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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 269 में से

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पृष्ठ 106

(१००) रामचन्द्रिका-सटीक ।
सुचित्त है अयोध्यामें राज्य करें इति भावार्थः ॥ २७ ॥ अभिलाषी जे मुनिजन हैं
अथवा मुनिजन संग लीन्हें औ और रामदर्शनको अभिलाषी हैं तिन्हें लीन्हें
रामचन्द्रके हँसिबेके हेतु लक्ष्मणके बचन हैं ॥ २८ ॥ थोरे दिनकी बियानी
गाय लवाई कहावति है ॥ २९ ॥ भरतके वचन मुनिकै भरत शत्रुघ्नको सीताके
पास राखि लक्ष्मण मातनके मिलिबेको आये ताके पीछे सीता जो सभागी हैं
सोऊ देवर जे भरत शत्रुघ्न हैं तिन सहित सासुनको आइमिलीं प्राप्त भई औ सासुनके
पग लागी ॥ ३० ॥
मू०-तोमरछंद ॥ तबपूछियोरघुराइ । सुखहैंपितानमाइ ॥
तवपुत्रकोमुखजोइ । क्रमतेउठींसबरोइ ॥ ३१ ॥ दोधक
छंद ॥ आंशनसोंसबपर्वतधोये । जंगमकोजडजीवनरोये ॥
सिद्धवधूसिगरींमुनिआईं । राजबधूसबईसमुझाई ॥ ३२ ॥
मोहनछंद ॥ धरीचित्तधीर । गयेगंगतीर ॥ शुचिद्वैशरीर ।
पितृतर्पिनीर ॥ ३३ ॥ भरत-तारकछंद ॥ घरकोचलियेअब
श्रीरघुराई । जनहौं तुमराजसदासखदाई ॥ यहबातकहीजलसों
गलभौन्यौ । उठिसोदरपाँइपरेतबतीन्यों ॥ ३४ ॥ श्रीराम-
दोधकछंद। राजदियोहमकोबनहुरो। राजदियोतुमको अबपूरो॥
सो महंतुमहूंमिलिकीजै । बापकोबोलुननेकहुछीजै ॥ ३५ ॥
॥ दोहा ॥ राजाकोअरुबापको, बचननमेटैकोइ । जौनमानिये
भरत तौ, मारेकोफलहोइ ॥ ३६ ॥ भरत-स्वागताछंद ॥ मद्य
पानरतस्त्रीजितहोई। सन्निपातयुतबातुलजोई ॥ देखिदेखिति-
नकोसबभागे । तामुबातहतिपापनलागै ॥ ३७ ॥
टी०-राम बनगमन दशरथमरण भरतागमनादि कथाक्रमसों कहत सब रोवत-
भईं ॥ ३१ ॥ सिद्ध तपस्वी अथवा देवयोनिविशेष ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ भरथलक्ष्मण
शत्रुघ्न तीनों पांयन परे कि घरको चलिबो उचित है ॥ ३४ ॥ हुरोसुन्दर॥३५॥
॥ ३६ ॥ स्त्री जित कहे जो स्त्री करिकै जीतो गयो है अर्थ स्त्रीके वश्य है औ
बातुल जो बहुत बातैं कहै ॥ ३७ ॥