रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ९६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
हये ॥ ५ ॥ दोहा ॥ भर्त्तासुतविद्वेषिनी, सबहीकोदुखदाइ ॥
यहकहिदेखेभरततब, कौशल्याकेपाइ ॥ ६ ॥ तोटकछंद ॥
तबपायनजाइभरत्थपरे । उनभेंटिउठाइकैकैअंकभरे ॥ शिर-
मूंघिविलोकिवलाइलई । सुत तो विनयाविपरीतभई ॥ ७ ॥
भरत-तारकछंद ॥ सुनुमातभई यहबातअनैसी। जुकरीसुत-
भर्तृविनाशिनिजैसी ॥ यहबातभई अबजानतजाके । द्विज-
दोषपरैसिगरे शिरताके ॥ ८ ॥ जिनके रघुनाथबिरोधबसैजू ।
मठधारिनकेतिनपापप्रसैजू ॥ रसरामरसयोमननाहिंनजाको ।
रणमेंनितहोइपराजयताको ॥ ९ ॥ कौशल्या ॥ जनिसौं-
हकरौतुमपुत्रसयाने । अतिसाधुचरित्रतुम्हेंहम जाने ॥
सबकोसबकालसदासुखदाई । जियजानतिहौंसुतज्यों
रघुराई ॥ १० ॥ चंचरीछंद ॥ हाइहाइजहांतहांसबहैरहीसिग-
रीपुरी । धामधामनिसुन्दरीप्रगटींसबैजेहुतीदुरी ॥ लैगये
नृपनाथकासवलोगश्रीसरयूतटी । राजपत्निसमेतिपुत्रनिवि-
प्रलापगढीरटी ॥ ११ ॥
टी०-॥ ५ ॥ ६ ॥ लडूको शिरसूँघिवो बडेनकी प्रीतिरीतिहै रोगबलाइली-
बोस्त्रीनक प्रसिद्ध हैं ॥ ७॥ ८ ॥ शिवआदि देवनके मठकी जे पूजालेतहैं ते
मठधारी कहावतहैं रसकहे प्रेमअंगरादौ “विषयेष्विंद्रियद्रवेरागेगुणेरसः” इत्यमरः
रस्यो भीज्योयुक्त इति ॥ ९ ॥ १० ॥ विप्रलाप जे हैं अनर्थ वचन अथवा
कैकेयी प्रति विरोध वचन तिनकी गढी कहे समूह रढी कहत भये कि कैके-
यीही के करत ऐसो विघ्न भयो तासों याको मुखदेखिवो उचित नहीं है इत्यादि
वचन सब कहत हैं। “विप्रलापो विरोधोक्तावनर्थकवचस्यपि ” इत्यभिधान-
चिन्तामणिः ॥ ११ ॥
मू०-सोमराजीछंद ॥ करीअग्निअर्चा । मिटीप्रेतचर्चा ॥
सबैराजधानी । भईदीनवानी ॥ १२ ॥ कुमारललिताछंद ॥