रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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सहायता दी थी। फिर भी कुछ ऐसे कृपालु सज्जन थे, जो थोड़ी-बहुत आर्थिक
सहायता देते थे। किन्तु प्रांत-भर के प्रत्येक जिले में संगठन करने का विचार
था। पुलिस की दृष्टि बचाने के लिए भी पूर्ण प्रयत्न करना पड़ता था। ऐसी
परिस्थिति में साधारण नियमों को काम में लाते हुए कार्य करना बड़ा कठिन
था। अनेक कोशिशों के पश्चात् कुछ भी सफलता न होती थी। दो-चार जिलों
में संगठनकर्ता नियुक्त किए गए थे, जिनको कुछ मासिक गुजारा दिया जाता
था। पाँच-दस महीने तक तो इस प्रकार कार्य चलता रहा। बाद में जो सहायक
कुछ आर्थिक सहायता देते थे, उन्होंने भी हाथ खींच लिया। अब हम लोगों की
अवस्था बहुत खराब हो गई। सब कार्यभार मेरे ही ऊपर आ चुका था। कोई
भी किसी प्रकार की मदद न देता था। जहाँ-तहाँ से पृथक-पृथक जिलों में कार्य
करने वाले मासिक व्यय की माँग कर रहे थे। कई मेरे पास आए भी। मैंने
कुछ रुपया कर्ज लेकर उन लोगों को एक मास का खर्च दिया। कइयों पर कुछ
कर्ज भी हो चुका था। मैं कर्ज न निपटा सका। एक केन्द्र के कार्यकर्त्ता को
जब पर्याप्त धन न मिल सका, तो वह कार्य छोड़कर चले गए। मेरे पास क्या
प्रबंध था, जो मैं उसकी उदर-पूर्ति कर सकता ? अद्भुत समस्या थी। किसी
तरह उन लोगों को समझाया।
थोड़े दिनों में क्रांतिकारी पर्चे आए। सारे देश में निश्चित तिथि पर पर्चे बाँटे
गए। रंगून, बंबई, लाहौर, अमृतसर, कलकत्ता तथा बंगाल के मुख्य शहरों तथा
संयुक्त प्रांत के सभी मुख्य-मुख्य जिलों में पर्याप्त संख्या में पर्चों का वितरण
हुआ। भारत सरकार बड़ी सशंक हुई कि ऐसी कौन-सी और इतनी बड़ी सुसंगठित
समिति है, जो एक ही दिन में सारे भारत में पर्चे बँट गए। उसी के बाद मैंने
कार्यकारिणी की एक बैठक करके जो केन्द्र खाली हो गया था, उसके लिए एक
महाशय को नियुक्त किया। केन्द्र में कुछ परिवर्तन भी हुआ, क्योंकि सरकार के
पास संयुक्त प्रांत के संबंध में बहुत-सी सूचनाएँ पहुँच चुकी थीं। भविष्य की
कार्य-प्रणाली का निर्णय किया गया।