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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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बृहत् संगठन 59
कार्यकर्त्ताओं की दुर्दशा
इस समय समिति के सदस्यों की बड़ी दुर्दशा थी। चने मिलना भी कठिन
था। सब पर कुछ-न-कुछ कर्ज हो गया था। किसी के पास साबुत कपड़े तक न
थे। कुछ विद्यार्थी वनकर धार्मिक स्थानों तक में भोजन कर आते थे। चार-पाँच
ने अपने-अपने केन्द्र त्याग दिए। पाँच सौ से अधिक रुपये मैं कर्ज़ लेकर व्यय
कर चुका था। यह दुर्दशा देख मुझे वड़ा कष्ट होने लगा। मुझसे भी भर पेट
भोजन न किया जाता था। सहायता के लिए कुछ सहानुभूति रखने वालों का द्वार
खटखटाया किंतु कोरा उत्तर मिला। किंकर्त्तव्यविमूढ़ था (समझ में नहीं आ रहा
था कि क्या करूँ)। कुछ समझ में न आता था। कोमल-हृदय नवयुवक मेरे चारों
ओर बैठकर कहा करते, “पंडितजी, अब क्या करें?” मैं उनके सूखे-सूखे मुख
देख अक्सर रो पड़ता कि स्वदेश-सेवा का व्रत लेने के कारण फकीरों से भी बुरी
दशा हो रही है। एक-एक कुर्ता तथा धोती भी ऐसी नहीं थी जो साबुत होती।
लंगोट बाँधकर दिन व्यतीत करते थे। अंगोछे पहनकर नहाते थे, एक समय क्षेत्र
में भोजन करते थे, एक समय दो-दो पैसे के सत्तू खाते थे। मैं पंद्रह वर्ष से एक
समय दूध पीता था। इन लोगों की यह दशा देखकर मुझे दूध पीने का साहस
न होता था। मैं सबके साथ बैठकर सत्तू खा लेता था। मैंने विचार किया कि
इतने नवयुवकों के जीवन को नष्ट करके उन्हें कहाँ भेजा जाए? जब समिति का
सदस्य वनाया था, तो लोगों ने बड़ी-बड़ी आशाएँ बँधाई थीं। कइयों का पढ़ना-लिखना
छुड़ाकर काम में लगा दिया था। पहले से मुझे यह हालत मालूम होती तो मैं
कदापि इस प्रकार की समिति में योग न देता। बुरा फँसा। क्या करूँ, कुछ
समझ में नहीं आता था। अंत में धैर्य धारण कर दृढ़तापूर्वक कार्य करने का
निश्चय किया।
इसी बीच में बंगाल आर्डिनेंस निकला और गिरफ्तारियाँ हुईं। इनकी गिरफ्तारियों
ने यहाँ तक असर डाला कि कार्यकर्त्ताओं में निष्क्रियता के भाव आ गए। क्या
प्रबंध किया जाए, कुछ निर्णय नहीं कर सके। मैंने प्रयत्न किया कि किसी तरह