रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रियाभरतकीनी । वियोगरसभीनी ॥ सजीगतिनवीनी ।
मुकुंदपदलीनी ॥ १३ ॥ तोटकछंद ॥ पहिरेवकलास्रुजटा-
धरिकै । निजपाँयनिपंथचलेअरिकै ॥ तरिगंगगये गुहसंग
लिये। चित्रकूटबिलोकतछाँडिदिये ॥ १४॥
टी०-जब भरत अग्निसों अर्चा पूजा करी अर्थ चितामे अग्नि दियो तब
प्रेतचर्चा मिटी अर्थ सब अयोध्यावासी परस्पर अनेक प्रेतवार्ता करत रहे
ताको छोड़िदीन वाणी भये अर्थ करुणा स्वर करिकै रोये मरण समयमों औ
दाहभूमिमें लैजात मों औ दाह होतमां अधिक अधिक तर वियोग मानि
रोइबेकी रीति प्रसिद्ध है अथवा अग्निकरीकंह चितामें अग्नि दियो तब ने अशु-
द्विसो अर्चाकहै देवपूजा मिटी औ प्रेतचर्चामई इतिशेषः ॥१२॥ क्रिया षोडशी-
आदि अरुत नीकी करत भये ताके बादि मुकुंद रामचन्द्रके वियोगरसमें भीनी
नवीनी गति कहे दशावल्कल वसनादि साजी औ मुकुंदपद लीनी कहे ज्ञान
बुद्धि इति सजी अर्थ पिताकी क्रिया पूर्ण करि रामचन्द्रके चरणनमें मनुलगायो
गति पद श्लेष है एक पक्ष दशा जानौ एक पक्ष बुद्धि जानौ "गतिस्त्रीमार्ग-
दशयोर्ज्ञानेयात्राम्युपाययोरितिमेदिनी" ॥ ॥ १३ ॥ अरिकै कहं हठ करिकै
गंगा उतरिकै गुहको संग कहे ज्ञातिसमूह सूधी मार्ग बताइबेके लिये गये जब
चित्रकूट देख्यो तब तिन्हें छोड़िदियो ॥ १४॥
मू०-मदनमोदकछंद ॥ सबसारसहँसभयेखगखेचरवारिद
ज्योंबहुबारनगाजे । बनकेनरवानर किन्नरबालकलैमृगजयों
मृगनायकभाजे॥ तजिसिद्धसमाधिनके सबदीरघदौरिदरीनमें
आसनसाजे । भूतलभूधरहालेअचानकआइभरत्थकेदुंदुभि-
बाजे ॥ १५ ॥ दोहा ॥ रामचन्द्रलक्ष्मणसहित, शोभितसीता
संग । केशवदाससहासउठि, चलेधराणिधरशृंग ॥ १६ ॥
लक्ष्मण-मोहनछन्द।। देखहुभरतचमूसजिआये। जानिअबल
हमकोउठिधाये ॥ हींसतहयबहुवारणगाजे । जहँतहँदीरघदुंदु-
भिबाजे ॥ १७ ॥ तारकछंद ॥ गजराजनिऊपरपाखरसोहैं ।