रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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नवमप्रकाशः ९. (८७)
नहिंखाइज लशीतलनपीवहीं। तेलतजिखेलतजिखाटतजि
सोवहीं। शीतजलन्हाइनहिंउष्णजलजोवहीं॥ १९॥
टी०-पुत्र सुत पौत्र ॥ १६ ॥ पंडु पिंडगोगी योगी विरक्त भीरु कादर कुपति
निर्लज्ज अथवा नपुंसक ॥ १७ ॥ धनंजय कहे अग्नि की झाग महनिहैं अर्थ मती
होति हैं जो काहू प्रकार कर्त्तार जिआवै अर्थ पतिके संग ना जरयो जाइ तौ तिन
खिनके लिये यह बात है सो हम तुमको सुनावत हैं सो गान विन इत्यादि द्वैछं-
दमों आगे कहत हैं ॥ १८ ॥ द्वैछंद को अन्वय एक है जल शीतल न पीवहीं
अर्थ सीरो करिके जल न पीवैं जैसो होइ तैसो पीवैं शीत जलमें न्हाइ या जनायो
कि गरम जल करि स्नान ना करे जा समय जैमे पीवैं तैमे में स्नान करै काय
मन वाचा सब धर्म करिवो करें अर्थ ये जे सब धर्म हैं तिनको मनसा वाचा कर्म्मणासे
करें अथवा और जे सब धर्मदानादि हैं तिनहुंन को करे कृच्छ्र उपवास कृच्छ्र-
चांद्रायणादिसो जबलों तनको अतीत कहे छांड़ें अर्थ मरे तबलों पुत्रकी शिष में
लीन रहै पुत्र की आज्ञामें रहै यांमें त्रिकाल दर्शी जे रामचंद्र हैं तिन अपने
वियोग सों पिताको मरण निश्चय करि पति ब्रतन को धर्म सुनाय माताको बोध
करि युक्ति सों विधवा स्त्री को उचित धर्म सिखायो ॥ १९ ॥
मू०-खायँमधुगन्ननहिंपायपनहींधरैं। कायमनवाचसबध-
र्मकरिबोकरैं॥कृच्छ्रउपबाससबइंद्रियनिकैजितहीं॥ पुत्रशिपली-
नतनजौलगिअतीतहीं॥२०॥ दोहा॥ पतिहितपितुपरतनु
तज्यो, सतीसाखिदैदेव ॥ लोकलोकपूजितभई, तुलसीपतिकी
सेव॥ २१ ॥ मनसावाचाकर्मणा, हमसोंछाँडोनेहु। राजाको
विपदापरी, तुमतिनकीसुधिलेहु ॥ २२ ॥ पद्धटिकाछंद ॥
उठिरामचन्द्रलक्ष्मणसमेत । तबगयेजनकतनयानिकेत ॥
सुनुराजपुत्रिकेएकबात । हमबनपठयैहैनृपतितात ॥ २३॥
तुमजननिसेवकहँरहहुबाम । कैजाहुआजुहीजनकधाम॥सुनि
चन्द्रबदननिगजगमनिएनि । मनरुचैसोकीजैजलजनैनि॥२४॥