हो गई और देश में किसी ने जाना भी नहीं। आपकी विस्तृत जीवनी
"प्रभा" मासिक पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है। मैनपुरी षड्यंत्र के मुख्य नेता
आप ही समझे गए थे। इस षड्यंत्र में खास बात यह हुई कि नेताओं में से
केवल दो व्यक्ति पुलिस के हाथ आए, जिनमें गेंदालाल दीक्षित एक सरकारी
गवाह को लेकर भाग गए, श्री शिवकृष्ण जेल से भाग गए, फिर हाथ न आए।
छः मास के बाद जिन्हें सजा हुई वे भी राजकीय घोषणा से मुक्त कर दिए
गए। खुफिया पुलिस विभाग का क्रोध पूर्णतया शांत न हो सका और उनकी
बदनामी भी इस केस में बहुत हुई।
तृतीय खण्ड
स्वतंत्र जीवन
राजकीय घोषणा के पश्चात् जब मैं शाहजहाँपुर आया तो शहर की अद्भुत
दशा देखी। कोई पास तक खड़े होने का साहस न करता था। जिसके पास मैं
जाकर खड़ा हो जाता था, वह नमस्ते कर चल देता था। पुलिस का बड़ा प्रकोप
था। प्रत्येक समय वह छाया की भाँति पीछे-पीछे फिरा करती थी। इस प्रकार का
जीवन कब तक व्यतीत किया जाए ? मैंने कपड़ा बुनने का काम सीखना आरंभ
किया। जुलाहे बड़ा कष्ट देते थे। कोई काम सिखाना नहीं चाहता था। बड़ी
कठिनता से मैंने कुछ काम सीखा। उसी समय एक कारखाने में मैनेजरी का
स्थान खाली हुआ। मैंने उस स्थान के लिए प्रयत्न किया। मुझसे पाँच सौ रुपये
की जमानत माँगी गई। मेरी दशा बड़ी शोचनीय थी। तीन-तीन दिवस तक भोजन
प्राप्त नहीं होता था, क्योंकि मैंने प्रतिज्ञा की थी कि किसी से कुछ सहायता न
लूँगा। पिताजी से बिना कुछ कहे मैं चला आया था। मैं पाँच सौ रुपये कहाँ से
लाता ? मैंने दो-एक मित्रों से केवल दो सौ रुपये की जमानत देने की प्रार्थना
की। उन्होंने साफ इन्कार कर दिया। मेरे हृदय पर वज्रपात हुआ। संसार अंधकारमय
दिखाई देता था। पर बाद में एक मित्र की कृपा से नौकरी मिल गई। अब
अवस्था कुछ सुधरी। मैं भी सभ्य पुरुषों की भाँति समय व्यतीत करने लगा। मेरे
पास भी चार पैसे हो गए। वे ही मित्र, जिनसे मैंने दो सौ रुपये की जमानत देने
की प्रार्थना की थी, अब मेरे पास चार-चार हजार रुपयों की थैली, अपनी बंदूक,
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लाइसेंस इत्यादि सब डाल जाते थे कि मेरे यहाँ उनकी वस्तुएँ सुरक्षित रहेंगी।
समय के इस फेर को देखकर मुझे हँसी आती थी।
इस प्रकार कुछ समय बीता। दो-चार ऐसे पुरुषों से भेंट हुई, जिनको पहले
मैं बड़ी श्रद्धा की दृष्टि से देखता था। उन लोगों ने मेरी पलायनावस्था के संबंध
में कुछ समाचार सुने थे। मुझसे मिलकर वे बड़े प्रसन्न हुए। मेरी लिखी हुई
पुस्तकें भी देखीं। इस समय मैं तीसरी पुस्तक "कैथेराइन" लिख चुका था। मुझे
पुस्तकों के व्यवसाय में बहुत घाटा हो चुका था। मैंने माला का प्रकाशन स्थगित
कर दिया। "कैथेराइन" एक पुस्तक-प्रकाशक को दे दी। उन्होंने बड़ी कृपा कर
उस पुस्तक को थोड़े से हेर-फेर के साथ प्रकाशित कर दिया। "कैथेराइन" को
देखकर मेरे इष्ट मित्रों को बड़ा हर्ष हुआ। उन्होंने मुझे पुस्तक लिखते रहने के
लिए बड़ा उत्साहित किया। मैंने "स्वदेशी रंग" नामक एक और पुस्तक लिखकर
एक पुस्तक-प्रकाशक को दी। वह भी प्रकाशित हो गई।
बड़े परिश्रम के साथ मैंने एक पुस्तक "क्रांतिकारी जीवन" लिखी। "क्रांतिकारी
जीवन" को कई पुस्तक-प्रकाशकों ने देखा, पर किसी का साहस न हो सका कि
उसको प्रकाशित करे। आगरा, कानपुर, कलकत्ता आदि कई स्थानों में घूमकर
पुस्तक मेरे पास लौट आई। कई मासिक पत्रिकाओं में "राम" तथा "अज्ञात"
नाम से मेरे लेख प्रकाशित हुआ करते थे। लोग बड़े चाव से उन लेखों का पाठ
करते थे। मैंने किसी स्थान पर लेखन शैली का नियमपूर्वक अध्ययन न किया
था। बैठे-बैठे खाली समय में ही कुछ लिखा करता और प्रकाशनार्थ भेज दिया
करता था। अधिकतर बंगला तथा अंग्रेजी की पुस्तकों से अनुवाद करने का ही
विचार था। थोड़े समय के पश्चात् श्री अरविन्द घोष की बंगला पुस्तक "योगिक
साधन" का अनुवाद किया। दो-एक पुस्तक-प्रकाशकों को दिखाया पर वे बहुत
कम धन देकर पुस्तक लेना चाहते थे। आजकल के समय में हिन्दी के लेखकों
तथा अनुवादकों की अधिकता के कारण पुस्तक-प्रकाशकों को भी बड़ा अभिमान
हो गया है। बड़ी कठिनाई से बनारस के एक प्रकाशक ने "योगिक साधन"
स्वतंत्र जीवन 49
प्रकाशित करने का वचन दिया। पर थोड़े दिनों में वह स्वयं ही अपने साहित्य
मंदिर में ताला डालकर कहीं पधार गए। पुस्तक का अब तक कोई पता न लगा।
पुस्तक अति उत्तम थी। प्रकाशित हो जाने से हिन्दी साहित्य-सेवियों को अच्छा
लाभ होता। मेरे पास जो “बोलशेविक करतूत” तथा “मन की लहर” की प्रतियाँ
बची थीं, वे मैंने लागत से भी कम मूल्य पर कलकत्ता के एक व्यक्ति श्री
दीनानाथ सगतिया को दे दीं। वहुत थोड़ी पुस्तकें मैंने बेची थीं। दीनानाथ महाशय
पुस्तकें हड़प कर गए। मैंने नोटिस दिया। नालिश की। लगभग चार सौ रुपये की
डिग्री भी हुई, किन्तु दीनानाथ महाशय का कहीं पता न चला। वह कलकत्ता
छोड़कर पटना गए। पटना भी कई गरीबों का रुपया मारकर कहीं छिप गए।
अनुभव-हीनता' से इस प्रकार ठोकरें खानी पड़ीं। कोई पथ-प्रदर्शक तथा सहायक
नहीं था, जिससे परामर्श करता। व्यर्थ के उद्योग धंधों तथा स्वतंत्र कार्यों में शक्ति
का व्यय करता रहा।
पुनर्संगठन
जिन महानुभावों को मैं पूजनीय दृष्टि से देखता था, उन्हीं ने अपनी इच्छा
प्रकट की कि मैं क्रांतिकारी दल का पुनः संगठन करूँ। गत जीवन के अनुभव से
मेरा हृदय अत्यंत दुखी था। मेरा साहस न देखकर इन लोगों ने बहुत उत्साहित
किया और कहा कि हम आपको केवल निरीक्षण का कार्य देंगे, बाकी सब कार्य
स्वयं करेंगे। कुछ मनुष्य हमने पहले जुटा लिए हैं, धन की कमी न होगी, आदि।
मान्य पुरुषों की प्रवृत्ति देखकर मैंने भी स्वीकृति दे दी। मेरे पास जो अस्त्र-शस्त्र
थे, मैंने दिए। जो दल उन्होंने एकत्रित किया था, उसके नेता से मुझे मिलाया।
उसकी वीरता की बड़ी प्रशंसा की। वह एक अशिक्षित ग्रामीण पुरुष था। मेरी
समझ में आ गया कि यह बदमाशों का या स्वार्थी जनों का कोई संगठन है।
मुझसे उस दल के नेता ने दल का कार्य निरीक्षण करने की प्रार्थना की। दल में
कई फौज तथा लड़ाई पर से वापस किए गए व्यक्ति थे। मुझे इस प्रकार के
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व्यक्तियों से कभी कोई काम न पड़ा था। मैं दो-एक महानुभावों को साथ ले इन
लोगों का कार्य देखने के लिए गया।
थोड़े दिनों बाद इस दल के नेता महाशय एक वैश्या को भी ले आए। उसे
रिवाल्वर दिखाया कि यदि कहीं गई तो गोली से मार दी जाएगी। यह समाचार
सुन उसी दल के दूसरे सदस्य बहुत नाराज़ हुए। और मेरे पास खबर भेजने का
प्रबंध किया। उसी समय एक दूसरा आदमी पकड़ा गया, जो नेता महाशय को
जानता था। नेता महाशय रिवाल्वर तथा कुछ सोने के आभूषणों-सहित गिरफ्तार
हो गए। उनकी वीरता की बड़ी प्रशंसा सुनी थी, जो इस प्रकार प्रकट हुई कि
कई आदमियों के नाम पुलिस को बताए और इक़बाल कर लिया। लगभग
तीस-चालीस आदमी पकड़े गए।
एक दूसरा व्यक्ति जो बहुत वीर था। पुलिस उसके पीछे पड़ी थी। एक दिन
पुलिस कप्तान ने सवार तथा तीस-चालीस बंदूक़ वाले सिपाही लेकर उसके घर में
उसे घेर लिया। उसने छत पर चढ़कर दो-नाली बंदूक़ से लगभग तीन सौ फ़ायर
किए। बंदूक़ गरम होकर गल गई। पुलिस वाले समझे कि घर में कई आदमी हैं।
सब पुलिस वाले छिपकर आड़ में से सुबह की प्रतीक्षा करने लगे। उसने मौका
पाया। मकान के पीछे से कूद पड़ा, एक सिपाही ने उसे देख लिया। उसने
सिपाही की नाक पर रिवाल्वर का कुंदा मारा। सिपाही चिल्लाया। सिपाही के
चिल्लाते ही मकान में से एक फ़ायर हुआ। पुलिस वालों ने समझा मकान ही में
है। सिपाही को धोखा हुआ होगा। बस, वह जंगल में निकल गया। जंगल में
जाकर एक दूसरे दल से मिला। जंगल में भी एक समय पुलिस कप्तान से सामना
हो गया। गोली चली। उसके भी पैर में छर्रे लगे थे। अब यह बड़े साहसी हो
गए थे। समझ गए थे कि पुलिसवाले किस प्रकार समय पर आड़ में छिप जाते
हैं। इन लोगों का दल छिन्न-भिन्न हो गया था। अतः उन्होंने मेरे पास आश्रय
लेना चाहा। मैंने बड़ी कठिनाई से अपना पीछा छुड़वाया। तत्पश्चात् जंगल में
जाकर ये दूसरे दल से मिल गए। वहाँ पर दुराचार के कारण जंगल के दल के
स्वतंत्र जीवन 51
नेता ने उन्हें गोली से मार दिया। उस नेता को भी समय पाकर उसके साथी ने
गोली से मार दिया। इस प्रकार सब दल छिन्न-भिन्न हो गया। जो पकड़े गए उन
पर कई डकैतियों के मुकदमे चले। किसी को तीस साल, किसी को पचास साल,
किसी को बीस साल की सज़ाएँ हुईं। एक बेचारा, जिसका किसी डकैती से कोई
संबंध न था, केवल शत्रुता के कारण फँसा दिया गया। उसे फाँसी हो गई और
जो सब प्रकार डकैतियों में सम्मिलित था, जिसके पास डकैती का माल तथा कुछ
हथियार पाए गए, पुलिस से गोली भी चली, उसे पहले फाँसी की सज़ा की आज्ञा
हुई, पर पैरवी अच्छी हुई, अतएव हाईकोर्ट से फाँसी की सज़ा माफ़ हो गई, केवल
पाँच वर्ष की सजा रह गई। जेल वालों से मिलकर उसने डकैतियों में शिनाख्त न
होने दी थी। इस प्रकार इस दल की समाप्ति हुई। भगवान की कृपा से हमारे
अस्त्र बच गए। केवल एक ही रिवाल्वर पकड़ा गया।
नोट बनाना
इसी बीच मेरे एक मित्र की एक नोट बनाने वाले महाशय से भेंट हुई।
उन्होंने बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधीं। बड़ी लंबी-लंबी स्कीम बाँधने के पश्चात् मुझसे
कहा कि एक नोट बनाने वाले से भेंट हुई है। बड़ा दक्ष पुरुष है। मुझे भी बना
हुआ नोट देखने की बड़ी तीव्र इच्छा थी। मैंने उन सज्जन के दर्शन की इच्छा
प्रकट की। जब उक्त नोट बनाने वाले महाशय मुझे मिले तो बड़ी-बड़ी बातें कीं।
मैंने कहा कि मैं स्थान तथा आर्थिक सहायता दूँगा, नोट बनाओ। जिस प्रकार
उन्होंने मुझसे कहा, मैंने सब प्रबंध कर दिया, किंतु मैंने कह दिया था कि नोट
बनाते समय मैं वहाँ उपस्थित रहूँगा, मुझे बताना कुछ मत, पर मैं नोट बनाने की
रीति अवश्य देखना चाहता हूँ। पहले-पहल उन्होंने दस रुपये का नोट बनाने का
निश्चय किया। मुझसे एक दस रुपये का नया साफ नोट मँगाया। नौ रुपये दवा
खरीदने के बहाने से ले गए। रात्रि में नोट बनाने का प्रबंध हुआ। दो शीशे
लाए। कुछ कागज भी लाए। दो-तीन शीशियों में कुछ दवाई थी। दवाइयों को
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मिलाकर एक प्लेट में सादे कागज पानी में भिगोए। मैं जो साफ़ नोट लाया था,
उस पर एक सादा कागज लगाकर दोनों को दूसरी दवा डालकर धोया। फिर दो
सादे कागजों में लपेट एक पुड़िया-सी बनाई और अपने एक साथी को दी कि
उसे आग पर गरम कर लाए। आग वहाँ से कुछ दूर पर जलती थी। कुछ समय
तक वह आग पर गरम करता रहा और पुड़िया लाकर वापस दे दी। नोट बनाने
वाले ने पुड़िया खोलकर दोनों शीशों में दबाकर शीशों को दवा में धोया और
फीते से शीशों को बाँधकर रख दिया और कहा कि दो घंटे में नोट बन जाएगा।
शीशे रख दिए। बातचीत होने लगी। कहने लगा, "इस प्रयोग में बड़ा व्यय होता
है। छोटे-छोटे नोट बनाने से कोई लाभ नहीं। बड़े नोट बनाने चाहिए, जिससे
पर्याप्त धन की प्राप्ति हो।" इस प्रकार मुझे भी सिखा देने का वचन दिया। मुझे
कुछ कार्य था। मैं जाने लगा तो वह भी चला गया। दो घंटे के बाद आने का
निश्चय हुआ।
मैं विचारने लगा कि किस प्रकार एक नोट के ऊपर दूसरा सादा कागज
रखने से नोट बन जाएगा। मैंने प्रेस का काम सीखा था। थोड़ी बहुत फ़ोटोग्राफी
भी जानता था। साइंस (विज्ञान) का भी अध्ययन किया था। कुछ समझ में न
आया कि नोट सीधा कैसे छपेगा। सबसे बड़ी बात यह थी कि नंबर कैसे छपेंगे।
मुझे बड़ा भारी संदेह हुआ। दो घंटे बाद मैं जब गया तो रिवाल्वर भरकर जेब में
डालकर ले गया। यथासमय वह महाशय आए। उन्होंने शीशे खोलकर कागज
निकालकर उन्हें फिर एक दवा से धोया। अब दोनों कागज खोले। एक मेरा
लाया हुआ नोट और दूसरा एक दस रुपये का नोट उसी के ऊपर से उतारकर
सुखाया। कहा- "कितना साफ़ नोट है।" मैंने हाथ में लेकर देखा। दोनों नोटों
के नंबर मिलाए। नंबर नितांत भिन्न-भिन्न थे। मैंने जेब से रिवाल्वर निकाल नोट
बनाने वाले महाशय की छाती पर रख, कहा, "बदमाश ! इस तरह ठगता फिरता
है ?" वह काँपकर गिर पड़ा ! मैंने उसको उसकी मूर्खता समझाई कि यह ढोंग
गाँववासियों के सामने चल सकता है, अनजान पढ़े-लिखे भी धोखे में आ सकते
हैं। किन्तु तू मुझे धोखा देने आया है। अंत में मैंने उससे प्रतिज्ञा-पत्र लिखाकर,
स्वतंत्र जीवन 53
उस पर उसके हाथों की दसों अंगुलियों के निशान लगवाए कि वह ऐसा काम
फिर नहीं करेगा। दसों अंगुलियों के निशान देने में उसने कुछ ढील की। मैंने
रिवाल्वर उठाकर कहा कि गोली चलती है, उसने तुरंत दसों अंगुलियों के निशान
बना दिए। बुरी तरह काँप रहा था। मेरे उन्नीस रुपये खर्च हो चुके थे। मैंने
दोनों नोट रख लिए और शीशे, दवाएँ आदि सब छीन लिए कि मित्रों को तमाशा
दिखाऊँगा। तत्पश्चात् उन महाशय को विदा किया। उसने किया यह था कि जब
अपने साथी को आग पर गरम करने के लिए कागज की पुड़िया दी थी, उसी
समय वह साथी सादे कागज की पुड़िया बदलकर दूसरी पुड़िया ले आया जिसमें
दोनों नोट थे। इस प्रकार नोट बन गया।
इस प्रकार का एक बड़ा भारी दल है, जो सारे भारत में ठगी का काम
करके हज़ारों रुपये पैदा करता है। मैं एक सज्जन को जानता हूँ जिन्होंने इसी
प्रकार पचास हज़ार से अधिक रुपये पैदा किए हैं। होता यह है कि ये लोग
अपने एजेंट रखते हैं। वे एजेंट साधारण पुरुषों के पास जाकर नोट बनाने की
कथा कहते हैं। आता धन किसे बुरा लगता है ? वे नोट बनवाते हैं। इस
प्रकार पहले दस का नोट बनाकर दिया, वे बाज़ार में बेच आए। सौ रुपये का
बनाकर दिया वह भी बाज़ार में चलाया, और चल क्यों न जाए ? इस प्रकार
के सब नोट असली होते हैं। वे तो केवल चाल से रख दिए जाते हैं। इसके
बाद कहा कि हज़ार या पाँच सौ का नोट लाओ तो कुछ धन भी मिले।
जैसे-तैसे करके बेचारा एक हज़ार का नोट लाया। सादा कागज रखकर शीशे में
बाँध दिया। हज़ार का नोट जेब में रखा और चंपत हुए। नोट के मालिक
रास्ता देखते हैं, वहाँ नोट बनाने वालों का पता ही नहीं। अंत में विवश हो
शीशों को खोला जाता है, तो दो सादे कागजों के अलावा कुछ नहीं मिलता।
वे अपने सिर पर हाथ मारकर रह जाते हैं। इस डर से कि यदि पुलिस को
मालूम हो गया तो और लेने के देने पड़ेंगे, किसी से कुछ कह भी नहीं सकते।
कलेजा मसोसकर रह जाते हैं। पुलिस ने इस प्रकार के कुछ अभियुक्तों को
Uploaded By Rajesh Tanti.
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गिरफ्तार भी किया, किंतु ये लोग पुलिस को नियमपूर्वक चौथ देते रहते हैं और
इस कारण बचे रहते हैं।
चालबाजी
कई महानुभावों ने गुप्त समिति के नियम आदि बनाकर मुझे दिखाए। उनमें
एक नियम यह भी था कि जो व्यक्ति समिति का कार्य करें, उन्हें समिति की
ओर से कुछ मासिक दिया जाए। मैंने इस नियम को अनिवार्य रूप में मानना
अस्वीकार किया। मैं यहाँ तक सहमत था कि जो व्यक्ति समिति के कार्य में
अपना सारा समय व्यतीत करें, उनको केवल गुजारा-मात्र समिति की ओर से
दिया जा सकता है। जो लोग कोई व्यवस्था करते हैं, उन्हें किसी प्रकार का
मासिक भत्ता देना उचित न होगा। जिन्हें समिति के कोष में से कुछ दिया जाए,
उनको भी कुछ व्यवसाय करने का प्रबंध करना उचित है, ताकि ये लोग पूर्णतः
समिति की सहायता पर निर्भर रहकर निरे भाड़े के टट्टू न बन जाएँ। भाड़े के
टट्टुओं से समिति का कार्य लेना, जिसमें कतिपय मनुष्यों के प्राणों का उत्तरदायित्व
हो और थोड़ा-सा भेद खुलने से ही बड़ा भयंकर परिणाम हो सकता है, उचित
नहीं है। तत्पश्चात् उन महानुभावों की राय हुई कि एक निश्चित कोष समिति के
सदस्यों को देने के लिए स्थापित किया जाए, जिसकी आय का ब्यौरा इस प्रकार
हो कि डकैतियों से जितना धन प्राप्त हो उसका आधा समिति के कार्यों में व्यय
किया जाए और आधा समिति के सदस्यों को बराबर-बराबर बाँट दिया जाए। इस
प्रकार परामर्श से मैं सहमत न हो सका और मैंने इस प्रकार की गुप्त समिति में,
जिसका एक उद्देश्य पेट-पूर्ति हो, योग देने से इन्कार कर दिया। जब मेरी इस
प्रकार की दृष्टि देखी तो उन महानुभावों ने आपस में षड्यंत्र रचा।
जब मैंने उन महानुभावों की राय और उनके नियमों को स्वीकार न किया
तो वे चुप हो गए। मैं भी कुछ समझ न सका कि जो लोग मुझमें इतनी श्रद्धा
रखते थे, जिन्होंने कई प्रकार की आशाएँ देखकर मुझसे क्रांतिकारी दल का
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पुनर्संगठन करने की प्रार्थनाएँ की थीं, अनेक प्रकार की उम्मीदें बँधाई थीं, सब
कार्य स्वयं करने के वचन दिए थे, वे लोग ही मुझसे इस प्रकार के नियम बनाने
की माँग करने लगे। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। प्रथम प्रयत्न में, जिस समय मैं
मैनपुरी षड्यंत्र के सदस्यों सहित कार्य करता था, उस समय हममें से कोई भी
अपने व्यक्तिगत (प्राइवेट) खर्च में समिति का धन व्यय करना पूर्ण पाप समझता
था। जहाँ तक हो सकता अपने खर्च के लिए माता-पिता से कुछ लाकर प्रत्येक
सदस्य समिति के कार्यों में धन व्यय किया करता था। इस कारण मेरा साहस
इस प्रकार के नियमों में सहमत होने का न हो सका। मैंने विचार किया कि यदि
कोई समय आया और किसी प्रकार अधिक धन प्राप्त हुआ, तो कुछ सदस्य ऐसे
स्वार्थी हो सकते हैं, जो अधिक धन लेने की इच्छा करें, और आपस में शत्रुता
बढ़े। उसके परिणाम बड़े भयंकर हो सकते हैं। अतः इस प्रकार के कार्य में योग
देना मैंने उचित न समझा।
मेरी यह अवस्था देख इन लोगों ने आपस में षड्यंत्र रचा, कि जिस प्रकार
मैं कहूँ वे नियम स्वीकार कर लें और विश्वास दिलाकर जितने अस्त्र-शस्त्र मेरे
पास हों, उनको मुझसे लेकर सब पर अपना कब्ज़ा जमा लें। यदि अस्त्र-शस्त्र
माँगूँ तो मुझसे युद्ध किया जाए, और आवश्यकता पड़े तो मुझे कहीं लेजाकर
जान से मार दिया जाए। तीन सज्जनों ने इस प्रकार का षड्यंत्र रचा और मुझसे
चालबाज़ी करनी चाही। भगवान की कृपा से उनमें से एक सदस्य के मन में कुछ
दया आ गई। उसने आकर मुझसे सब भेद कह दिया। मुझे सुनकर बड़ा खेद
हुआ कि जिन व्यक्तियों को मैं पिता तुल्य मानकर श्रद्धा करता हूँ, वे ही मेरे
नाश करने के लिए इस प्रकार नीचता का कार्य करने को तैयार हैं। मैं सँभल
गया। मैं उन लोगों से सतर्क रहने लगा कि पुनः प्रयाग जैसी घटना न घटे। जिन
महाशय ने मुझसे भेद कहा था, उनकी उत्कट इच्छा थी कि वह एक रिवाल्वर
रखें और इस इच्छा-पूर्ति के लिए उन्होंने मेरा विश्वासपात्र बनने के कारण मुझसे
भेद कहा था। मुझसे एक रिवाल्वर माँगा कि मैं उन्हें कुछ समय के लिए रिवाल्वर
दे दूँ। यदि मैं उन्हें रिवाल्वर दे देता तो उसे वह हजम कर जाते। मैं कर ही
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क्या सकता था ? और अब रिवाल्वर आदि पाना कोई सरल कार्य भी न था।
बाद को बड़ी कठिनाई से इन चालबाजियों से अपना पीछा छुड़ाया।
अब सब ओर से चित्त को हटाकर बड़े मनोयोग से नौकरी में समय व्यतीत
करने लगा। कुछ रुपया इकट्ठा करने के विचार से, कुछ कमीशन आदि का
प्रबंध कर लेता था। इस प्रकार पिताजी का थोड़ा-सा भार बँटाया। सबसे छोटी
बहन का विवाह नहीं हुआ था। पिताजी की शक्ति के बाहर था कि उस बहन
का विवाह किसी भले घर में कर सकते। मैंने रुपया जमा करके बहन का विवाह
एक अच्छे जमींदार के यहाँ कर दिया। पिताजी का भार उतर गया। अब केवल
माता, पिता, दादी तथा छोटे भाई थे, जिनके भोजन का प्रबंध होना अधिक
कठिन काम नहीं था। अब माताजी की उत्कट इच्छा हुई कि मैं भी विवाह कर
लूँ। कई अच्छे-अच्छे विवाह-संबंध के सुयोग एकत्रित हुए। किंतु मेरा विचार था
कि जब तक पर्याप्त धन पास न हो, विवाह-बंधन में फँसना ठीक नहीं। मैंने
स्वतंत्र कार्य आरंभ किया, नौकरी छोड़ दी। एक मित्र ने मेरी सहायता की। मैंने
रेशमी कपड़ा बनाने का एक निजी कारखाना खोल लिया। बड़े मनोयोग तथा
परिश्रम से काम किया। परमात्मा की दया से अच्छी सफलता हुई। एक-डेढ़ साल
में ही मेरा कारखाना चमक गया। तीन-चार हजार की पूँजी से कार्य आरंभ किया
था। एक साल बाद सब खर्च निकाल कर लगभग दो हजार रुपये का लाभ
हुआ। मेरा उत्साह और भी बढ़ा। मैंने एक-दो व्यवसाय और भी आरंभ किए।
उसी समय मालूम हुआ कि संयुक्त-प्रांत के क्रांतिकारी दल का पुनर्संगठन हो रहा
है। कार्यारंभ हो गया है। मैंने भी योग देने का वचन दिया, किंतु उस समय मैं
अपने व्यवसाय में बुरी तरह फँसा हुआ था। मैंने छः मास का समय लिया कि
छः मास में मैं अपने व्यवसाय को अपने साझी को सौंप दूँगा, और अपने आपको
उसमें से निकाल लूँगा, तब स्वतंत्रतापूर्वक क्रांतिकारी कार्य में योग दे सकूँगा।
छः मास तक मैंने अपने कारखाने का सब काम साफ करके अपने साथी को
सब काम समझा दिया, उसके बाद अपने वचनानुसार कार्य में मदद देने का
प्रयास किया।
चतुर्थ खण्ड
वृहत् संगठन
यद्यपि मैं अपना निश्चय कर चुका था कि अब इस प्रकार के कार्यों में
कोई भाग न लूँगा, तथापि मुझे पुनः क्रांतिकारी आंदोलन में हाथ डालना पड़ा।
जिसका कारण यह था कि मेरी इच्छा समाप्त नहीं हुई थी, मेरे दिल के अरमान
न निकले थे। असहयोग आंदोलन शिथिल हो चुका था। पूर्ण आशा थी कि
जितने देश के नवयुवक उस आंदोलन में भाग लेते थे, उसमें अधिकतर क्रांतिकारी
आंदोलन में सहायता देंगे और पूरी लगन से काम करेंगे। जब कार्य आरंभ हो
गया और असहयोगियों को टटोला तो वे आंदोलन से कहीं अधिक शिथिल हो
चुके थे। उनकी आशाओं पर पानी फिर चुका था। निज की पूँजी समाप्त हो
चुकी थी। घर में व्रत हो रहे थे। आगे की भी कोई विशेष आशा न थी। कांग्रेस
में भी स्वराज्य दल का जोर हो गया था। जिनके पास कुछ धन तथा इष्ट मित्रों
का संगठन था, वे कौंसिलों तथा असेंबली के सदस्य बन गए। ऐसी अवस्था में
यदि क्रांतिकारी संगठनकर्त्ताओं के पास पर्याप्त धन होता तो वे असहयोगियों
को हाथ में लेकर उनसे काम ले सकते थे। जितना भी सच्चा काम करने वाला
हो, किंतु पेट तो सबके हैं। दिनभर में थोड़ा-सा अन्न क्षुधा-निवृत्ति के लिए
मिलना परमावश्यक है। फिर शरीर ढकने की भी आवश्यकता होती है।
अतएव कुछ प्रबंध ही ऐसा होना चाहिए, जिसमें दैनिक आवश्यकताएँ पूरी हो
जाएँ। जितने धनी-मानी स्वदेश-प्रेमी थे उन्होंने असहयोग आंदोलन में पूर्ण
58 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
सहायता दी थी। फिर भी कुछ ऐसे कृपालु सज्जन थे, जो थोड़ी-बहुत आर्थिक
सहायता देते थे। किन्तु प्रांत-भर के प्रत्येक जिले में संगठन करने का विचार
था। पुलिस की दृष्टि बचाने के लिए भी पूर्ण प्रयत्न करना पड़ता था। ऐसी
परिस्थिति में साधारण नियमों को काम में लाते हुए कार्य करना बड़ा कठिन
था। अनेक कोशिशों के पश्चात् कुछ भी सफलता न होती थी। दो-चार जिलों
में संगठनकर्ता नियुक्त किए गए थे, जिनको कुछ मासिक गुजारा दिया जाता
था। पाँच-दस महीने तक तो इस प्रकार कार्य चलता रहा। बाद में जो सहायक
कुछ आर्थिक सहायता देते थे, उन्होंने भी हाथ खींच लिया। अब हम लोगों की
अवस्था बहुत खराब हो गई। सब कार्यभार मेरे ही ऊपर आ चुका था। कोई
भी किसी प्रकार की मदद न देता था। जहाँ-तहाँ से पृथक-पृथक जिलों में कार्य
करने वाले मासिक व्यय की माँग कर रहे थे। कई मेरे पास आए भी। मैंने
कुछ रुपया कर्ज लेकर उन लोगों को एक मास का खर्च दिया। कइयों पर कुछ
कर्ज भी हो चुका था। मैं कर्ज न निपटा सका। एक केन्द्र के कार्यकर्त्ता को
जब पर्याप्त धन न मिल सका, तो वह कार्य छोड़कर चले गए। मेरे पास क्या
प्रबंध था, जो मैं उसकी उदर-पूर्ति कर सकता ? अद्भुत समस्या थी। किसी
तरह उन लोगों को समझाया।
थोड़े दिनों में क्रांतिकारी पर्चे आए। सारे देश में निश्चित तिथि पर पर्चे बाँटे
गए। रंगून, बंबई, लाहौर, अमृतसर, कलकत्ता तथा बंगाल के मुख्य शहरों तथा
संयुक्त प्रांत के सभी मुख्य-मुख्य जिलों में पर्याप्त संख्या में पर्चों का वितरण
हुआ। भारत सरकार बड़ी सशंक हुई कि ऐसी कौन-सी और इतनी बड़ी सुसंगठित
समिति है, जो एक ही दिन में सारे भारत में पर्चे बँट गए। उसी के बाद मैंने
कार्यकारिणी की एक बैठक करके जो केन्द्र खाली हो गया था, उसके लिए एक
महाशय को नियुक्त किया। केन्द्र में कुछ परिवर्तन भी हुआ, क्योंकि सरकार के
पास संयुक्त प्रांत के संबंध में बहुत-सी सूचनाएँ पहुँच चुकी थीं। भविष्य की
कार्य-प्रणाली का निर्णय किया गया।
हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA), काकोरी एक्शन व गिरफ्तारी
बृहत् संगठन 59
कार्यकर्त्ताओं की दुर्दशा
इस समय समिति के सदस्यों की बड़ी दुर्दशा थी। चने मिलना भी कठिन
था। सब पर कुछ-न-कुछ कर्ज हो गया था। किसी के पास साबुत कपड़े तक न
थे। कुछ विद्यार्थी वनकर धार्मिक स्थानों तक में भोजन कर आते थे। चार-पाँच
ने अपने-अपने केन्द्र त्याग दिए। पाँच सौ से अधिक रुपये मैं कर्ज़ लेकर व्यय
कर चुका था। यह दुर्दशा देख मुझे वड़ा कष्ट होने लगा। मुझसे भी भर पेट
भोजन न किया जाता था। सहायता के लिए कुछ सहानुभूति रखने वालों का द्वार
खटखटाया किंतु कोरा उत्तर मिला। किंकर्त्तव्यविमूढ़ था (समझ में नहीं आ रहा
था कि क्या करूँ)। कुछ समझ में न आता था। कोमल-हृदय नवयुवक मेरे चारों
ओर बैठकर कहा करते, “पंडितजी, अब क्या करें?” मैं उनके सूखे-सूखे मुख
देख अक्सर रो पड़ता कि स्वदेश-सेवा का व्रत लेने के कारण फकीरों से भी बुरी
दशा हो रही है। एक-एक कुर्ता तथा धोती भी ऐसी नहीं थी जो साबुत होती।
लंगोट बाँधकर दिन व्यतीत करते थे। अंगोछे पहनकर नहाते थे, एक समय क्षेत्र
में भोजन करते थे, एक समय दो-दो पैसे के सत्तू खाते थे। मैं पंद्रह वर्ष से एक
समय दूध पीता था। इन लोगों की यह दशा देखकर मुझे दूध पीने का साहस
न होता था। मैं सबके साथ बैठकर सत्तू खा लेता था। मैंने विचार किया कि
इतने नवयुवकों के जीवन को नष्ट करके उन्हें कहाँ भेजा जाए? जब समिति का
सदस्य वनाया था, तो लोगों ने बड़ी-बड़ी आशाएँ बँधाई थीं। कइयों का पढ़ना-लिखना
छुड़ाकर काम में लगा दिया था। पहले से मुझे यह हालत मालूम होती तो मैं
कदापि इस प्रकार की समिति में योग न देता। बुरा फँसा। क्या करूँ, कुछ
समझ में नहीं आता था। अंत में धैर्य धारण कर दृढ़तापूर्वक कार्य करने का
निश्चय किया।
इसी बीच में बंगाल आर्डिनेंस निकला और गिरफ्तारियाँ हुईं। इनकी गिरफ्तारियों
ने यहाँ तक असर डाला कि कार्यकर्त्ताओं में निष्क्रियता के भाव आ गए। क्या
प्रबंध किया जाए, कुछ निर्णय नहीं कर सके। मैंने प्रयत्न किया कि किसी तरह
60 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
एक सौ रुपये मासिक का कहीं से प्रबंध हो जाए। प्रत्येक केन्द्र के प्रतिनिधि से
हर प्रकार से प्रार्थना की थी कि समिति के सदस्यों से कुछ सहायता लें, मासिक
चंदा वसूल करें, पर किसी ने कुछ न सुनी। कुछ सज्जनों से व्यक्तिगत प्रार्थना की
कि वे अपने वेतन में से कुछ मासिक दे दिया करें। किसी ने कुछ ध्यान न
दिया। सदस्य रोज मेरे द्वार पर खड़े रहते थे। पत्रों की भरमार थी कि कुछ धन
का प्रबंध कीजिए, भूखों मर रहे हैं। दो-एक को व्यवसाय में लगाने का भी
इंतजाम किया। दो-चार जिलों में काम बंद कर दिया, वहाँ के कार्यकर्त्ताओं से
स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि हम मासिक शुल्क नहीं दे सकते। यदि निर्वाह का
कोई दूसरा मार्ग हो, और उस पर ही निर्भर रहकर कार्य कर सकते हो तो करो।
हमसे जिस समय हो सकेगा देंगे, किन्तु मासिक वेतन देने के लिए हम बाध्य
नहीं। कोई बीस रुपये कर्ज के माँगता था, कोई पचास का बिल भेजता था, और
कइयों ने असंतुष्ट होकर कार्य छोड़ दिया। मैंने भी समझ लिया— ठीक ही है, पर
इतना करने पर भी गुजर न हो सकी।
अशांत युवक-दल
कुछ महानुभावों की प्रकृति होती है कि अपनी कुछ शान जमाना या अपने
आपको बड़ा दिखाना वे अपना कर्त्तव्य समझते हैं, जिससे भयंकर हानियाँ हो
जाती हैं। भोले-भाले आदमी ऐसे मनुष्यों में विश्वास करके उनमें आशातीत
साहस, योग्यता तथा कार्यकुशलता की आशा करके उन पर श्रद्धा रखते हैं। किंतु
समय आने पर यह निराशा के रूप में परिणत हो जाती है। इस प्रकार के मनुष्यों
की किन्हीं कारणों से यदि प्रतिष्ठा हो गई, अथवा अनुकूल परिस्थितियों के
उपस्थित हो जाने से उन्होंने किसी उच्च कार्य में योग दे दिया, तब तो फिर वे
अपने आपको बड़ा भारी कार्यकर्त्ता जाहिर करते हैं। जनसाधारण भी अंधविश्वास
से उनकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं, विशेषकर नवयुवक तो इस प्रकार के
मनुष्यों के जाल में शीघ्र ही फँस जाते हैं। ऐसे ही लोग नेतागिरी की धुन में
बृहत् संगठन · 61
अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग पकाया करते हैं। इसी कारण पृथक-पृथक
दलों का निर्माण होता है। इस प्रकार के मनुष्य प्रत्येक समाज तथा प्रत्येक जाति
में पाए जाते हैं। इनसे क्रांतिकारी दल भी मुक्त नहीं रह सकता। नवयुवकों का
स्वभाव चंचल होता है, वे शांत रहकर संगठित कार्य करना बड़ा कठिन समझते
हैं। उनके हृदय में उत्साह की उमंगें उठती हैं। वे समझते हैं दो-चार अस्त्र-शस्त्र
हाथ आए कि हमने सरकार को नाकों चने चबवा दिए। मैं भी जब क्रांतिकारी
दल में योग देने का विचार कर रहा था, उस समय मेरी प्रबल इच्छा थी कि यदि
एक रिवाल्वर मिल जाए तो दस-बीस अंग्रेजों को मार दूँ। इसी प्रकार के भाव
मैंने कई नवयुवकों में देखे। उनकी बड़ी प्रबल हार्दिक इच्छा होती है कि किसी
प्रकार एक रिवाल्वर यां पिस्तौल उनके हाथ लग जाए तो वे उसे अपने पास
रख लें।
मैंने उनसे रिवाल्वर पास रखने का लाभ पूछा, तो कोई संतोषजनक उत्तर
नहीं दे सके। कई युवकों को मैंने इस शौक को पूरा करने में सैकड़ों रुपये
बरबाद करते भी देखा है। किसी क्रांतिकारी आंदोलन के सदस्य नहीं, कोई विशेष
कार्य भी नहीं, महज शौकिया रिवाल्वर पास रखेंगे। ऐसे ही थोड़े से युवकों का
एक दल एक महोदय ने भी एकत्रित किया। ये सब बड़े सच्चरित्र, स्वाभिमानी
और सच्चे कार्यकर्त्ता थे। इस दल ने विदेश से अस्त्र प्राप्त करने का बड़ा उत्तम
सूत्र प्राप्त किया था, जिससे इच्छानुसार पर्याप्त अस्त्र मिल सकते थे। उन अस्त्रों
के दाम भी अधिक न थे। अस्त्र भी पर्याप्त संख्या में बिल्कुल नए मिलते थे।
यहाँ तक प्रबंध हो गया था कि यदि हम लोग रुपये का उचित प्रबंध कर देंगे,
और समय से मूल्य निपटा दिया करेंगे, तो हमको माल उधार भी मिल जाया
करेगा और हमें जब जिस प्रकार के जितनी संख्या में अस्त्रों की आवश्यकता
होगी, मिल जाया करेंगे। यही नहीं समय आने पर हम विशेष प्रकार की मशीन
वाली बंदूकें भी बनवा सकेंगे। इस समय समिति की आर्थिक अवस्था बड़ी खराब
थी। इस सूत्र के हाथ लग जाने और इसके लाभ उठाने की इच्छा होने पर भी
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62 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
बिना रुपये के कुछ होता दिखाई न पड़ता था। रुपये का प्रबंध करना नितांत
आवश्यक था। किंतु वह हो कैसे ? दान कोई देता न था, कर्ज भी न मिलता
था और कोई उपाय न देख डाका डालना तय हुआ। किंतु किसी व्यक्ति विशेष
की सम्पत्ति पर डाका डालना हमें ठीक न लगता था। सोचा, यदि लूटना है तो
सरकारी माल क्यों न लूटा जाए ? इसी उधेड़-बुन में एक दिन मैं रेल में जा रहा
था। गार्ड के डिब्बे के पास की गाड़ी में बैठा था। स्टेशन मास्टर एक थैली लाया
और गार्ड के डिब्बे में डाल गया। कुछ खटपट की आवाज़ हुई। मैंने उतर कर
देखा कि एक लोहे का संदूक रखा है। विचार किया कि इसी में थैली डाली
होगी। अगले स्टेशन पर उसमें थैली डालते भी देखा। अनुमान किया कि लोहे का
संदूक गार्ड के डिब्बे में जंजीर से बँधा रहता होगा, ताला पड़ा रहता होगा,
आवश्यकता होने पर ताला खोलकर उतार लेते होंगे। इसके थोड़े दिनों बाद
लखनऊ स्टेशन पर जाने का अवसर प्राप्त हुआ। देखा एक गाड़ी में से कुली
लोहे के आमदनी वाले संदूक उतार रहे हैं। निरीक्षण करने से मालूम हुआ कि
उसमें जंजीर ताला कुछ नहीं पड़ता, यों ही रखे जाते हैं। उसी समय निश्चय
किया कि इसी पर हाथ मारूँगा।
रेलवे डकैती (काकोरी)
उसी समय से धुन सवार हुई। तुरंत स्थान पर जा टाइम-टेबुल देखकर
अनुमान किया कि सहारनपुर से गाड़ी चलती है, लखनऊ तक अवश्य दस हजार
रुपये रोज की आमदनी होती होगी। सब बातें ठीक करके कार्यकर्त्ताओं का संग्रह
किया। दस नवयुवकों को लेकर विचार किया कि किसी छोटे स्टेशन पर जब
गाड़ी खड़ी हो, स्टेशन के तारघर पर अधिकार कर लें, और गाड़ी का संदूक
उतारकर तोड़ डालें, जो कुछ मिले उसे लेकर चल दें, परंतु इस कार्य में मनुष्यों
की अधिक संख्या की आवश्यकता थी। इस कारण यही निश्चय किया कि गाड़ी
की जंजीर खींचकर चलती गाड़ी को खड़ा करके तब लूटा जाए। संभव है कि
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बृहत् संगठन 63
[चित्र: मन्मथनाथ गुप्त] तीसरे दर्जे की जंजीर खींचने से गाड़ी
खड़ी न हो, क्योंकि तीसरे दर्जे में अक्सर
प्रबंध ठीक नहीं रहता है। इस कारण से
दूसरे दर्जे की जंजीर खींचने का प्रबंध
किया। सब लोग उसी ट्रेन में सवार थे।
गाड़ी खड़ी होने पर सब उतरकर गार्ड के
डिब्बे के पास पहुँच गए। लोहे का संदूक
उतारकर छेनियों से काटना चाहा, छेनियों
मन्मथनाथ गुप्त ने काम न किया, तब कुल्हाड़ा चला।
मुसाफिरों से कह दिया कि सब गाड़ी में चढ़ जाओ। गाड़ी का गार्ड गाड़ी
में चढ़ना चाहता था, पर उसे जमीन पर लेट जाने की आज्ञा दी, ताकि बिना
गार्ड के गाड़ी न जा सके। दो आदमियों को नियुक्त किया कि वे लाइन की
पगडंडी को छोड़कर घास में खड़े होकर गाड़ी से हटे हुए गोली चलाते रहें। एक
सज्जन गार्ड के डिब्बे से उतरे। उनके पास भी माउजर पिस्तौल था। विचारा कि
ऐसा शुभ अवसर जाने कब हाथ आए। माउजर पिस्तौल काहे को चलाने को
मिलेगा ? उमंग जो आई, सीधी करके दागने लगे। मैंने जो देखा तो डाँटा,
क्योंकि गोली चलाने की उनकी ड्यूटी ही नहीं थी। फिर यदि कोई मुसाफिर
कौतूहल-वश बाहर को सिर निकाले तो उसके गोली जरूर लग जाए। हुआ भी
ऐसा ही, जो व्यक्ति रेल से उतरकर अपनी
स्त्री के पास जा रहा था, मेरा ख्याल है
कि उन्हीं महाशय की गोली उसको लग
गई, क्योंकि जिस समय यह महाशय
संदूक नीचे डालकर गार्ड के डिब्बे से उतरे
थे, केवल दो-तीन फायर हुए थे। उसी
समय स्त्री ने कोलाहल किया होगा और [चित्र: भूपेन्द्रनाथ सान्याल]
भूपेन्द्रनाथ सान्याल