रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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एक सौ रुपये मासिक का कहीं से प्रबंध हो जाए। प्रत्येक केन्द्र के प्रतिनिधि से
हर प्रकार से प्रार्थना की थी कि समिति के सदस्यों से कुछ सहायता लें, मासिक
चंदा वसूल करें, पर किसी ने कुछ न सुनी। कुछ सज्जनों से व्यक्तिगत प्रार्थना की
कि वे अपने वेतन में से कुछ मासिक दे दिया करें। किसी ने कुछ ध्यान न
दिया। सदस्य रोज मेरे द्वार पर खड़े रहते थे। पत्रों की भरमार थी कि कुछ धन
का प्रबंध कीजिए, भूखों मर रहे हैं। दो-एक को व्यवसाय में लगाने का भी
इंतजाम किया। दो-चार जिलों में काम बंद कर दिया, वहाँ के कार्यकर्त्ताओं से
स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि हम मासिक शुल्क नहीं दे सकते। यदि निर्वाह का
कोई दूसरा मार्ग हो, और उस पर ही निर्भर रहकर कार्य कर सकते हो तो करो।
हमसे जिस समय हो सकेगा देंगे, किन्तु मासिक वेतन देने के लिए हम बाध्य
नहीं। कोई बीस रुपये कर्ज के माँगता था, कोई पचास का बिल भेजता था, और
कइयों ने असंतुष्ट होकर कार्य छोड़ दिया। मैंने भी समझ लिया— ठीक ही है, पर
इतना करने पर भी गुजर न हो सकी।
अशांत युवक-दल
कुछ महानुभावों की प्रकृति होती है कि अपनी कुछ शान जमाना या अपने
आपको बड़ा दिखाना वे अपना कर्त्तव्य समझते हैं, जिससे भयंकर हानियाँ हो
जाती हैं। भोले-भाले आदमी ऐसे मनुष्यों में विश्वास करके उनमें आशातीत
साहस, योग्यता तथा कार्यकुशलता की आशा करके उन पर श्रद्धा रखते हैं। किंतु
समय आने पर यह निराशा के रूप में परिणत हो जाती है। इस प्रकार के मनुष्यों
की किन्हीं कारणों से यदि प्रतिष्ठा हो गई, अथवा अनुकूल परिस्थितियों के
उपस्थित हो जाने से उन्होंने किसी उच्च कार्य में योग दे दिया, तब तो फिर वे
अपने आपको बड़ा भारी कार्यकर्त्ता जाहिर करते हैं। जनसाधारण भी अंधविश्वास
से उनकी बातों पर विश्वास कर लेते हैं, विशेषकर नवयुवक तो इस प्रकार के
मनुष्यों के जाल में शीघ्र ही फँस जाते हैं। ऐसे ही लोग नेतागिरी की धुन में