रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अतिसुंदरशीशशिरोमणिमोहें ॥ मणिघूंघुरघंटनकेरबबाजैं ।
तडितायुतमानहुँवारिदगाजैं ॥ १८ ॥ विजयछंद ॥ युद्धको
आजुभरत्यचढेधुनिदुंदुभिकीदशहूँदिशिधाई । प्रातचलीचतु-
रंगचमूवरणीसोनकेशवकैसेहुँजाई ॥ योंसबकेतनत्राननिमें
झलकीअरुणोदयकीअरुणाई । अंतरतेजनुरंजनकोरजपूतन
कीरजऊपरआई ॥ १९ ॥
टी०-सारस हंस औ और जे खग पक्षी हैं ते खेचरकहे आकाशगामी भये
जैसे मृगनायक सिंह जॉन ग्रीवादि अंग पकरि पायो सोई अंग गहि मृगको लै
भाग्यो ताही प्रकार अतिभय सों अपने अपने बालकनको लै किन्नरादि भागे ॥
॥ १५ ॥ किन्नरादिकी या दशा देखि हास्यपूर्वक कारण देखिबेको धरणिधर
शृंगमें चढे ॥ १६ ॥ हींसत बोलत ॥ १७ ॥ पाखरझूल ॥ १८ ॥ रजनको
क्षत्र धर्म में रंजित करिबेको मानौं राजपूतनकी रज रजोगुण रजपूतीइति ऊपर
कहि आयेहैं ॥ १९ ॥
मूल-तोटकछंद ॥ उठिकैधरधूरिअकाशचली । बहुचंचल
बाजिखुरींनदली ॥ भुवहालतिजानिअकाशहिये । जनुथंभित
ठौरनिठौरकिये ॥२०॥ तारकछंद ॥ रणराजकुमारअरूझहि
गेजू । अतिसन्मुखधायनिजूझहिंगेजू ॥ जनुठौरनिठौरनिभूमि
नवीने । तिनकेचढिबेकहँमारगकीने ॥ २१ ॥ सीताजू-तोट
कछंद ॥ रहिपूरिविमाननिव्योमथली। तिनकोजनुटारनधूरि
चली ॥ परिपूरिअकाशहिधूरिरही। सुगयोमिटिशूरप्रकाशस-
ही ॥ २२ ॥ दोहा ॥ अपनेकुलकोकलहक्यों, देखहिंरविभग-
वंत । यहैजानिअंतरकियो, मानो महीअनंत ॥ २३ ॥ तोट-
कछंद ॥ बहुतामहदीहपताकलसै। जनुधूममेंअग्निकीज्वाल
बसै ॥ रसनाकिधौंकालकरालघनी । किधौंमीचुनचैचहुँओर
बनी ॥ २४ ॥ दोहा ॥ देखिभरतकीचलध्वजा, धूरिनमें सुख