रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
सीताजू-नाराचछंद ॥ नहौंरहौनजाइहूजिविदेहधामकोअबैकही
जोबातमातुपैसो आजुमैं सुनीसबै॥लगेक्षुधाहिमा भलीविपत्तिमां
झनारिये । पियासत्रासनीरबीरयुद्धमेंसम्भारिये ॥ २५ ॥
टी०-॥ २० ॥ सती की औ तुलसी की कथा प्रसिद्ध है ॥ २१ ॥ २२ ॥
॥ २३ ॥ जननि कौशल्या ऐनि कहे हे सुन्दरि ॥ २४ ॥ कि स्त्रीको पतिहि कि
सेवा उचित है यह बात जो माता सों तुमकहो हैसो हम सब सुन्यो है यासों या
जनायो कि तुम्हारी सेवा छाँडि हम कैसे घर में रहें क्षुधामें माता भली लगतिहै
पोषण करिवो मुख्य धर्म माताकोहै तासों यथाकवि प्रियायां माता जिमि पोषति
पिता जिमि प्रतिपाल करें औ विपत्तिमें नारिये कहे स्त्रीही भली लागति है जो अनेक
प्रकारसों शुश्रूषा करि मन को बहरावतिहै औ पियास की त्रास समय नीर भलो
लागतहै औ युद्धमें बीर जो योद्धा है तिन को सँभारिये यहै भलो लागत है अर्थ
अनेक वीरनको संभारिवो एकत्र करिवो अथवा सावधान करिवोई भलो लागत है
यह कहि या जनायो कि यह तुम्हारो विपत्तिको समय है तासों तुम्हारे संग
हमको चलिवो विशेषि है ॥ २५ ॥
मू०-लक्ष्मण-सुप्रियाछंद ॥ वनमहँविकटविविधदुखसुनि-
ये । गिरि गहवर मग अगमके गुनिये ॥ कहुँअहि हरिकहूँनिशिच-
रचरहीं । कहुँदवदहनदुसहदुखदहहीं॥२६॥सीताजू-दंडक ॥
केशोदासनींदभूखप्यास उपहासत्रासदुखकोनिवासविषमुखहू
गह्यो परै । वायुकोवहनदिनदावाकोदहनबडीवाडवाअनलज्वा-
लजालमँरह्योपरै । जीरनजनमजातजोरजुरघोर परिपूरणप्रकट
परित्तापक्योंकह्योपरै । सहिहौंतपनतापपतिकेप्रतापरघुवीरको
विरहबीरमोंसोंनसह्योपरै ॥ २७॥
टी०-दवदहन कहेदावाग्नि-॥ २६ ॥ दुखको निवास जो विष है सो मुखमें
गह्यो परत है अर्थ विष खायो जात है जीर्ण कहै जर्जर अर्थ थोडी है मर्यादा
जाकी ऐसो जो जन्म है सो जातु कहे जाउ अर्थ कि मृत्यु होय औ घोर जो
ज्वरहै औ परिपूर्ण कहे दैहिक दैविक भौतिक तीनों प्रकार की जो