रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
ग्मकहें प्रेम में भीजे जे सब पुरवारीहिँ तिन करिकै भूषण पट दीजै कहै दीजि-
यत हैं अर्थ प्रेमसों युक्त सब भूषण पटदान करत हैं ॥ २० ॥
मू०-सोरठा ॥ रघुपतिपूरणचंद, देखिदेखिसबसुखमढैं ॥
दिनदूनेआनंद, तादिनितेतेहिपुरबढैं ॥ २१ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्र-
जिद्विरचितायांरामस्यायोध्यानगरप्रवेशोनामाष्टमः प्रकाशः ॥ ८ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्र-
सादनिर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकायामष्टम प्रकाशः ॥ ८ ॥
मू०-दोहा ॥ यहप्रकाशनवमेंकथा, रामगमनबनजानि ॥
जनकनंदिनीको सुकृत, वर्णन रूप बखानि ॥ १॥ रामचंद्र
लक्ष्मणसहित, घरराखे दशरथ ॥ बिदाकियोननसारको, सँग
शत्रुघ्नभरत्थ ॥ २ ॥ तोटकछंद ॥ दशरत्थमहामनमोदरये ।
तिनबोलिवशिष्ठहिंमंत्रलये ॥ दिनएककहोशुभशोभरयो ।
हमचाहत रामहिंराजदयो ॥ ३ ॥ यहबातभरत्थकीमातसुनी।
पठऊं बनरामहिंबुद्धिगुनी ॥ तेहिमंदिरमेंनृपसोंबिनयो । वरदे
हुहतोहमकोजोदयो ॥ ४ ॥ नृपबातकहीँसिहेरिहियो । बर
मांगिसुलोचनिमैंजोदियो ॥ कैकेयी ॥ नृपतासुविशोभिभरत्थ
लहैं । बरषैबनचौदहरामरहैं ॥ ५ ॥
टीका-॥ १ ॥ २ ॥ शोभरयो राजाको विशेषणहै ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥
मू०-पद्धटिकाछंद ॥ यहबातलगीउरवज्रतूल । हियफा-
ट्योज्योंजीरनदुकूल ॥ उठिचलेविपिनकहँसुनतराम । तजि
तातमाततियबंधुधाम ॥ ६ ॥ हरिलीलाछंद ॥ छूटेसबै
सबनिकेसुखक्षुत्पिपास । विद्वद्विनोदगुणगीतविधानवास ॥
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण दिया गया है:
नवमप्रकाशः ९. (८५)
ब्रह्मादिअंत्यजनअंतअनंतलोग । भूलेअशेषसविशेषनिराग
भोग ॥७॥ मौक्तिकदामछंद ॥ गयेतहँरामजहाँनिजमात ।
कहीयहबातकहाँवनजात। कह्योजनजोदुखपावहुमाइ । सोदु-
हुअशीषमिलौफिरिआइ ॥ ८॥ कौशल्या ॥ रहौचुपह्वैसुत
क्योंवनजाहु । नदेखिसकैतिनकेउरदाहु ॥ लगीअत्रवापतु-
म्हारेहिवाइ । करैउलटीविधिक्योंकहिजाइ ॥९॥ राम-ब्रह्मरूप
कछंद ॥ अन्नदेइसीखदेइराखिलेइप्राणजात । राजवापमोल
लैकरैजोदीहपोपिगात ॥ दासहोइपुत्रहोइशिष्यहोइकोइमाइ ।
शासना न मानई तौ कोटिजन्मनर्कजाइ ॥ १० ॥
दी०-जीर्णकहे पुगनीनजिचलै पढ़ते इहां मानसिक त्याग जानो ॥ ६ ॥
श्रुतकहे श्रुया विद्याद्विनोद कहे शास्त्रार्थ गुणशास्त्र विद्यादि गीतविधान गाइबो
वासघर अथवा वस्त्रब्रह्मादिआदि देवौ अंत्यज जे चांडालहैं तिन पर्यन्त जे अनंत
लोगहैं तिनको अशेषराग प्रेम औ भोग नविशेषण भूले अर्थ अत्यन्त भूले
यद्यपि रामवन गमन सों ब्रह्मादि देवन को रावण वधादि हित कार्य है है परंतु
अनवसर विलोकि तिनहूॅंको दुःख भयो ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥ अन्नदाता औ शिख-
दाता औ कहूं प्राण जान होइ ता भय सों रक्षक औ राजा औ बाप औ जो
मोल लैके पोषिकै गाकत बडे करै अर्थ जो मोलले पालन करूँ ई जे छल हैं तिन-
के दान औ पुत्र औ शिष्य औ कोहू कहे औरहूं कोऊ होइ अर्थ अन्नग्राहक प्राण
रक्षित औ प्रजा जे छल हैं ते आज्ञा को नमानैं तो कोटि जन्म तक नरक जाइँ या
जनायो कि एक तौ राजा हैं दूसरे पिताहैं तासों विशेषि कै आज्ञामानि हमको
वन जैबो उचित है ॥ १० ॥
सूल-कौशल्या-हरनीछंद ॥ मोहिंचलोवनसंगलिये । पुत्र
तुम्हेंहमदेखिजियें ॥ अवधपुर्रीमहँगाजपरै । कैअबराजभर-
त्थकरै ॥ ११ ॥ राम-तोमरछंद ॥ तुमक्योंचलोवनआजु ।
जिनशीशगजतराजु ॥ जियजानियेपतिदेव । करिसर्वभाँति
( ८६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
नसेव ॥ १२ ॥ पतिदेइजोअतिदुःख। मनमानिलैजैसुःख ॥
सबजक्तजानिअमित्र । पतिजानिकेवलमित्र ॥ १३ ॥ अमृ-
तगतिछंद ॥ नितपतिपंथहिचलिये । दुखसुखकोदलुदलिये
तनमनसेवहुपतिको । तबलहियेशुभगतिको ॥ १४ ॥ स्वा-
गताछंद ॥ योगयागब्रतआदिजोकीजै । न्हानगामगनदान
जो दीजै ॥ धर्म कर्मसबनिष्फलदेवा । होहिंएकफलकैपति
सेवा ॥ १५ ॥
टी०-तुम क्यों चलौ वन इत्यादि दश छंदानमें पातिब्रत धर्म सुनाइ रामचन्द्र
माता को बोध करत हैं राजकहे राजा दशरथ अथवा राजस्त्रिन करिकै केवल
पतिही को देवजानिये कहे जानो चाहिये ॥ ११ ॥ १२ ॥ १३ ॥ पतिही स्त्रिन
करिकै नित्यप्रति पथ कहे सुराहशास्त्रोक्तपतिब्रतनकी रीति इति तामें चलिये या
प्रकार सुख औ दुःख के दल कहे समूह को दलिये कहे विताइये औ तन औ
मन सों केवल पतिही को सेवहु कहे सेवन करिये तब शुभगति को पाइये कछू
सुख दुख परै तामें स्त्रीको पतिही की सेवा करिवो उचित है और उपाय करिवो
उचित नहीं है इति भावार्थः ॥ १४ ॥ देव कहे देवता अर्थ देवपूजा ॥ १५ ॥
मू०-तातमातुजनसोदरजानौं । देवरजेठसगे सो बखानौं ॥
पुत्रपुत्रसुतश्रीछबिछाई । है बिहीनभरतादुखदाई ॥ १६ ॥
कुंडलिया ॥ नारीतजैनआपनो, सपनेहूँभरतार ॥ पंगुगुं-
गुबौराबधिर, अंधअनाथअपार ॥ अंधअनाथअपारवृ-
द्धवावनअतिरोगी बालकपंडुकुरूपसदाकुवचनजडयोगी ॥
कलहीकोढीभीरुचोरज्वारी व्यभिचारी । अधमअभागीकु-
टिलकुपतिपतितजैननारी ॥ १७ ॥ पंकजवाटिकाछंद ॥
मारितजैनमरेभरतारहि । तासंगसहतिधनंजयझारहिं ॥ जी-
केहूँकरतारजिआवत । तौताकोयहबातसुनावत ॥ १८ ॥
निशिपालिकाछंद ॥ गानविनमानविनहासविनजीवहीं । तत्त
यहाँ पृष्ठ का देवनागरी में पूर्ण पाठ प्रस्तुत है:
नवमप्रकाशः ९. (८७)
नहिंखाइज लशीतलनपीवहीं। तेलतजिखेलतजिखाटतजि
सोवहीं। शीतजलन्हाइनहिंउष्णजलजोवहीं॥ १९॥
टी०-पुत्र सुत पौत्र ॥ १६ ॥ पंडु पिंडगोगी योगी विरक्त भीरु कादर कुपति
निर्लज्ज अथवा नपुंसक ॥ १७ ॥ धनंजय कहे अग्नि की झाग महनिहैं अर्थ मती
होति हैं जो काहू प्रकार कर्त्तार जिआवै अर्थ पतिके संग ना जरयो जाइ तौ तिन
खिनके लिये यह बात है सो हम तुमको सुनावत हैं सो गान विन इत्यादि द्वैछं-
दमों आगे कहत हैं ॥ १८ ॥ द्वैछंद को अन्वय एक है जल शीतल न पीवहीं
अर्थ सीरो करिके जल न पीवैं जैसो होइ तैसो पीवैं शीत जलमें न्हाइ या जनायो
कि गरम जल करि स्नान ना करे जा समय जैमे पीवैं तैमे में स्नान करै काय
मन वाचा सब धर्म करिवो करें अर्थ ये जे सब धर्म हैं तिनको मनसा वाचा कर्म्मणासे
करें अथवा और जे सब धर्मदानादि हैं तिनहुंन को करे कृच्छ्र उपवास कृच्छ्र-
चांद्रायणादिसो जबलों तनको अतीत कहे छांड़ें अर्थ मरे तबलों पुत्रकी शिष में
लीन रहै पुत्र की आज्ञामें रहै यांमें त्रिकाल दर्शी जे रामचंद्र हैं तिन अपने
वियोग सों पिताको मरण निश्चय करि पति ब्रतन को धर्म सुनाय माताको बोध
करि युक्ति सों विधवा स्त्री को उचित धर्म सिखायो ॥ १९ ॥
मू०-खायँमधुगन्ननहिंपायपनहींधरैं। कायमनवाचसबध-
र्मकरिबोकरैं॥कृच्छ्रउपबाससबइंद्रियनिकैजितहीं॥ पुत्रशिपली-
नतनजौलगिअतीतहीं॥२०॥ दोहा॥ पतिहितपितुपरतनु
तज्यो, सतीसाखिदैदेव ॥ लोकलोकपूजितभई, तुलसीपतिकी
सेव॥ २१ ॥ मनसावाचाकर्मणा, हमसोंछाँडोनेहु। राजाको
विपदापरी, तुमतिनकीसुधिलेहु ॥ २२ ॥ पद्धटिकाछंद ॥
उठिरामचन्द्रलक्ष्मणसमेत । तबगयेजनकतनयानिकेत ॥
सुनुराजपुत्रिकेएकबात । हमबनपठयैहैनृपतितात ॥ २३॥
तुमजननिसेवकहँरहहुबाम । कैजाहुआजुहीजनकधाम॥सुनि
चन्द्रबदननिगजगमनिएनि । मनरुचैसोकीजैजलजनैनि॥२४॥
( ८८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
सीताजू-नाराचछंद ॥ नहौंरहौनजाइहूजिविदेहधामकोअबैकही
जोबातमातुपैसो आजुमैं सुनीसबै॥लगेक्षुधाहिमा भलीविपत्तिमां
झनारिये । पियासत्रासनीरबीरयुद्धमेंसम्भारिये ॥ २५ ॥
टी०-॥ २० ॥ सती की औ तुलसी की कथा प्रसिद्ध है ॥ २१ ॥ २२ ॥
॥ २३ ॥ जननि कौशल्या ऐनि कहे हे सुन्दरि ॥ २४ ॥ कि स्त्रीको पतिहि कि
सेवा उचित है यह बात जो माता सों तुमकहो हैसो हम सब सुन्यो है यासों या
जनायो कि तुम्हारी सेवा छाँडि हम कैसे घर में रहें क्षुधामें माता भली लगतिहै
पोषण करिवो मुख्य धर्म माताकोहै तासों यथाकवि प्रियायां माता जिमि पोषति
पिता जिमि प्रतिपाल करें औ विपत्तिमें नारिये कहे स्त्रीही भली लागति है जो अनेक
प्रकारसों शुश्रूषा करि मन को बहरावतिहै औ पियास की त्रास समय नीर भलो
लागतहै औ युद्धमें बीर जो योद्धा है तिन को सँभारिये यहै भलो लागत है अर्थ
अनेक वीरनको संभारिवो एकत्र करिवो अथवा सावधान करिवोई भलो लागत है
यह कहि या जनायो कि यह तुम्हारो विपत्तिको समय है तासों तुम्हारे संग
हमको चलिवो विशेषि है ॥ २५ ॥
मू०-लक्ष्मण-सुप्रियाछंद ॥ वनमहँविकटविविधदुखसुनि-
ये । गिरि गहवर मग अगमके गुनिये ॥ कहुँअहि हरिकहूँनिशिच-
रचरहीं । कहुँदवदहनदुसहदुखदहहीं॥२६॥सीताजू-दंडक ॥
केशोदासनींदभूखप्यास उपहासत्रासदुखकोनिवासविषमुखहू
गह्यो परै । वायुकोवहनदिनदावाकोदहनबडीवाडवाअनलज्वा-
लजालमँरह्योपरै । जीरनजनमजातजोरजुरघोर परिपूरणप्रकट
परित्तापक्योंकह्योपरै । सहिहौंतपनतापपतिकेप्रतापरघुवीरको
विरहबीरमोंसोंनसह्योपरै ॥ २७॥
टी०-दवदहन कहेदावाग्नि-॥ २६ ॥ दुखको निवास जो विष है सो मुखमें
गह्यो परत है अर्थ विष खायो जात है जीर्ण कहै जर्जर अर्थ थोडी है मर्यादा
जाकी ऐसो जो जन्म है सो जातु कहे जाउ अर्थ कि मृत्यु होय औ घोर जो
ज्वरहै औ परिपूर्ण कहे दैहिक दैविक भौतिक तीनों प्रकार की जो
: "गाँकी" or "गौंकी"?
Wait, look at L19: "अर्थ गाँकी" or "अर्थ गौंकी" or "अर्थ गां की"?
Wait! Look at the word: "ग" with 'ा' and anusvara/chandrabindu, then 'की'? Or is it 'गौंकी'?
Wait, the original phrase was "उर गौ यह बात" in verse 28:
"जो दुख दैहैं तौ लै उर गौ यह बात सुनौ"
So the commentator explains:
"उरगौ कहै वितावो अथवा हे भाई ! जो भरत तुमको दुःख दैहैं तौ लै कहे अंगीकारकरिकै उरमें गुनौ अर्थ समय पाय ताको फलदेवेके लिये समुझि राखैगौ यह बात सुनौ अर्थ गौंकी जो यह बात है सो सुनो"
Wait, what is "गौंकी"? In verse 28, the word is "गौ" (उरगौ).
So "अर्थ गौंकी" or "अर्थ गौ की"? Wait, does it say "गौंकी"?
Let's look at the letters: 'ग' with double matra? No, it has an 'ा' and a curved stroke on top: 'ौ' with dot? Or 'ाँ'?
Wait, look at 'गौ' in L7: 'ग' + 'ौ' = गौ.
In L17: 'उरगौ' = 'ग' + 'ौ'.
In L
An exact, line-by-line transcription of the page into Devanagari Markdown:
( ९० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
सीताहैं औ कहूं सिद्धि मनो फल्योपाठ है सो अर्थ खुल्यो है ॥३०॥ उछाह जो
आनंदहै तेहिते सबपुर चल्यो कहे सब पुरवासी चले तो या जानो पुरीमें उछाहहू
रामहीं के साथ चलो गयो ॥ ३१ ॥ गेहु कहे पिंजरा ॥ ३२ ॥
मू०-चित्रपदाछंद ॥ रूपहिदेखतमोहें । ईशकहौनरकोहैं ॥
संभ्रमचित्तअरुझै । रामहियोंसबबूझै ॥ ३३ ॥ चंचरीछंद ॥
कौनहौकिततेचलेकितजातहौकेहिकामजू । कौनकीदुहिताब-
हूकहिंकौनकीयहवामजू ॥ एकगाँवउरहौकिसाजनमित्रबंधुब-
खानिये । देशकेपरदेशकेकिधौंपंथकीपहिचानिये ॥ ३४ ॥
जगमोहनदंडक ॥ किधौयहराजपुत्रीबरहींवर्योहैकिधौउपधि-
बरचोहै यहिशोभाअभिरतहै। किधौरतिरतिनाथजससाथके-
"? No.
Let's look at: "जयंत औ की दू"
Yes, it literally reads: जयंत औ की दू or जयंत औ की दू.
Let's check line 22:
कहे दूनौ कृष्णपक्ष तिनकी संधिमें स्वच्छ संध्या सधी है स्थित है जाको प्रत्यक्ष ही
Line 23:
लक्षिये कहे देखियत है औ शोभा सों मोहित है कृष्णपक्षरूप राम हैं शुक्लपक्ष
Line 24:
रूप लक्ष्मणहैं संध्यारूप सीताहैं अथवा दूनों जे पक्ष हैं तिनमें संधि कहे
Wait, "लक्ष्मणहैं" - space or no space? "लक्ष्मणहैं संध्यारूप सीताहैं" (no space between लक्ष्मण and हैं, space before संध्यारूप).
Line 25:
मध्य है तौ शुक्लादि गणना सों दुवौ पक्षनको मध्य पूर्णिमा है तौ संधिपदते
Wait, "दुवौ पक्षनको" - yes.
"संधिपदते" - yes.
Line 26:
पूर्णिमा जानौ याहूमें पूर्णिमारूप सीता हैं दुवौ पक्षरूप राम लक्ष्मण हैं औ
Line 27:
तीनों संध्या परस्परसधी हैं अर्थ कि एकत्र हैं प्रातःसंध्या रक्त है मध्याह्न
Wait, "परस्परसधी" - yes.
"मध्याह्न" - yes.
Line 28:
`संध्या शुक्ल है
(९२) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अपराह्ने तु या संध्या कृष्णांगीकृष्णवाससा'॥ कतहूं संध संध्या संधी या
पाठ है तौ दुवौ पंकनके संध कहे साथ संध्या संधी है सो जानो ॥ ३६ ॥
मू०-अनंगशेखरदंडक ॥ तडागनीरहीनतेसनीरहोतकेशो-
दासपुंडरीकझुंडभौरमंडलीनमंडहीं । तमालवल्लरीसमेतिसू-
खिसूखिकैरहेतेबागफूलिफूलिकैसमूलशूलखंडहीं ॥ चितैच-
कोरनीचकोरमोरमोरनीसमेत हंसहंसिनीसमेतशारिकास-
वैपढैं । जहींजहींविरामलेतरामजूतहींतहींअनेकभांतिकेअने-
कभोगभागसोबढैं ॥ ३७ ॥
टी०-पुंडरी कमल भाग सो कहे भाग्य सों अथवा द्विगुण चतुर्गुणादि भाग
कहे हींसा सों ॥ ३७ ॥
मू०-सुंदरीछंद ॥ घामकोरामसमीपमहाबल । शीतहिला-
गतहैअतिशीतल ॥ ज्योंघनसंयुतदामिनिकेतन । होतहैंपू-
षन केकरभूषण ॥३८॥ मारगकीरजतापिकैहैअति । केशवसी
तहि शीतललागति ॥ ज्योंपदपङ्कज ऊपरपाँयानि। दैजोचलैते-
हितैं सुखदायनि॥३९॥ दोहा ॥ प्रतिपुर औ प्रतिग्रामकी, प्रति
नगरनकीनारि ॥ सीताजूकोदेखिकै, वर्णतहैंसुखकारि ॥४०॥
जगमोहनदंडक ॥ वासों मृगअङ्क कहैं तोसोंमृगनैनीसबवह-
सुधारहतुहूँसुधावरमानिये।वहद्विजराजतेरोद्विजराजिराजैंवहक
लानिधितुहूं कलाकलितबखानिये।रत्नाकरकहैंदोऊकेशवप्रका
शकर अंबरविलासकुवलयहितमानिये । वाकेअतिशीतकर-
तुहूँसीताशीतकरचंद्रमासीचंद्रमुखीसबजगजानिये ॥ ४१ ॥
॰टी०-घामको जो महाबल कहे अति तेजहै सो रामके समीप में सीताको
अति शीतल लागतहै जैसे घन जे मेघहैं तिनते युक्त जो दामिनी बिजुली है
ताके तनुमें पूषण जे सूर्य हैं तिनके कर किरण भूषण होतहैं सूर्यकी किरणें
मेघनमें परतीहै तब इंद्रधनुष होतहै सोई दामिनीको भूषण समहै ॥३८॥
नवमप्रकाशः ९. (९३)
हेतु यह कि पृथ्वी की सीता पुत्रीहै रामचन्द्र जामातुहैं तासों पृथ्वीकी रज
तिनको सुख दियोई चहै तामें युक्ति यह कि पंकजपर पांउ धारिकै चलै तौ
शीतलई लागत है ॥ ३९ ॥ ४० ॥ या प्रकार कोऊ स्त्री सीतासों कहतिहै कि
वह जो चंद्रमा है जाको मृगअंक सब कहत हैं मृगा जो शशा है सोहै अंकमें
गोदमें मध्य इति जाके अथवा मृगको अंक कहे चिह्नहै जाके औ तोहूँको
मृगनैनी कहतहैं औ वह सुधाधरहै सुधा अमृत को धरै है औ तूहूं सुधाधर है
सुधासम हैं अधर ओष्ठजाके औ वह द्विजराज कहावत है तेरेहू द्विज जे दंतहैं
तिनकी राजिकहे पंगति राजतिहै औ वह षोडशकलनको निधिहै औ तूहूं अनेक
जे नेत्र विक्षेपादि कला हैं अथवा चौसठिकला तिनसों कलित है औ वह
रत्नाकर जो समुद्र है ताको प्रकाशकर कहे बढावन हार है पूर्णमासीके चन्द्र-
माके उदयसों समुद्र बाढत है प्रसिद्ध है औ तू भूषणनके रतननको जो आकर
समूह है ताको प्रकाश शोभा करता है अर्थ तेरी छविसां भूषणनके रत्न शोभा
पावतहैं औ चन्द्रको अंबर आकाशमें विलासहै सीताको अंबर वस्त्रमें औ चन्द्रमा
कुवलयको हित है औ सीता कुवलय कहे पृथ्वी मंडलको हितकरे अतिप्रिय
लागतिहै अर्थ सौंदर्यादिक गुण सीतामें ऐसे हैं जासों सबको प्रिय है औ
वाके चन्द्रमाके अति शीत है कर कहे किरण औ हे सीता तूहूं शीतकर है जो
तो को देखत हैं ताके लोचन शीतल हैं तौ जौन जौन जिह्मगुण चंद्रमामो
हैं ते तोहूं में हैं याते हे चंद्रमुखी! सब जग करिकै तोकों चन्द्रमा सम
जानियतहै अर्थ सब जग तोकों चन्द्रमा समजानत हैं ॥ ४१ ॥
मू०-अन्यच्छ ॥ कलितकलंककेतुकेतुअरिसितुगातभोगयोग-
कोअयोगरोगहीकोथलसों ॥ पून्योईकोपूरनपैप्रतिदिनदूनो-
दूनो क्षणक्षणक्षीणहोतछीलरकीजलसों । चंद्रसोंजोबरणत-
रामचंद्रकी दोहाईसोईमतिमंदकविकेशवकुशलसों । सुंदरसु-
वासअरुकोमलअमलअतिसीताजूकोमुखसखिकैवलकम-
लसों ॥ ४२ ॥
टी०-दूसरीस्त्री ताकोमत खंडिकै आपनोमत कहतिहै कलंक कि जो केतुकहे
पताका है अर्थ पताकासम जाको कलंक प्रसिद्ध है औ केतुको अरि शत्रु है राहु
केतु एकइके खंड हैं तासों अक्षर मैत्रीके लिये केतु कह्यो औ स्त्री आदिके जे
( ९४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
भोग हैं तिनको जो योगसंयोग रेताको अयोग असमर्थ है गुरुशापसों क्षयरोग
युक्त है क्षणक्षण क्षीण होत जो छीलरकहे दीना अथवा अंजलिकोजलहै तासम
प्रतिदिन दूनों क्षीणहोत हैं ॥ ४२ ॥
मू०-अन्यच्च ॥ एकेकहैं अमलकमलमुखसीताजूको एकक
हैंचन्द्रसमआनंदकोकंदरी । होइजोकमलतौरयनिमैनसकुचै
रीचंदजोतौबासरनहोइद्युतिमंदरी । बासरहीकमलरजनीही-
मेंचंद्रमुखबासरहूरजनिविराजैजगबंदरी। देखेमुखभावैअनदे-
खईकमलचंद तातमुखमुखैसखीकमलैनचंदरी ॥ ४३ ॥
दोहा ॥ सीतानयनचकोरसखि, रविवंशीरघुनाथ ॥ रामचंद्र
सियकमलमुख, भलोबन्योहैसाथ ॥ ४४॥ विजयछंद ॥ बहु-
बागतड़ागतरं गनितीरतमालकीछांहबिलोकिभली । घटिका-
यकबैटतहैंसुख पायबिछायतहांकुशकाशथली ॥ मगकोश्रम-
श्रीपतिदूरिकरैंसियकोशुभवाकलअंचलसों । श्रमतेऊहरैंतिन
कोकहिकेशवचंचल चारुदृगंचलसों ॥ ४५ ॥ सोरठा ॥ श्रीर-
घुबरकेइष्ट, अश्रुबलित सीतानयन ॥ सांचीकरीअदृष्ट,
झूठीउपमामीनकी ॥ ४६ ॥
टी०-तीसरी स्त्री दुवौ को मत खंडि आपनो कहति है कमलचंद्रके देखेहू
पर मुख भावत है औ कमलचन्द्रमुखके अनदेखे ही भावत है जब या मुखको
देखो तब कमलचंद्रके देखबे की इच्छा नहीं होति जब उत्तमवस्तु देखो तब
अनुत्तम वस्तु देखे अच्छीनहीं लागति है ॥ ४३ ॥ सूर्यको औ चकोर को औ
चंद्रको औ कमल को स्वाभाविक विरोध है सो इहाँ भलो कहे अद्भुत साथ
बन्यो है ॥ ४४ ॥ दृगंचल दृगकोर ॥ ४५ ॥ श्रीरघुबर के इष्ट कहे प्रिय अश्रु
आनंदाश्रु करिकैं वलित युक्त जे सीताके नयन हैं तिन मीनकी जो झूठी उपमा
अदृष्ट रही है ताको सांची करी अर्थ मीन जल में रहते हैं नयन जलमें नहीं रहत
समतामें यह भेद रह्यो है सो आनंदाश्रु जलमें बूडि कै सीता के नयन सांची
करी ॥ ४६ ॥
दशमप्रकाशः १०. (९५)
मू०-दोहा ॥ मारगयोंरघुनाथजू, दुखसुखसबहीदेत ॥
चित्रकूटपर्वतगये, सोदरसियासमेत ॥ ४७ ॥
इति श्रीमत्सकलोलोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचंद्र
चंद्रिकायामिन्द्रजिद्विरचितायांरामस्यचित्रकूटगमनं
नामनवमः प्रकाशः ॥ ९ ॥
टी०-दर्शन सों सुख देत वियोग सों दुख देत ॥ ४७ ॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानिप्रसादाय जन जानकीप्रसाद
निर्मिताया रामभक्ति प्रकाशिकाया नवमः प्रकाशः ॥ ९ ॥
मू०-दोहा ॥ यहप्रकाश दशमेंकथा, आवनभरतसुनाम ॥
राजमरणअरुतासुको, बसिबोनंदिग्राम ॥ १ ॥ दोधकछंद ॥
आनिभरत्तपुरीअवलोकी । स्थावरजंगमजीवसशोकी ॥ भाट
नहींविरदावलिसाजैं ॥ कुंजरगाजैनदुंदुभिबाजैं ॥ २ ॥ राजस-
भानविलोकियकोऊ । शोकगहेतवसोदरदोऊ ॥ मंदिरमातु-
विलोकिअकेली । ज्योंबिनवृक्षविराजतिवेली ॥ ३ ॥ तोट-
कछंद ॥ तबदीरघदेखिप्रणामकियो ॥ उठिकैउनकण्ठलगाइ
लियो ॥ नपियोजलसंभ्रमभूलिरहे । तबमातुसोंबातभरत्थ-
कहे ॥ ४ ॥
टी०-नाम कहे प्रसिद्ध ॥ १ ॥ २ ॥ राज सभामें कोऊ न देख्यो तब
शोकको गहे औ
( ९६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
हये ॥ ५ ॥ दोहा ॥ भर्त्तासुतविद्वेषिनी, सबहीकोदुखदाइ ॥
यहकहिदेखेभरततब, कौशल्याकेपाइ ॥ ६ ॥ तोटकछंद ॥
तबपायनजाइभरत्थपरे । उनभेंटिउठाइकैकैअंकभरे ॥ शिर-
मूंघिविलोकिवलाइलई । सुत तो विनयाविपरीतभई ॥ ७ ॥
भरत-तारकछंद ॥ सुनुमातभई यहबातअनैसी। जुकरीसुत-
भर्तृविनाशिनिजैसी ॥ यहबातभई अबजानतजाके । द्विज-
दोषपरैसिगरे शिरताके ॥ ८ ॥ जिनके रघुनाथबिरोधबसैजू ।
मठधारिनकेतिनपापप्रसैजू ॥ रसरामरसयोमननाहिंनजाको ।
रणमेंनितहोइपराजयताको ॥ ९ ॥ कौशल्या ॥ जनिसौं-
हकरौतुमपुत्रसयाने । अतिसाधुचरित्रतुम्हेंहम जाने ॥
सबकोसबकालसदासुखदाई । जियजानतिहौंसुतज्यों
रघुराई ॥ १० ॥ चंचरीछंद ॥ हाइहाइजहांतहांसबहैरहीसिग-
रीपुरी । धामधामनिसुन्दरीप्रगटींसबैजेहुतीदुरी ॥ लैगये
नृपनाथकासवलोगश्रीसरयूतटी । राजपत्निसमेतिपुत्रनिवि-
प्रलापगढीरटी ॥ ११ ॥
टी०-॥ ५ ॥ ६ ॥ लडूको शिरसूँघिवो बडेनकी प्रीतिरीतिहै रोगबलाइली-
बोस्त्रीनक प्रसिद्ध हैं ॥ ७॥ ८ ॥ शिवआदि देवनके मठकी जे पूजालेतहैं ते
मठधारी कहावतहैं रसकहे प्रेमअंगरादौ “विषयेष्विंद्रियद्रवेरागेगुणेरसः” इत्यमरः
रस्यो भीज्योयुक्त इति ॥ ९ ॥ १० ॥ विप्रलाप जे हैं अनर्थ वचन अथवा
कैकेयी प्रति विरोध वचन तिनकी गढी कहे समूह रढी कहत भये कि कैके-
यीही के करत ऐसो विघ्न भयो तासों याको मुखदेखिवो उचित नहीं है इत्यादि
वचन सब कहत हैं। “विप्रलापो विरोधोक्तावनर्थकवचस्यपि ” इत्यभिधान-
चिन्तामणिः ॥ ११ ॥
मू०-सोमराजीछंद ॥ करीअग्निअर्चा । मिटीप्रेतचर्चा ॥
सबैराजधानी । भईदीनवानी ॥ १२ ॥ कुमारललिताछंद ॥
क्रियाभरतकीनी । वियोगरसभीनी ॥ सजीगतिनवीनी ।
मुकुंदपदलीनी ॥ १३ ॥ तोटकछंद ॥ पहिरेवकलास्रुजटा-
धरिकै । निजपाँयनिपंथचलेअरिकै ॥ तरिगंगगये गुहसंग
लिये। चित्रकूटबिलोकतछाँडिदिये ॥ १४॥
टी०-जब भरत अग्निसों अर्चा पूजा करी अर्थ चितामे अग्नि दियो तब
प्रेतचर्चा मिटी अर्थ सब अयोध्यावासी परस्पर अनेक प्रेतवार्ता करत रहे
ताको छोड़िदीन वाणी भये अर्थ करुणा स्वर करिकै रोये मरण समयमों औ
दाहभूमिमें लैजात मों औ दाह होतमां अधिक अधिक तर वियोग मानि
रोइबेकी रीति प्रसिद्ध है अथवा अग्निकरीकंह चितामें अग्नि दियो तब ने अशु-
द्विसो अर्चाकहै देवपूजा मिटी औ प्रेतचर्चामई इतिशेषः ॥१२॥ क्रिया षोडशी-
आदि अरुत नीकी करत भये ताके बादि मुकुंद रामचन्द्रके वियोगरसमें भीनी
नवीनी गति कहे दशावल्कल वसनादि साजी औ मुकुंदपद लीनी कहे ज्ञान
बुद्धि इति सजी अर्थ पिताकी क्रिया पूर्ण करि रामचन्द्रके चरणनमें मनुलगायो
गति पद श्लेष है एक पक्ष दशा जानौ एक पक्ष बुद्धि जानौ "गतिस्त्रीमार्ग-
दशयोर्ज्ञानेयात्राम्युपाययोरितिमेदिनी" ॥ ॥ १३ ॥ अरिकै कहं हठ करिकै
गंगा उतरिकै गुहको संग कहे ज्ञातिसमूह सूधी मार्ग बताइबेके लिये गये जब
चित्रकूट देख्यो तब तिन्हें छोड़िदियो ॥ १४॥
मू०-मदनमोदकछंद ॥ सबसारसहँसभयेखगखेचरवारिद
ज्योंबहुबारनगाजे । बनकेनरवानर किन्नरबालकलैमृगजयों
मृगनायकभाजे॥ तजिसिद्धसमाधिनके सबदीरघदौरिदरीनमें
आसनसाजे । भूतलभूधरहालेअचानकआइभरत्थकेदुंदुभि-
बाजे ॥ १५ ॥ दोहा ॥ रामचन्द्रलक्ष्मणसहित, शोभितसीता
संग । केशवदाससहासउठि, चलेधराणिधरशृंग ॥ १६ ॥
लक्ष्मण-मोहनछन्द।। देखहुभरतचमूसजिआये। जानिअबल
हमकोउठिधाये ॥ हींसतहयबहुवारणगाजे । जहँतहँदीरघदुंदु-
भिबाजे ॥ १७ ॥ तारकछंद ॥ गजराजनिऊपरपाखरसोहैं ।
( ९८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अतिसुंदरशीशशिरोमणिमोहें ॥ मणिघूंघुरघंटनकेरबबाजैं ।
तडितायुतमानहुँवारिदगाजैं ॥ १८ ॥ विजयछंद ॥ युद्धको
आजुभरत्यचढेधुनिदुंदुभिकीदशहूँदिशिधाई । प्रातचलीचतु-
रंगचमूवरणीसोनकेशवकैसेहुँजाई ॥ योंसबकेतनत्राननिमें
झलकीअरुणोदयकीअरुणाई । अंतरतेजनुरंजनकोरजपूतन
कीरजऊपरआई ॥ १९ ॥
टी०-सारस हंस औ और जे खग पक्षी हैं ते खेचरकहे आकाशगामी भये
जैसे मृगनायक सिंह जॉन ग्रीवादि अंग पकरि पायो सोई अंग गहि मृगको लै
भाग्यो ताही प्रकार अतिभय सों अपने अपने बालकनको लै किन्नरादि भागे ॥
॥ १५ ॥ किन्नरादिकी या दशा देखि हास्यपूर्वक कारण देखिबेको धरणिधर
शृंगमें चढे ॥ १६ ॥ हींसत बोलत ॥ १७ ॥ पाखरझूल ॥ १८ ॥ रजनको
क्षत्र धर्म में रंजित करिबेको मानौं राजपूतनकी रज रजोगुण रजपूतीइति ऊपर
कहि आयेहैं ॥ १९ ॥
मूल-तोटकछंद ॥ उठिकैधरधूरिअकाशचली । बहुचंचल
बाजिखुरींनदली ॥ भुवहालतिजानिअकाशहिये । जनुथंभित
ठौरनिठौरकिये ॥२०॥ तारकछंद ॥ रणराजकुमारअरूझहि
गेजू । अतिसन्मुखधायनिजूझहिंगेजू ॥ जनुठौरनिठौरनिभूमि
नवीने । तिनकेचढिबेकहँमारगकीने ॥ २१ ॥ सीताजू-तोट
कछंद ॥ रहिपूरिविमाननिव्योमथली। तिनकोजनुटारनधूरि
चली ॥ परिपूरिअकाशहिधूरिरही। सुगयोमिटिशूरप्रकाशस-
ही ॥ २२ ॥ दोहा ॥ अपनेकुलकोकलहक्यों, देखहिंरविभग-
वंत । यहैजानिअंतरकियो, मानो महीअनंत ॥ २३ ॥ तोट-
कछंद ॥ बहुतामहदीहपताकलसै। जनुधूममेंअग्निकीज्वाल
बसै ॥ रसनाकिधौंकालकरालघनी । किधौंमीचुनचैचहुँओर
बनी ॥ २४ ॥ दोहा ॥ देखिभरतकीचलध्वजा, धूरिनमें सुख
दशमप्रकाशः १०. (९९)
देत । युद्धजुरनकोमनहुँप्रति, योधनबोलेलेत ॥ २५ ॥
लक्ष्मण-दंडकछंद॥ मारिडारौंअनुजसमेतयहिखेतआजु मेटि
परौं दीरघबचननिजमुरको । सीतानाथसीतासाथबैठेदेखिछत्र
तरयहिसुखशोषौंशोकसबहीकेउरको ॥ केशवदास विलासवी-
सविस्वेदासहोइकैकेयीकेअंगअंगशोकपुत्रज्वरको ॥ रघुराज
जूको साजसकलछिडाइलेउँभरतहिआजुराजदेउँयमपुरको २६
टी०-सैन्यके भयसों अथवा बालसों हालत जानिकै थंभित कहे थांबखंभा
इति ॥ २० ॥ सन्मुख घाव जूझिकै वीर स्वर्ग को जात हैं सो मानो राजकुमा-
रनके स्वर्ग जाइबेको भूमि मार्ग कहे गह कीन्हें हैं ॥ २१ ॥ विमान आकाश
गामी रथ व्योमयान 'विमानोऽस्त्रीत्यमरः' ॥ २२ ॥ मही जो पृथिवीहै तेहि अनंत
कहे अनेक अंतर किये अनेक भूरिके तुंग उठत हैं तेई अंतर व्यवधान हैं अथवा
अनंत लक्ष्मणको संबोधन है ॥ २३ ॥ रसना जिह्वा ॥ २४ ॥ २५ ॥ पुत्र
ज्वर कहे पुत्रमरण चौबीसवें प्रकाशमें कह्यो है कि जरा जब आवै ज्वराकी
सहेली तहां ज्वराशब्द मृत्युको वाची है रघुराजजूकी साज अर्थ गजरथादि राज
साजराज्य रामचन्द्रको है जाको लै ताके सब साज भरत सजे हैं तिन्हें छडाइ
रामचन्द्रमें साजिकै राज्यमें बैठारिये इत्यर्थः ॥ २६ ॥
मू०-दोहा ॥ एकराजमें प्रगटजहँ, द्वैप्रभुकेशवदास॥तहांबस-
तहैरैनदिन, मूरतिवंतबिनास॥२७॥कुसुमविचित्राछंद ॥ तबस-
बसैनाबहिथलराखी। मुनिजनलीन्हे सँग अभिलाषी ॥ रघुपति
केचरणनशिरनाये । उनहँसिकैगहिकंठ लगाये ॥२८॥ भरत
तोयकछंद॥ मातुसबैमिलिबेकहँआई । ज्योंसुतकी सुरभीसुल-
वाई ॥ लक्ष्मणस्योउठिकैरघुराई । पाँयनजायपरेदोउभाई
॥२९॥ मातनिकंठउठायलगाये । प्राणमनोमृतदेहनिपाये ॥
आइमिलीतबसीयसभागी । देवरसासुनकेपगलागी ॥ ३० ॥
टी०-पिताने भरतको राजा कियो है तासों भरतको राज्यपदभ्रष्ट होइ तौ
पिताको वचन निष्फल होइ या हेतु भरतको यमपुरको राज्यदेउँ जामें रामचन्द्र
(१००) रामचन्द्रिका-सटीक ।
सुचित्त है अयोध्यामें राज्य करें इति भावार्थः ॥ २७ ॥ अभिलाषी जे मुनिजन हैं
अथवा मुनिजन संग लीन्हें औ और रामदर्शनको अभिलाषी हैं तिन्हें लीन्हें
रामचन्द्रके हँसिबेके हेतु लक्ष्मणके बचन हैं ॥ २८ ॥ थोरे दिनकी बियानी
गाय लवाई कहावति है ॥ २९ ॥ भरतके वचन मुनिकै भरत शत्रुघ्नको सीताके
पास राखि लक्ष्मण मातनके मिलिबेको आये ताके पीछे सीता जो सभागी हैं
सोऊ देवर जे भरत शत्रुघ्न हैं तिन सहित सासुनको आइमिलीं प्राप्त भई औ सासुनके
पग लागी ॥ ३० ॥
मू०-तोमरछंद ॥ तबपूछियोरघुराइ । सुखहैंपितानमाइ ॥
तवपुत्रकोमुखजोइ । क्रमतेउठींसबरोइ ॥ ३१ ॥ दोधक
छंद ॥ आंशनसोंसबपर्वतधोये । जंगमकोजडजीवनरोये ॥
सिद्धवधूसिगरींमुनिआईं । राजबधूसबईसमुझाई ॥ ३२ ॥
मोहनछंद ॥ धरीचित्तधीर । गयेगंगतीर ॥ शुचिद्वैशरीर ।
पितृतर्पिनीर ॥ ३३ ॥ भरत-तारकछंद ॥ घरकोचलियेअब
श्रीरघुराई । जनहौं तुमराजसदासखदाई ॥ यहबातकहीजलसों
गलभौन्यौ । उठिसोदरपाँइपरेतबतीन्यों ॥ ३४ ॥ श्रीराम-
दोधकछंद। राजदियोहमकोबनहुरो। राजदियोतुमको अबपूरो॥
सो महंतुमहूंमिलिकीजै । बापकोबोलुननेकहुछीजै ॥ ३५ ॥
॥ दोहा ॥ राजाकोअरुबापको, बचननमेटैकोइ । जौनमानिये
भरत तौ, मारेकोफलहोइ ॥ ३६ ॥ भरत-स्वागताछंद ॥ मद्य
पानरतस्त्रीजितहोई। सन्निपातयुतबातुलजोई ॥ देखिदेखिति-
नकोसबभागे । तामुबातहतिपापनलागै ॥ ३७ ॥
टी०-राम बनगमन दशरथमरण भरतागमनादि कथाक्रमसों कहत सब रोवत-
भईं ॥ ३१ ॥ सिद्ध तपस्वी अथवा देवयोनिविशेष ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ भरथलक्ष्मण
शत्रुघ्न तीनों पांयन परे कि घरको चलिबो उचित है ॥ ३४ ॥ हुरोसुन्दर॥३५॥
॥ ३६ ॥ स्त्री जित कहे जो स्त्री करिकै जीतो गयो है अर्थ स्त्रीके वश्य है औ
बातुल जो बहुत बातैं कहै ॥ ३७ ॥
दशमप्रकाशः १०. (१०१)
मू०-ईशईशजगदीशबखान्यो। वेदवाक्यबलतेपहिचान्यो॥
ताहिमेटिहठिकै रहिहौंतौ । गंगतीरतनकोतजिहौंतौ ॥ ३८ ॥
दोहा ॥ मौनगहीयहबातकहि, छोंडौसबैविकलप । भरतजाइ
भागीरथी, तीरकरचोसंकल्प ॥ ३९ ॥ इन्द्रवज्राछंद ॥ भागी
रथीरूपअनूपकारी। चंद्राननीलोचनकंजधारी ॥ वाणीबखा-
निमुखतत्त्वसोध्यौ। रामानुजैआनिप्रबोधबोध्यौ ॥४०॥ उपे-
न्द्रवज्राछंद ॥ अनेकब्रह्मादिनअंतपायो । अनेकधावेदनगीत
गायो॥ तिन्हेंनरामानुजबंधुजानौ। सुनौंसुधिकेवलब्रह्ममानौ॥
॥ ४१ ॥ निजेक्षयाभूतलदेहधारी । अधर्मसंहारमधर्मचारी ॥
चलेदशग्रीवहिमारिबेको । तपीव्रतीकेवलपारिबेको ॥ ४२ ॥
उठोहठीहोहुनकाजकीजै । कहैंकछूरामसोमानिलीजै ॥ अदोष
तेरीसुतमातुसोहै । सोकैनमायाइनकौनमोहै ॥ ४३ ॥
टी०-ईश जे विष्णु हैं और ईश जे महादेव हैं और जगदीश जे ब्रह्मा हैं तिन
यह बात बखान्यो है कि स्त्रीजितादिकनके वचन मेटे सों पातक नहीं होत सो
हम वेदवाक्य बलसों पहिचान्यो है अर्थ वेदमें तीन्यो देवके ऐसे वचन हैं ते हम
सुन्यो है अथवा तीनों देवन बखान्यो है औ वेदवाक्य बल बलहूं सों पहिचान्यो
अर्थ वेदहू यहै कहत है ॥ ३८ ॥ विकलपविचार भागीरथी मंदाकिनी ॥ ३९ ॥
तत्त्व कहे सारांश सोध्यो कहे ढूँढ्यो ता सारांश युक्त मुखसों वाणी बखानी
अथवा ऐसी वाणी बखानी जामें तत्त्व जो राम कथा तत्त्व है ता करिकै अपने
मुखको सोध्यो शुद्ध करचो औ रामानुज जे भरत हैं तिनको प्रबोध कहे उत्तम
ज्ञान आनि कहे ल्याइकै बोध्यो बोध करचो पद् कहिया जनायो कि रामचन्द्रप्रति
बन्धु बुद्धिरूपी निशामें सोवतरहें तामें जगायो ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ सुत
भरतको संबोधन है यासों या जनायो कि इनकी मायामें मैं मोहिहै तुम्हारी माते
इनको वनगमन चाह्यो ॥ ४३ ॥
मू०-॥दोहा॥ यहकहिकैभागीरथी, केशवभईअदृष्ट ॥भरत
कह्योतबरामसों, देहुपादुकाइष्ट ॥४४॥ उपेन्द्रवज्राछंद ॥ चले
बलीपावनपादुकालै। प्रदक्षिणारामसियाहुकोदै॥ गयेतेनंदी
पुरबासकीनौं। सबंधुश्रीरामहिचित्तदीनों ॥ ४५ ॥ दोहा ॥
केशवभरतहिआदिदै, सकलनगरकेलोग ॥ बनसमानघरघर
बसे सकलविगतसंभोग ॥ ४६ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रि-
कायामिद्रजिद्विरचितायांभरतस्यचित्रकूटागमनं
नामदशमः प्रकाशः ॥ १० ॥
टीका-पादुकारूपी इष्ट कहे स्वामी देहु आशय यह कि राज्य पर स्वामी
चाहिये ॥ ४४ ॥ ४५ ॥ ४६ ॥
टी०-॥ ४८ ॥ इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजाकीजानकीजानिप्रसादायजनजान-
कीप्रसादनिर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायादशमः प्रकाशः ॥ १० ॥
मू०-दोहा ॥ एकादशैप्रकाशमें, पंचवटीकोवास॥शूर्पणखा-
केरूपको, रघुपतिकरिहैंनाश ॥ १॥ भरतोद्धता
एकादशप्रकाशः ११. (१०३)
राजै जनुकेशवतपबलकी। तनुवलितपलितजनुसकलवासना
निकरिगईथलथलकी॥ कांपतिशुभग्रीवासबअँगसींवादेखत
चित्तभुलाहीं। जनुअपनेमनप्रतियहउपदेशतियाजगमेंकछु
नाहीं॥६॥प्रमिताक्षराछंद॥ हरवाइजाइ सियपाँइँपरी।
ऋषिनारिसूंघिशिरगोदधरी॥ बहुअंगरागअँगअंगरये। बहु
भाँतिताहिउपदेशदये॥ ७॥ स्रग्विणीछंद॥ रामआगेचले
मध्यसीताचली। बंधुपाछेभयेसामसोमैभली॥ देखिदेहीसबै
कोटिधाकेभनो। जीवजीवैशकेबीचमायामनो॥ ८॥
टी०-मनको शोधिसांधि शुद्ध करि करि गुनकी जो उर विशेष धरयो है
अर्थ तुम्हारो ध्यान करयो है अथवा मनहींको शुद्ध करिकै जो उरमें धारण करयो
अर्थ मनकी जो चंचलता है ताहि छोड़ाइ अपनेवश्य करचो है सो हे रामचन्द्र !
ताको सब को फल जो तुम्हारे दर्शन हैं ताको पायो॥ ३॥ ४॥ जरा कहे
बुढाईरूपी जो सखी है ताके साथ देख्यो॥ ५॥ तन वलितकहे युक्त है पलितकहे
ढिलाइसों अर्थ वृद्धता सों त्वचामें सिकुरा परिगये हैं सो मानों थलथल की
अंगअंगकी वासना विषय वासना निकरिगई है ताहीते अंग अंग सिकुरि
गयेहैं सींवा मर्यादा॥ ६ ॥ हरवाइकहं हरवराइकै॥ ७॥ बनोकहे कह्यो
जीवैश ईश्वर॥ ८॥
मू०-मालतीछंद॥ विपिनविराधबलिष्ठदेखियो। नृपतन-
याभयभीतलेखियो॥ तबरघुनाथबाणकैकहयो। निजनिर्णवा
पंथकोठयो॥ ९॥ दोहा॥ रघुनायकसायकधरे, सकललोक
शिरमौर॥ गयेकृपाकरिभक्तिवश,ऋषिअगस्त्यकेठौर॥१०॥
वसंततिलकाछंद॥ श्रीरामलक्ष्मणअगस्त्यसनारिदेख्यो।
स्वाहासमेतशुभपावकरूपलेख्यो॥ साष्टांगक्षिप्रअभिवंदन
जाइ कीन्हों॥ सानंदआशिषअशेषऋषीशदीन्हों॥ ११॥
बैठारि आसनसबैअभिलाषपूजे। सीतासमेतरघुनाथसबन्धु-