रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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क्या सकता था ? और अब रिवाल्वर आदि पाना कोई सरल कार्य भी न था।
बाद को बड़ी कठिनाई से इन चालबाजियों से अपना पीछा छुड़ाया।
अब सब ओर से चित्त को हटाकर बड़े मनोयोग से नौकरी में समय व्यतीत
करने लगा। कुछ रुपया इकट्ठा करने के विचार से, कुछ कमीशन आदि का
प्रबंध कर लेता था। इस प्रकार पिताजी का थोड़ा-सा भार बँटाया। सबसे छोटी
बहन का विवाह नहीं हुआ था। पिताजी की शक्ति के बाहर था कि उस बहन
का विवाह किसी भले घर में कर सकते। मैंने रुपया जमा करके बहन का विवाह
एक अच्छे जमींदार के यहाँ कर दिया। पिताजी का भार उतर गया। अब केवल
माता, पिता, दादी तथा छोटे भाई थे, जिनके भोजन का प्रबंध होना अधिक
कठिन काम नहीं था। अब माताजी की उत्कट इच्छा हुई कि मैं भी विवाह कर
लूँ। कई अच्छे-अच्छे विवाह-संबंध के सुयोग एकत्रित हुए। किंतु मेरा विचार था
कि जब तक पर्याप्त धन पास न हो, विवाह-बंधन में फँसना ठीक नहीं। मैंने
स्वतंत्र कार्य आरंभ किया, नौकरी छोड़ दी। एक मित्र ने मेरी सहायता की। मैंने
रेशमी कपड़ा बनाने का एक निजी कारखाना खोल लिया। बड़े मनोयोग तथा
परिश्रम से काम किया। परमात्मा की दया से अच्छी सफलता हुई। एक-डेढ़ साल
में ही मेरा कारखाना चमक गया। तीन-चार हजार की पूँजी से कार्य आरंभ किया
था। एक साल बाद सब खर्च निकाल कर लगभग दो हजार रुपये का लाभ
हुआ। मेरा उत्साह और भी बढ़ा। मैंने एक-दो व्यवसाय और भी आरंभ किए।
उसी समय मालूम हुआ कि संयुक्त-प्रांत के क्रांतिकारी दल का पुनर्संगठन हो रहा
है। कार्यारंभ हो गया है। मैंने भी योग देने का वचन दिया, किंतु उस समय मैं
अपने व्यवसाय में बुरी तरह फँसा हुआ था। मैंने छः मास का समय लिया कि
छः मास में मैं अपने व्यवसाय को अपने साझी को सौंप दूँगा, और अपने आपको
उसमें से निकाल लूँगा, तब स्वतंत्रतापूर्वक क्रांतिकारी कार्य में योग दे सकूँगा।
छः मास तक मैंने अपने कारखाने का सब काम साफ करके अपने साथी को
सब काम समझा दिया, उसके बाद अपने वचनानुसार कार्य में मदद देने का
प्रयास किया।