रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थ खण्ड
वृहत् संगठन
यद्यपि मैं अपना निश्चय कर चुका था कि अब इस प्रकार के कार्यों में
कोई भाग न लूँगा, तथापि मुझे पुनः क्रांतिकारी आंदोलन में हाथ डालना पड़ा।
जिसका कारण यह था कि मेरी इच्छा समाप्त नहीं हुई थी, मेरे दिल के अरमान
न निकले थे। असहयोग आंदोलन शिथिल हो चुका था। पूर्ण आशा थी कि
जितने देश के नवयुवक उस आंदोलन में भाग लेते थे, उसमें अधिकतर क्रांतिकारी
आंदोलन में सहायता देंगे और पूरी लगन से काम करेंगे। जब कार्य आरंभ हो
गया और असहयोगियों को टटोला तो वे आंदोलन से कहीं अधिक शिथिल हो
चुके थे। उनकी आशाओं पर पानी फिर चुका था। निज की पूँजी समाप्त हो
चुकी थी। घर में व्रत हो रहे थे। आगे की भी कोई विशेष आशा न थी। कांग्रेस
में भी स्वराज्य दल का जोर हो गया था। जिनके पास कुछ धन तथा इष्ट मित्रों
का संगठन था, वे कौंसिलों तथा असेंबली के सदस्य बन गए। ऐसी अवस्था में
यदि क्रांतिकारी संगठनकर्त्ताओं के पास पर्याप्त धन होता तो वे असहयोगियों
को हाथ में लेकर उनसे काम ले सकते थे। जितना भी सच्चा काम करने वाला
हो, किंतु पेट तो सबके हैं। दिनभर में थोड़ा-सा अन्न क्षुधा-निवृत्ति के लिए
मिलना परमावश्यक है। फिर शरीर ढकने की भी आवश्यकता होती है।
अतएव कुछ प्रबंध ही ऐसा होना चाहिए, जिसमें दैनिक आवश्यकताएँ पूरी हो
जाएँ। जितने धनी-मानी स्वदेश-प्रेमी थे उन्होंने असहयोग आंदोलन में पूर्ण