रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 100, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ें( ९४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
भोग हैं तिनको जो योगसंयोग रेताको अयोग असमर्थ है गुरुशापसों क्षयरोग
युक्त है क्षणक्षण क्षीण होत जो छीलरकहे दीना अथवा अंजलिकोजलहै तासम
प्रतिदिन दूनों क्षीणहोत हैं ॥ ४२ ॥
मू०-अन्यच्च ॥ एकेकहैं अमलकमलमुखसीताजूको एकक
हैंचन्द्रसमआनंदकोकंदरी । होइजोकमलतौरयनिमैनसकुचै
रीचंदजोतौबासरनहोइद्युतिमंदरी । बासरहीकमलरजनीही-
मेंचंद्रमुखबासरहूरजनिविराजैजगबंदरी। देखेमुखभावैअनदे-
खईकमलचंद तातमुखमुखैसखीकमलैनचंदरी ॥ ४३ ॥
दोहा ॥ सीतानयनचकोरसखि, रविवंशीरघुनाथ ॥ रामचंद्र
सियकमलमुख, भलोबन्योहैसाथ ॥ ४४॥ विजयछंद ॥ बहु-
बागतड़ागतरं गनितीरतमालकीछांहबिलोकिभली । घटिका-
यकबैटतहैंसुख पायबिछायतहांकुशकाशथली ॥ मगकोश्रम-
श्रीपतिदूरिकरैंसियकोशुभवाकलअंचलसों । श्रमतेऊहरैंतिन
कोकहिकेशवचंचल चारुदृगंचलसों ॥ ४५ ॥ सोरठा ॥ श्रीर-
घुबरकेइष्ट, अश्रुबलित सीतानयन ॥ सांचीकरीअदृष्ट,
झूठीउपमामीनकी ॥ ४६ ॥
टी०-तीसरी स्त्री दुवौ को मत खंडि आपनो कहति है कमलचंद्रके देखेहू
पर मुख भावत है औ कमलचन्द्रमुखके अनदेखे ही भावत है जब या मुखको
देखो तब कमलचंद्रके देखबे की इच्छा नहीं होति जब उत्तमवस्तु देखो तब
अनुत्तम वस्तु देखे अच्छीनहीं लागति है ॥ ४३ ॥ सूर्यको औ चकोर को औ
चंद्रको औ कमल को स्वाभाविक विरोध है सो इहाँ भलो कहे अद्भुत साथ
बन्यो है ॥ ४४ ॥ दृगंचल दृगकोर ॥ ४५ ॥ श्रीरघुबर के इष्ट कहे प्रिय अश्रु
आनंदाश्रु करिकैं वलित युक्त जे सीताके नयन हैं तिन मीनकी जो झूठी उपमा
अदृष्ट रही है ताको सांची करी अर्थ मीन जल में रहते हैं नयन जलमें नहीं रहत
समतामें यह भेद रह्यो है सो आनंदाश्रु जलमें बूडि कै सीता के नयन सांची
करी ॥ ४६ ॥