रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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नवमप्रकाशः ९. (८५)
ब्रह्मादिअंत्यजनअंतअनंतलोग । भूलेअशेषसविशेषनिराग
भोग ॥७॥ मौक्तिकदामछंद ॥ गयेतहँरामजहाँनिजमात ।
कहीयहबातकहाँवनजात। कह्योजनजोदुखपावहुमाइ । सोदु-
हुअशीषमिलौफिरिआइ ॥ ८॥ कौशल्या ॥ रहौचुपह्वैसुत
क्योंवनजाहु । नदेखिसकैतिनकेउरदाहु ॥ लगीअत्रवापतु-
म्हारेहिवाइ । करैउलटीविधिक्योंकहिजाइ ॥९॥ राम-ब्रह्मरूप
कछंद ॥ अन्नदेइसीखदेइराखिलेइप्राणजात । राजवापमोल
लैकरैजोदीहपोपिगात ॥ दासहोइपुत्रहोइशिष्यहोइकोइमाइ ।
शासना न मानई तौ कोटिजन्मनर्कजाइ ॥ १० ॥
दी०-जीर्णकहे पुगनीनजिचलै पढ़ते इहां मानसिक त्याग जानो ॥ ६ ॥
श्रुतकहे श्रुया विद्याद्विनोद कहे शास्त्रार्थ गुणशास्त्र विद्यादि गीतविधान गाइबो
वासघर अथवा वस्त्रब्रह्मादिआदि देवौ अंत्यज जे चांडालहैं तिन पर्यन्त जे अनंत
लोगहैं तिनको अशेषराग प्रेम औ भोग नविशेषण भूले अर्थ अत्यन्त भूले
यद्यपि रामवन गमन सों ब्रह्मादि देवन को रावण वधादि हित कार्य है है परंतु
अनवसर विलोकि तिनहूॅंको दुःख भयो ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥ अन्नदाता औ शिख-
दाता औ कहूं प्राण जान होइ ता भय सों रक्षक औ राजा औ बाप औ जो
मोल लैके पोषिकै गाकत बडे करै अर्थ जो मोलले पालन करूँ ई जे छल हैं तिन-
के दान औ पुत्र औ शिष्य औ कोहू कहे औरहूं कोऊ होइ अर्थ अन्नग्राहक प्राण
रक्षित औ प्रजा जे छल हैं ते आज्ञा को नमानैं तो कोटि जन्म तक नरक जाइँ या
जनायो कि एक तौ राजा हैं दूसरे पिताहैं तासों विशेषि कै आज्ञामानि हमको
वन जैबो उचित है ॥ १० ॥
सूल-कौशल्या-हरनीछंद ॥ मोहिंचलोवनसंगलिये । पुत्र
तुम्हेंहमदेखिजियें ॥ अवधपुर्रीमहँगाजपरै । कैअबराजभर-
त्थकरै ॥ ११ ॥ राम-तोमरछंद ॥ तुमक्योंचलोवनआजु ।
जिनशीशगजतराजु ॥ जियजानियेपतिदेव । करिसर्वभाँति