रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(९२) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अपराह्ने तु या संध्या कृष्णांगीकृष्णवाससा'॥ कतहूं संध संध्या संधी या
पाठ है तौ दुवौ पंकनके संध कहे साथ संध्या संधी है सो जानो ॥ ३६ ॥
मू०-अनंगशेखरदंडक ॥ तडागनीरहीनतेसनीरहोतकेशो-
दासपुंडरीकझुंडभौरमंडलीनमंडहीं । तमालवल्लरीसमेतिसू-
खिसूखिकैरहेतेबागफूलिफूलिकैसमूलशूलखंडहीं ॥ चितैच-
कोरनीचकोरमोरमोरनीसमेत हंसहंसिनीसमेतशारिकास-
वैपढैं । जहींजहींविरामलेतरामजूतहींतहींअनेकभांतिकेअने-
कभोगभागसोबढैं ॥ ३७ ॥
टी०-पुंडरी कमल भाग सो कहे भाग्य सों अथवा द्विगुण चतुर्गुणादि भाग
कहे हींसा सों ॥ ३७ ॥
मू०-सुंदरीछंद ॥ घामकोरामसमीपमहाबल । शीतहिला-
गतहैअतिशीतल ॥ ज्योंघनसंयुतदामिनिकेतन । होतहैंपू-
षन केकरभूषण ॥३८॥ मारगकीरजतापिकैहैअति । केशवसी
तहि शीतललागति ॥ ज्योंपदपङ्कज ऊपरपाँयानि। दैजोचलैते-
हितैं सुखदायनि॥३९॥ दोहा ॥ प्रतिपुर औ प्रतिग्रामकी, प्रति
नगरनकीनारि ॥ सीताजूकोदेखिकै, वर्णतहैंसुखकारि ॥४०॥
जगमोहनदंडक ॥ वासों मृगअङ्क कहैं तोसोंमृगनैनीसबवह-
सुधारहतुहूँसुधावरमानिये।वहद्विजराजतेरोद्विजराजिराजैंवहक
लानिधितुहूं कलाकलितबखानिये।रत्नाकरकहैंदोऊकेशवप्रका
शकर अंबरविलासकुवलयहितमानिये । वाकेअतिशीतकर-
तुहूँसीताशीतकरचंद्रमासीचंद्रमुखीसबजगजानिये ॥ ४१ ॥
॰टी०-घामको जो महाबल कहे अति तेजहै सो रामके समीप में सीताको
अति शीतल लागतहै जैसे घन जे मेघहैं तिनते युक्त जो दामिनी बिजुली है
ताके तनुमें पूषण जे सूर्य हैं तिनके कर किरण भूषण होतहैं सूर्यकी किरणें
मेघनमें परतीहै तब इंद्रधनुष होतहै सोई दामिनीको भूषण समहै ॥३८॥