रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवमप्रकाशः ९. (९३)
हेतु यह कि पृथ्वी की सीता पुत्रीहै रामचन्द्र जामातुहैं तासों पृथ्वीकी रज
तिनको सुख दियोई चहै तामें युक्ति यह कि पंकजपर पांउ धारिकै चलै तौ
शीतलई लागत है ॥ ३९ ॥ ४० ॥ या प्रकार कोऊ स्त्री सीतासों कहतिहै कि
वह जो चंद्रमा है जाको मृगअंक सब कहत हैं मृगा जो शशा है सोहै अंकमें
गोदमें मध्य इति जाके अथवा मृगको अंक कहे चिह्नहै जाके औ तोहूँको
मृगनैनी कहतहैं औ वह सुधाधरहै सुधा अमृत को धरै है औ तूहूं सुधाधर है
सुधासम हैं अधर ओष्ठजाके औ वह द्विजराज कहावत है तेरेहू द्विज जे दंतहैं
तिनकी राजिकहे पंगति राजतिहै औ वह षोडशकलनको निधिहै औ तूहूं अनेक
जे नेत्र विक्षेपादि कला हैं अथवा चौसठिकला तिनसों कलित है औ वह
रत्नाकर जो समुद्र है ताको प्रकाशकर कहे बढावन हार है पूर्णमासीके चन्द्र-
माके उदयसों समुद्र बाढत है प्रसिद्ध है औ तू भूषणनके रतननको जो आकर
समूह है ताको प्रकाश शोभा करता है अर्थ तेरी छविसां भूषणनके रत्न शोभा
पावतहैं औ चन्द्रको अंबर आकाशमें विलासहै सीताको अंबर वस्त्रमें औ चन्द्रमा
कुवलयको हित है औ सीता कुवलय कहे पृथ्वी मंडलको हितकरे अतिप्रिय
लागतिहै अर्थ सौंदर्यादिक गुण सीतामें ऐसे हैं जासों सबको प्रिय है औ
वाके चन्द्रमाके अति शीत है कर कहे किरण औ हे सीता तूहूं शीतकर है जो
तो को देखत हैं ताके लोचन शीतल हैं तौ जौन जौन जिह्मगुण चंद्रमामो
हैं ते तोहूं में हैं याते हे चंद्रमुखी! सब जग करिकै तोकों चन्द्रमा सम
जानियतहै अर्थ सब जग तोकों चन्द्रमा समजानत हैं ॥ ४१ ॥
मू०-अन्यच्छ ॥ कलितकलंककेतुकेतुअरिसितुगातभोगयोग-
कोअयोगरोगहीकोथलसों ॥ पून्योईकोपूरनपैप्रतिदिनदूनो-
दूनो क्षणक्षणक्षीणहोतछीलरकीजलसों । चंद्रसोंजोबरणत-
रामचंद्रकी दोहाईसोईमतिमंदकविकेशवकुशलसों । सुंदरसु-
वासअरुकोमलअमलअतिसीताजूकोमुखसखिकैवलकम-
लसों ॥ ४२ ॥
टी०-दूसरीस्त्री ताकोमत खंडिकै आपनोमत कहतिहै कलंक कि जो केतुकहे
पताका है अर्थ पताकासम जाको कलंक प्रसिद्ध है औ केतुको अरि शत्रु है राहु
केतु एकइके खंड हैं तासों अक्षर मैत्रीके लिये केतु कह्यो औ स्त्री आदिके जे