रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
( ५८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
यासों या जनायो कि जो प्रति पुरुष बडो है ताके कुलमें लघुहु होइ तौ बडो
है औ तुमप्रति पुरुषानहूं बड़े हौ औ तुम्हारे दुःख सुखादि जीतिबेकी सामर्थ्य
है तासों तुमसमान कोऊ नहीं है अथवा और कोई अपने कुलमें बडो लघु होत
है अर्थ कोऊ प्राणी बडो भयो कोऊ छोटो भयो औ ई कहे जनक प्रति
पुरुषान बडो सो बडोकहे बड़ेते बडे हैं अर्थ इनके कुलमें क्रमसों एक ते एक
बड़े होत आवत हैं॥ २५॥
मू०-वशिष्ठ-विजयछंद ॥ एकसुखीयहिलोकबिलोकि
यैहैंवहिलोकनिरैपगुधारी । एकइहांदुखदेखतकेशवहोतवहां
सुरलोकविहारी ॥ एकइहांऊउहांअतिदीनसोदेतदुहूं दिशि-
केजनगारी । एकहिभाँतिसदासबलोकनिहैप्रभुतामिथिले-
शतिहारी ॥ २६॥ जाबालि-विजयछंद ॥ ज्योंमणिमय
अतिज्योतिहुतीरवितेकछुऔरमहाछबिछाई । चंद्रहिबंदन
हैंसबकेशवईशतेवंदनताअतिपाई ॥ भागीरथीहुतिपै अ-
तिपावनबावनतेअतिपावनताई । त्योंनिमिवंशबडोईहतो
भइसीयासँयोगबडीयबडाई ॥ २७ ॥ विश्वामित्र--मालिनीछ-
न्द ॥ गुणगणमणिमाला । चित्तचातुर्यशाला ॥ जनकसुखद
गीता । पुत्रिकापाइसीता ॥ अखिलभुवनभर्त्ता । ब्रह्मरुद्रादि
कर्त्ता ॥ थिरचरअभिरामौ । कीयजामातुनामी ॥ २८॥
॥ दोहा ॥ पूजिराजऋषिब्रह्मऋषि, दुंदुभिदीन्हिबजाइ ।
जनककनकमन्दिरगये, गुरुसमेतसुखपाइ ॥ २९॥
टी०-॥ २६॥ ईशमहादेव ॥२७॥जनक संबोधन है गुणगणरूपी जे मणि
मुक्तादिहैं तिनकी माला है अर्थ अनेक गुणनसों युक्त है औ चित्तको जो चातु
चातुरी है ताकी शालादार है अथवा चित्तहै चातुर्य्यको शाला जाको अथ
चित्त की चातुर्य्यसे शाला कहे गुह्यो है औ सुखद है गीतागानजाको अ
जाको गानकरे सुने सबके सुख होत हैं ऐसी सीता नामा पुत्रिकाको पाइ
अथवा ये तीनों लक्ष्मीके विशेषण हैं विशेषण नहीं सो लक्ष्मी जनायो कि ऐ-
जो लक्ष्मी हैं ताको सीता नामा पुत्रिका पाइकै अखिल सम्पूर्ण भुवन कहे
चौदहों भुवनके भर्त्ता पोषक औ ब्रह्म रुद्रादि के कर्त्ता औ थिग वृक्षादि चर
मनुष्यादि सबमें अभिगमी कहे वास कर्त्ता अथवा शोभा कर्त्ता औ नामी कहे
यशी ऐसो जामातृ तुमकीय कहे करचो जैसे तीनों विशेषणन सों लक्ष्मी जनायो
तैसे चारयों विशेषणन सों विष्णु जानो तो लक्ष्मीजाकी पुत्रिका भई औ विष्णु
जामातृ भये तासों अति भाग्यवान् हौ इतिभावार्थः अथवा विश्वामित्र कहत हैं
कि जनक सुखद जे ईश्वर हैं जिन करिकै गीताकहे गाई अर्थ जाको विष्णुहू
गान करत हैं यासों लक्ष्मी जनायो और अर्थ एकहि है ऐसी जो सीता नामा
तुम्हारी पुत्रिका है ताको हमपायो औ सो जामातृ तुमकीय कहे करचो यासों या
जनायो कि दोनों तरफ बडा लाभ भयो ॥ २८॥ २९ ॥
मू०-चामरछंद ॥ आसमुद्रकेक्षितीशऔरजातिकोगने ।
राजभौमभोजकोसबैजनेगयेबने ॥ भाँतिभाँतिअन्नपान व्यं-
जनादिजेंवहीँ । देतना रिगारिपूरिभूरिभूरिभेवहीँ ॥३०॥ हरि
गीतछंद ॥ अबगारितुमकहदेहिंहमकहिकहादूलहरामजू ।
कछुबापप्रियपरदारसुनियतकरी कहतकुवामजू । कोगनैकेत
नेपुरुषकीन्हेंकहतसबसंसारजू । सुनिकुँवरचितदैवरणित्ताको
कहियसबव्योहारजू॥ ३१ ॥
टी०-औ समुद्रके कहे समुद्र पर्यंतके अर्थ पृथ्वीभरेके भूरि भूरि भेवही कहे
अनेक भेदसों ॥ ३० ॥ सात हरीगीतछंदको अन्वय एक है यामें श्लेष सों
आशीर्वादात्मक व्याजस्तुति है परदार कहे परस्त्री उत्कृष्टदार कुवाम कुत्सित
वाम औ कु कहे पृथ्वीरूपवाम व्योहार कहे संबन्ध मित्रता इति कुवाम पक्ष
रत्नाकर कहे अनेक रत्नयुक्त पृथ्वी ये छः समुद्र शीश पश्चिम करिकै औ
पांय पुरुब करिके प्रलयकाल के उपरांत जब शेषके फणिकहे फणनि की
मणिमाला मणिसमूहकी पलिका अथवा शेषजे फणिकहे सर्प हैं तिनकी
मणिमालाकी पलिकामें परति पौढ़ति है तब अनेक पुरुषन को युद्धादि कराई
ग्रहण त्यागरूप प्रबन्ध कियो करतितै गातहैं सहजैही सुगंध युक्त जाके 'गंध-
वती पृथ्वितीन्यायशास्त्रोक्तत्वात्' ॥ ज्या प्रबंधसों हिरण्याक्षादि जो पुरुषकरचो
सो क्रमही गनायो सरवस कहे सवसार कहे रसस्वादिति औ द्रव्यभ्रमि कहे
: "ह" from previous line connects to "त्यो"? "अर्जुनहत्यो"?
Wait! "अर्जुन हत्यो ऋषिजमदग्नि जू"!!
Line 17 ends with: "अर्जुनह"
Line 18 starts with: "त्योऋषिजमदग्निजू ।"
Yes! "अर्जुनहत्यो" broken across lines! "अर्जुनह" at end of L17, "त्यो" at start of L18!
Wait, is there a hyphen after "अर्जुनह"?
Look at the end of line 17: "अर्जुनह" - no hyphen visible, just "अर्जुनह".
Line 18: "त्योऋषिजमदग्निजू । परशुरामसोसकुलजारयोप्रबलवलकी"
Wait, "प्रबलवलकी" or "प्रबलबलकी"?
Look at the second: "व" has no slash, so "वलकी".
:
अग्निजू । तेहिबेरतबहींसकलक्षात्रिनमारिमारिबनाइकै । इक
Wait:
"अग्निजू । तेहिबेरतबहींसकलक्षात्रिनमारिमारिबनाइकै । इक"
Wait, "सकलक्षात्रिन": "स", "क", "ल", "क", "्", "ष", "ा", "त", "्", "र", "ि", "न" -> "क्षात्रिन"
रंचिवाससी निथम्बराजिकाभली । जहाँतहाँबिछावनेबनेघ-
नेथलीथली ॥ वितानश्वेतश्यामपीतलालनीलकारँगे । मनो
दुहूँदिशानकेसमानबिम्बसेजगे ॥ ३९ ॥
टी०-३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ रूपजो सांदर्य्य है
ताके अनुरूप सदृश अर्थ अति सुंदर ॥ ३८ ॥ जा मंडपमें विरंचि जे ब्रह्मा हैं
तिनके वासगृहकी ऐसीनिथंभ कहे थंभनकी राजिका पंक्तिरचीहै अर्थ ब्रह्माके
मंदिर महशमंडपबन्योहैं विचित्रवाससीनि पाठ होइ तौ विचित्र वाससीनि
कहे विचित्र वस्त्रन करिकै अर्थ परदान करिकै थंभराजिका रचींहैं बनींहैं अर्थ
अनेक रंग के परदा लगे हैं वितान चंदोवा श्याम कहे बैंजनी नीलिका जो
लीलहै तासों रंगे हरिण जानो मानो भू आकाश जे दूनो दिशा हैं तिनके
परस्पर ममान बिंब कहे प्रतिबिंब से जने हैं अर्थ भूमें जे बिछायने हैं तिनके
प्रतिबिंब आकाश में जगे हैं औ आकाश में वितानहैं तिनके प्रतिबिंब भूमं
जगैंहैं यासों या जानो जहाँ जारंग को वितान तन्योहैं तहां ताही रंगके बिछा-
वने हैं “बिंबन्तुप्रतिबिम्बेपीतिमेदिनी” ॥ ३९ ॥
मू०-पद्धटिकाछन्द ॥ गजमोतिनकीअवलीअपार ।
तहँकलशनपरउरमतिसुढार । शुभपूरितरतिजनुरुचिरधार ।
जहँतहँआकाशगंगाउदार ॥ ४० ॥ गजदन्तनकीअवलीसुदे-
श । तहँकुसुमराजराजतसुवेश ॥ शुभनृपकुमारिकाकर-
तिगान । जनुदेविनकेपुष्पकबिमान ॥ ४१॥ तामरसछन्द ॥
इतउतशोभितसुन्दरिडोलैं । अर्थअनेकनिबोलनिबोलैं ॥
सुखमुखमंडलचित्तनिमोहैं । मनहुँअनेककलानिधिसो-
हैं ॥ ४२ ॥ भ्रुकुटिविलासप्रकाशितदेखे । धनुषमनोज
मनोमयलेखे ॥ चरचितहासचन्द्रिकनिमानो । सुखमु-
खवासनिवासितजानो ॥ ४३ ॥
टी०--मण्डपकी रति कहे प्रीति सों पूरित मानों रुचिर धार कहे प्रवाहन
करिकै मण्डपमें जहाँ तहाँ उदार सुन्दर आकाश गंगा है अर्थ गजमोतिन की
( ६२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
माला हैं ते मानो अनेक धारा है मण्डपमें आकाशगंगा राजती हैं ॥ ४० ॥
गजदन्त जे टोडा हैं तिनकी अवली सुदेश कहे सुन्दर रौसयुक्त बनी हैं
आकाश मे वर्त्तमान विमान सदृश गजदन्त के रौसहैं देवी सरिस नृपकुमा-
रिका ह ॥ “नागदन्तोहस्तिदन्ते गेहान्निःसृतदारुणी” त्यभिधानचिन्तामणिः
॥ ४१ ॥ कलानिधि चन्द्रमा । ॥ ४२ ॥ मानो मनोजमय कहे मनोज प्रधान
मनोज जो कन्दर्प है सोई है प्रधान देवता जिनके ऐसे धनुषहैं अर्थ मानो
कामके धनुष हैं यह लेखे कहे ठहरायो है अथवा मनोमय कहे अनेक मनन
करिकै युक्त अर्थ सुन्दरतासों जिनमें अनेक मन बसे हैं ऐसे मनोजके धनुषहैं
चर्चितपूजितयुक्तितिसुखकहे स्वाभाविक ॥ ४३ ॥
मू०-दोहा ॥ अमलकपोलैआरसी, बाहूचम्पकमार ॥
अवलोकनैविलोकियें, मृगमदमयघनसार ॥ ४४ ॥ गतिको
मारमहावरे, अंगअंगकोभार ॥ केशवनख
पीत वानरनको गंग तरंगसम कह्यो तैमे ह्यौंऊ पीतपागको गंगाजल सम
कह्यो तासों श्वेतपीतकी औ हरित श्यामकी कहूं समता करतहैं यह कविनियम है
॥ ४७ ॥ सुमिल चिकण सुदेश सुन्दर सुतंत्र कहे स्वच्छंद जे विधि हैं तिन
लिख्यो है अथवा सुष्ट जो तंत्रशास्त्रहै तासों शोधिकै ढूँढिकै अथवा शुद्ध करिकै
मानो विधातैं जाके पास होइ ताके जयको शत्रुके अजयको मंत्र लिख्यो है
अथवा जायके अर्थ अजय कहे काहूके जीतिवे योग्य नहीं ऐसे जे श्रीराम
चन्द्र हैं तिनको जय कहे जीतिको मंत्रविधि लिखि दियो है जासों रामचन्द्र
सबको जीतत हैं वश्य करत हैं अथवा जया जो पार्वती हैं तिनहूंके जयको
जीतिबेको मंत्र लिख्यो है यासों या जनायो पतिव्रतमें अग्रगणनीय जे पार्वती
हैं तेऊ जिनको देखि वश्यहोयँ तो और स्त्री पुरुषकी कहाँ वातहै आशय
कि अति सुन्दर हैं “ जयाजयन्तीतिथिमित्यथोमातत्सखीषु च ” । इति-
मेदिनी ॥ ४८ ॥
मू०-दोहा ॥ यदपिभ्रुकुटिरघुनाथकी, कुटिलदेखियत
ज्योति ॥ तदपिसुरासुरनरनकी, निरखिशुद्धगतिहोति॥४९॥
श्रवणमकरकुण्डललसत, मुखसुखमाएकत्र ॥ शशिसमी-
पसोहतमनो, श्रवणमकरनक्षत्र ॥ ५० ॥ पद्धटिका
छन्द ॥ अतिवदनशोभसरसीसुरंग । तहँकमलनयननासा
तरंग ॥ जनुयुवतिचित्तविभ्रमविलास । तेइभ्रमरभवँतरस
रूपआस ॥ ५१ ॥
टी०-माना शशिके समीप कहे दोनों और निकट उदित द्वै श्रवण नक्ष-
त्रमें द्वै मकरराशि शोभित हैं नक्षत्र पदको सम्बन्ध श्रवण मोंहै अथवा श्रवणमो
मकरराशि स्वरूपके नक्षत्र कहे तारा मकरराशि स्वरूपेति शोभितहैं युक्ति
यह कि, उत्तराषाढ श्रवण धनिष्ठा तीनि नक्षत्रनमें मकरराशि को बास है सो
मानो श्रवणही में वर्त्तमान है शशिके दुवौ ओर शोभित है श्रवण नक्षत्रकी औ
कर्णकी शब्दसाम्यहै औ मकरराशिकी औ कुण्डलकी रूप साम्यहै शशि सदृश
मुखहै ॥ ४९ ॥ ५० ॥ सरसीतडाग सुरंगनिर्मलरामचन्द्रकेनेत्रशोभामें भ्रमतहैं
विलास कौतुक जिनको ऐसे जे युवतिनके चित्तहैं तेई भ्रमर भवँतहैं रस मकर-
( ६४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
न्द्ररूपी जो रूपशोभा है ताकी आशा सों अर्थ जैसे मकरन्दकी आश करि
तड़ागमें भँवर भँवतहैं तैसे रूपकी आशा करि रामचन्द्रके मुखपर स्त्रीनके चित्त
भ्रमत हैं ॥ ५१ ॥
मू०-निशिपालिका छन्द ॥ शोभिजातिदन्तरुचिशुभ्र
उरआनिये । सत्यजनुरूपअनुरूपकबखानिये ओंठरु-
चिरेखसविशेषशुभश्रीये । शोधिजनुईशशुभलक्षणसबैद-
ये ॥ ५२ ॥ दोहा ॥ ग्रीवाश्रीरघुनाथकी, लसतिकम्बुवर
वेष ॥ साधुमनोवचकायकी, मानो लिखीत्रिरेष ॥ ५३ ॥
सुन्दरीछन्द ॥ शोभनदीरघबाहुविराजत । देवसिहातअदे-
वतेलाजत ॥ बैरिनकोअहिराजबखानहुँ ॥ हैहितकारिनकी
ध्वजमानहुँ ॥ ५४ ॥ योंउरमेंभृगुलातबखानहुँ । श्रीकरको
सरसीरुहमानहुँ ॥ सोहतहैउरमेंमणियोजनु । जानकीको
अनुरागिरह्योमनु ॥ ५५ ॥ दोहा ॥ सोहतजनरतरामउर,
देखतजिनकोभाग ॥ आइगयोऊपरमनो, अन्तरकोअनु
राग ॥ ५६ ॥
टीका-शुभ्रश्वेतसत्यकहेनिश्चयजानो रूपसुन्दरताकेअनुरूपक कहे प्रतिमा
बखानियतहै अथवा जानो सत्य जो पदार्थ है ताके रूपकेअनुरूपकप्रतिमाहै
सत्यकोरूपश्वेतहै ॥ ५२ ॥ कंबुशंखमनसावाचा कर्मणा करिकै जो रामचन्द्र
साधु हैं तिन तीन्योंकी मानों विधातें तीनि रेखा लिखिदियो है निश्चयबातको
रेखा खींचि कहिबेकी रीति लोकमें प्रसिद्ध है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ रामचन्द्रके
उरमें लक्ष्मी वास कियेंहैं ताके करको मानो कमल है मणि कौस्तुभ मणि
अनुरागकी मन सदृशकह्यो तासों अरुण जानों ॥ ५५ ॥ वाही मणिकी फेरि
उत्प्रेक्षा करत हैं जन जे दासहैं तिनमें रतकहे संलग्न जो अनुराग रामचन्द्रके
उरमें शोभित हैं सो बाढिकै उर अन्तर ते मानो ऊपर आइगयो है ताको जे
देखत हैं तिनको बड़ो भागहै ॥ ५६ ॥
षष्ठप्रकाशः ६. ( ४९ )
मू०-पद्धटिकाछन्द ॥ शुभमोतिनकीडुलरीसुदेश । ज-
नुवेदनके अक्षसुवेश ॥ गजमोतिनकीमालाविशाल । मन
मानहुँसन्तनकेमराल ॥ ५७ ॥ विशेषकछन्द ॥ श्यामदु-
वौपगलाललसैद्युतियोंतलकी । मानहुँसेवतिज्योतिगिरायमु-
नाजलकी ॥ पाटजटीअतिश्वेतसोंहीरनकीअवली । देवन-
दीकनमानहुँ सेवतभाँतिभली ॥ ५८ ॥ दोहा ॥ कोवरणै
रघुनाथछबि, केशवबुद्धिउदार ॥ जाकीकिरपाशोभिजति, शो-
भासबसंसार ॥ ५९ ॥ दण्डक ॥ कोहैदमयन्तीइन्दुमतीरति
रातिदिन होहिनछबीलीछबिनजोशृंगारिये । केशवल्जा-
तजलजातवेद ओपजातरूपबापुरेविरूपसीताजोनिहारिये । म-
दननिरूपमनिरूपननिरूपभयो चन्दबहुरूपअनुरूपकैविचा-
रिये । सीताजूकेरूपपरदेवताकुरूपकोहैं रूपहीकेरूपकनौ
वारिवारिडारिये ॥ ६० ॥
टीका-मरालहंस ॥ ५७ ॥ या प्रकार मानो त्रिवर्णीरामचन्द्रके चरण सेवत
हैं पाठ पदश्लेष है रेशम औ दुर्वा कूलको अंतर ॥ ५८ ॥ बुद्धिउदार पाठ होइ
तौ बुद्धिहै तुसार हेवार समझगभंगुरजाकी ॥ ५९ ॥ दमयन्ती नलकी स्त्री
इन्दुमती अज की स्त्री रति काम की स्त्री इनको राति दिन शृंगारिये तौ सीता-
की छवि समान इनकी छवि ना होइ जातवेद अग्नि जातरूप सुवर्ण निरुपम
कहे जाके उपमा कोऊ नहीं अर्थ अति सुन्दर जो मदन है सो सीता जू के रूप
समताके निरूपण में निर्णयमें लाजसों निरूप कहे निःस्वरूप निर्देहेति भयो औ
घटि बढिकै अनेक रूपको धर्त्ता जो चन्द्रहै ताको अनुरूपकै कहे असदृशै विचा-
रियत है रूप जो सौंदर्य है ताहीके रूपक कहे साम्यको वारिवारि डारि-
यत है ॥ ६० ॥
मू०-गीतिका छन्द ॥ श्रीशोभिजैसखिसुन्दरीजनुदामि-
नीवपुमंडिकै । घनश्यामकोजनुसेवहीँ जडमेघओघनछांडि-
५
( ६६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
कै ॥ यकअंगचर्चितचारुनन्दनचन्द्रिकातजिचन्दको । जनु
राहुकेभयसेवही रघुनाथ आँनदकंदको ॥ ६१ ॥ मुखएक
हैनतलोकलोचन लोललोचनकीहरे । जनुजानकीसँगशोभि
जै शुभलाज देहनकोधरे ॥ तहँएकफूलनकेविभूषण एक मो-
तिनकेकिये । जनुक्षीरसागरदेवतातन क्षीरछीटनिकोछिये
॥ ६२ ॥ सोरठा ॥ पहिरेवसनसुरंग, पावकयुतस्वाहामनो ॥
सहजसुगन्धितअंग, मानोदेवीमलयकी ॥ ६३ ॥ चामर
छंद ॥ मत्तदन्तिराजराजिबाजिराजराजिकै । हेमहीरमुक्त
चीर चारुसाजसाजिकै ॥ वेषवेषबाहिनी अशेषवस्तुसोधि
यो । दाइजौविदेहराज भाँतिभाँतिकोदियो ॥ ६४ ॥ वस्त्र
भौनस्योवितान आसनेबिछावने । अस्त्रशस्त्रअंग त्रान भा-
जनादिकोगने ॥ दासिदासबासिबासरौमपाटकेकियो । दाइ
जौ विदेहराज भाँतिभाँतिकोदियो ॥ ६५ ॥
टी०-वपुमंडिक यह चंद्रिकाहू में जानौ ॥ ६१ ॥ एकन के मुख नत कहे
लाजसों नीचेको नये हैं वे लोल लोचन करिकै लोक लोचनन को हरति हैं
॥ ६२ ॥ स्वाहा अग्नि की स्त्री पावक सम वस्त्र है स्वाहा सम स्त्री है ॥ ६३ ॥
मत्त जे दंतिराज गजराजहैं तिनकी राजि कहे समूह औ वाजिराज घोडेनकी राजि-
का कहे समूह और जे देवे के उचित वस्तु हैं तिन्हें शोधियो कहे दीवे के लिये
ढूँढ़ि ढूँढ़ि मँगइयो ॥ ६४ ॥ वितान कहे चंदोवा सामियानेति आसन भूषा-
सन गद्दीति बिछावने फरसस्यो कहे सहित वस्त्र भौन कहे पाल डेरा इति दियो
अंगत्राण बख्तर भाजन सुवर्णादिके पात्रवासि सुगंधसों युक्तकरिकै रोमवसी
उत्तम कंबलादि पाठ वास पीतांबरादि दियो ॥ ६५ ॥
मू०-दोहा ॥ जनकराजपहिराइयो, राजादशरथसाथ ॥
छत्रचमरगजबाजिदै, आसमुद्रक्षितिनाथ ॥ ६६ ॥ निशि
सप्तमप्रकाशः ७. ( ६७ )
पालिकाछन्द ॥ दानदियराजदशरथसुखपाइकैकै । शोधिवि-
प्रब्रह्मऋषिराजनिबोलाइकैकै ॥ तोषियाचकसल दादुरमयूं-
रसे । मेघजिमिबर्षिगजब्राजियमयूरसे ॥ ६७ ॥
इतिश्रीमत्सकलोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकाया-
मिन्द्रजिद्विरचितायां सीताराम विवाहवर्णनंनामषष्ठः प्रकाशः ॥ ६ ॥
टी०-राजा दशरथ के साथ जे आसमुद्र के क्षितिनाथ रहे तिन्हें राजा दश-
रथके साथ जनकगज बरतौनीपहिरायो विदा समयकी पहिराविनि बरतौनी
नामकरि पश्चिममों प्रसिद्धहै ॥ ६६ ॥ बरतौनीकी पहिरावतिके बादि जनकपुर-
वासिनको राजा दशरथ यथोचितदानदियो ऋषिराजनपदवी ब्रह्म ऋषिराज
ब्राह्मणराज पदको अनुषंगऋषिरूपमेंहै ॥ ६७ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजननीजानकीप्रसादायजनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां सीतारामविवाहवर्णननामषष्ठः प्रकाशः ॥ ६ ॥
मू०-दोहा ॥ याप्रकाशसप्तमकथा, परशुरामसंवाद ॥
रघुवरमोंअरुरोषत्यहि, भंजनमानविषाद ॥ १ ॥ विश्वामि-
त्रबिदाभये, जनकाफिरेपहुँचाइ ॥ मिलेआगिली फौजको,
परशुराम अकुलाइ ॥ २ ॥ चंचरीछन्द ॥ मत्तदन्तिअमत्त
होगये देखि देखिनगजहीं । ठौर ठौरसुदेशकेशव दुन्दुभी
नहिंबज्जहीं । डारिडारिहथ्यारशूरजजीव लै लै भज्जहीं ॥ का-
टिकैतनत्राणएकैनारिषेतलज्जहीं ॥ ३ ॥ दोहा ॥ वामदेव
ऋषिसोंकह्यो, परशुरामरणधीर । महादेवकोधनुषयह, को
तोरेउबलवीर ॥ ४ ॥ वामदेव ॥ महादेवकोधनुषयह, पर-
शुरामऋषिराज । तोरेउरायकहतहीं, समुझेउरावणराज ॥
॥ ५ ॥ परशुराम ॥ अतिकोमल नृपसुतनकी, ग्रीवादलीअ-
पार ॥ अबकठोरदशकंठके, काटहुँकंठकुठार ॥ ६ ॥ परशु
अतिदीन, मोहितऊखलमारने ॥
Wait, is there a space in "यद्यपिहै अतिदीन"?
"यद्यपिहैअतिदीन," - look at line 19:
"मू०-सोरठा ॥ यद्यपिहैअतिदीन, मोहितऊखलमारने ॥"
Line 20:
"गुरुअपराधहिलीन, केशवक्योंकरिछाड़िये ॥ ८ ॥ चन्द्र"
Line 21:
"कलाछन्द ॥ वरवाणशिखीनअशेषसमुद्रहि सोखिसखासु-"
Let's check line 1-5 (the Ram-Vijay Chhand):
राम-विजयछन्द ॥ बाँधिकैबाँध्योजोबालिबली पलनापरलै
Wait, is it "बाँधिकैबाँध्यो" or "बाँधिकै बाँध्यो"?
In line 1: "राम-विजयछन्द ॥ बाँधिकैबाँध्योजोबालिबली पलनापरलै"
सुतकोहितठाढ़े । हैयहराजलियोगहिकेशवआयोहोधुद्रजो
छिद्रनिडाढ़े । बाहेरकाढ़िदियोबलिदासिन जाइपरेउजोप-
तालकेबाढ़े । तोकोकुठारबडाईकहा कहितादशकंठकेकंठ
नकाढ़े ॥ ७ ॥
Let's
रामचंद्रप्रकाशः ७. (६९)
कहिकौनरामनजानियो ॥ वामदेव ॥ शरताड़काजिनमारि-
यो ॥ १० ॥ परशुराम-विनयछन्द ॥ ताड़कासंहारी तिय
नविचारीकौनबड़ाईताहिहने ॥ वामदेव ॥ मारीचहुतेसंगप्र-
बलसकलखलअरुसुबाहुकाहूनगने ॥ करिक्रतुरखवारीगुरु
सुखकारी गौतमकीतियशुद्धकरी । जिनरघुकुलमंज्योहरध-
नुर्भंज्योसीयस्वयम्बरमांझबरी ॥ ११ ॥
टी०-जो ऐसो दीनहै ताकोमारिवो अनुचित है ता लिये कहतहूँ ॥ ८ ॥
शिरखीन कहे अग्नि मो सखा कुथागको सम्बोधन है सुखही कहे महजरी ॥ ९ ॥
॥ १० ॥ गुरुजे विश्वामित्र हैं तिनको सुखकारी क्रतु जो यज्ञहै ताको रखवारी
करिकै ॥ ११ ॥
मू०-दोहा ॥ हरहूहोतोदंडद्वै, धनुषचढ़ावतकष्ट ॥
देख्योमहिमाकालकी, कियोसोनरशिशुनष्ट॥ १२॥ विजय ॥
बोरौंसबैरघुवंशकुठारकी धारमेंवारनबाजिसरत्थहि । बा-
णकीवायुउडाइकैलक्षन लक्षिकरौअरिहासमग्रत्थहि । रामहिं
वामसमेतपठैबन कोपकेभारमेंभूंजोंभरत्थहि । जोधनुहाथ
धरैरघुनाथतौआजुअनाथकरौंदशग्रत्थहि ॥ १३ ॥
टी०-सरस्वती उक्त्यर्थ- स कहे सहित दै कहे निश्चय अर्थ निश्चयकरि
रघुवंशके जे कुठारशत्रुहैं तिन्हें वारन वाजिरथ सहितकीकहे समुद्रादि जलाश-
यकी धारप्रवाहमें बोरों 'कंजलमस्मिन्नस्तीति' की अर्थ जामें जल रहै सो की
कहावै वंशपद श्लेष है वांसहू को नामहै ताकुठारपदकह्यो वारनवाजि सरथ कहि
या जनायो कि जामें उनको चिह्नहू न रहै औ लक्ष्मण कहे लाखन जे रघुवंश-
के शत्रुहैं तिन्हें बाण की वायुमां उडाइकैकै हा कहे हाइहाइ जो शब्द हैं ताहीमें
समग्रत्यक्ष कहे निशाना करों अर्थ ऐसी वाणवृष्टि करों जामें केवल हाइहाइ-
करै औ पराक्रम करिवे लायक ना रहै औ जयगमहि कहे केवल रामचन्द्रहीसों
वामकहे कुटिलता समेति हैं अर्थ जे गमहीके शत्रु हैं तिन्हें वनको पठै देउँ
औ जे नरत्थहि वाम समेति हैं अर्थ भरन के शत्रु हैं तिन्हें शोकके आगमें
भूँजों औ जो धनुष को रघुनाथ हाथमें लियो कहे उठायो तौ आजु दशग्रथ को
( ७० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अनाथ कहे जाकोनाथ कोऊ नहीं अर्थ सबको नाथकरों कहे करिमानो तौ
सबके नाथ जे विष्णु हैं तिनहीं के शंभु धनुषतोरिबे की सामर्थ्यहै ताते तेई
विष्णु रामरूपह्वै दशरथके पुत्र भये यह निश्चय करि दशरथको सर्वोपरि मानो
इतिभावार्थः ॥ १२ ॥ १३ ॥
मू०-सोरंठा ॥ रामदेखिरघुनाथ, रथतेउतरेवेगिहै ॥ गहे-
भरंतकोहात, आवतरामविलोकीयो ॥ १४ ॥ परशुराम-
दंडक ॥ अमलसजलघनश्यामवपुकेशवदास चंद्रहूतैचारु
मुखसुखमाकोधामहै ॥ कोमलकमलदलदीर्घविलोचननि
सोदरसमानरूपन्यारोन्यारोनामहै। बालकविलोकियतपूरण
पुरुषगुण मेरोमतमोहियतऐसोएकयाम है ॥ बैरमानिवामदेव-
कोधनुषतोरिबोइन जानतहौंबीसविशेरामवेषकामहै ॥ १५ ॥
भरत-गीतिकाछन्द ॥ कुशमुद्रिकासमिधैंस्रुवाकुशऔकमं-
डलकोलिये। करमूलशरघनतर्कसी भृगुलातसीदरशैहिये ॥
धनुबाणतिक्षक कुठारकेशव मेखलामृगचर्मसों । रघुवीरको
यहदेखियेरसवीरसात्त्विकधर्मसों ॥ १६ ॥ राम-नाराचछ-
न्द ॥ प्रचंडहैहयाधिराजदंडमानजानिये । अखंडकीर्त्तिले
यभूमि देयमानमानिये ॥ अदेवदेवजेअभीतरक्षमानलेखिये ।
अमेयतेजभर्गभक्त भार्गवेशदेखिये ॥ १७ ॥
टी०-राम परशुराम ॥ १४ ॥ पूरण पुरुष विष्णु याम पहर वामदेव महादेव
॥ १५ ॥ कुश मुद्रिका कहे पैंतीसमिधैं होम की लकड़ी करमूल कहे कांधा में हैं
शरघन घने बान सों पूरित तरकस जाके मेखला कटिभूषण धनुर्बाण धार-
णादि वीररसको धर्म है औ कुश मुद्रिका धारणादि सात्त्विक प्राणीको धर्म
है ॥ १६ ॥ प्रचंड जे हैहयादि सहस्रार्जुनादि राजा हैं तिनके दंडकर्त्ता हैं अर्थ
सहस्रार्जुनादिकनको नाश इनहिंन कियो है औ अखण्ड कहे पूर्ण कीर्त्तिके
लेयमान लेवैयाहैं औ अखंड भूमिके देयमान कहे देवैया हैं अखण्ड पदको
संबंध भूमिहूमेंहै अदेव दैत्य औ देवनके जेयमान जीतनहार हैं मानपदको
संबंध लेय जेयहू में है औ भीत जे भय युक्तहैं तिनके रक्षमान रक्षक हैं अमेय
सप्तमप्रकाशः ७. ( ७१ )
कहै अपरमान बडा इति है तेज जिनको औ भर्ग महादेवके भक्तहैं औ भार्गव जे
भृगुवंशीहैं तिनके ईशहैं अर्थ भृगुवंशमें ये बडे ऐश्वर्य युक्त हैं ॥ १७ ॥
मू०-तोमरछन्द ॥ सहभरतलक्ष्मणराम ॥ चहुँकियेआ-
निप्रणाम ॥ भृगुनन्दआशिषदीन । रणहोहुअजयप्रवीन ॥
॥ १८ ॥ परशुराम ॥ सुनिरामचन्द्रकुमार । मनवचनकी
र्तिउदार ॥ राम ॥ भृगुवंशकेअवतंश । मनवृत्तिहैक्यहिअं-
श ॥ १९ ॥ परशुराम ॥ मदिराछन्द ॥ तोरिशरासनशं-
करको शुभसीयस्वयंबरमांझवरी ॥ तातेबढ्योअभिमानम-
हामन मेरीयोनैकनशंककरी ॥ राम ॥ सोअपराधपगेहम-
सों अवक्यौंसुधरैतुमहूंधौंकहो ॥ बाहुदैदोउकुठारहिकेशव
आपनेधामकोपंथगहो ॥ २० ॥
टी०-अजय
( ७२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
नगेषक़ालगतिजानिनजाई । होनहारह्वैरहैमिटैमैटिनमिटाई ॥
होनहारह्वैरहैमोहमदस्रबकोछूटै ॥ होइतिनूकावज्रवज्रतिनु
काह्वैतूटै ॥ २१ ॥ परशुराम-विजयछन्द ॥ केवशहैहय
राजकोमासहलाहलकौरनखाइलियोरे । तालगिमेदमही
पनको घृत घोरिदियोनसिरानोहियोरे । खीरषडाननकोमद
केशवसोपलमेंकरिपानलियोरे । तौलौंनींसुखजौलहुंतूरघृ-
वंशकोशोनसुधानपियोरे ॥ २२ ॥
टी०-हैहयराजको मासरूपी जो हलाहल विष है मेद चरबी खीर दूध
षडाननस्वामिकार्तिक यायुक्तिसों आपनो सकलबल कृत सुनाय भयदेखायो
मरुत्त्वती उक्तार्थः ॥ हे कुठार ! यद्यपि तू ऐसे कृत करचो है परंतु जबलग
[---]वंश जे रामचंद्रहैं तिनको सो कहे तिनको ऐसो न कहे स्तुत्य मधुर इति सुधा-
[---]म वचन नहींपियो तौलौं तोको सुख नहीं है इहां सुधा जो उपमानहै ताके
द्वारासों मधुर वचन उपमेयको ग्रहण कियो तू सकल क्षत्रिनको क्षयकरचौ है
औ ये आत बलवान क्षत्रवंशमें उत्पन्न भये सो वैर समुझि तेरो नाशकारबेको
समर्थ हैं ताते ये जबलौं मधुर वचनसों तेरो दोषक्षमानहींकरत तौलौं तोकों
सुखनहीं है इतिभावार्थः । ‘तः पुमान्सुगते वंध्येद्धिरण्डप्रस्तुते पिचेतिमे-
दिनौ’ ॥ २१ ॥ २२ ॥
मू०-भरत-तंत्रीछन्द ॥ बोलतकैसेभृगुपतिसुनियेसोकहि-
येतनमनबनिआवौ ॥ आदिबड़ैहौबडपनराखौ जातेतुमसब
जगयशपावौ ॥ चन्दनहूंमेंअतितनघरियेआगिउठैयहगुण
सबलीजै । हैहयमोरेन्पतिसंहारेसोयशकैनियुगयुगजीजै
॥ २३ ॥ परशुराम-नाराचछंद ॥ भलीकहीभरत्थतैंउठाय
आगिअंगतैं । चढाउचोपिचापआपबाणलेनिषंगतैं ॥ प्रभा-
उआपनोदेखाउछोडिबालभाइकै । रिझाउराजपुत्रमोहिंराम
लैछुडाइकै ॥ २४ ॥ सोरठा ॥ लियोचापजबहाथ, तीनिहुभै
यनरोषकरि वरज्योश्रीरघुनाथ,तुमबालकजानतकहा ॥२५॥
रा०-दोहा ॥ भगवन्तनसों जीतिये, कबहुँनकीनेशक्ति ॥
जीतीएकैबातमें, केवलकीनेभक्ति ॥ २६ ॥ हरिगीतछंद ॥
जबहयौहैहयगजइनविनक्षत्रक्षितिमण्डलकरचो । गिरिवेध
षण्मुखजीतितारक नंदकोजबज्योंहरचो ॥ सुतमैनजायोराम
सों यह कह्योपर्वतनंदिनी । वहरेणुकातिशयधन्यधरणीमेंभ-
ईजगवंदिनी ॥ २७ ॥
टी०-सो बात कहौ जो तनमनमों वनिआवै अर्थ अग्न वनि परै यासों या
जनायो कि जो कहत हौं सो तुमका मनहूं सों करिखे को दुर्लभ है ॥ २३ ॥
भरत कह्यो है कि घसत घसत चंदनहूंमें आगि उठति हैं तासों परशुरामकह्यो
कि अंगमों आगि उठावो सरस्वतीउक्तार्थः॥ कि हमारेसंगपरशुराम सों रामचन्द्र
लरि हैं यह जो रामचन्द्र प्रति तुम्हारे लै कहे चोप है ताको छिडाइ कहे त्या-
कै तुम हमका अपनी कृत दिखाय कै रिझाउ कहे प्रसन्न करो अथ रामचन्द्रको
भरोसो छोडि हमसों तुम लरौ तौ हम लरैं रामचन्द्र सों लरीबे लायक हम नहीं
हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ क्रौंचनामाजोगिरि है ताके वेधन हार जे षण्मुख
कहे स्वामिकार्तिक हैं तिनकी जीति कै तारकासुर को जो नंदनपुत्रहै ताको ज्यों
हत्यो मारचो ऐसे ऐसे इनके कृत्य देखि कै पार्वती कह्यो कि ऐसो पुत्र हमारे न
भयो तब रेणुका परशुरामकी माता जगवंदिनी भई औ धन्य भई ऐसो परा-
क्रम परशुराम देखिकै रेणुकाको सब जगवंदना करिकै कह्यो धन्य है रेणुका
जाके ऐसो पुत्र भयो या प्रकार रामचन्द्र परशुरामकी स्तुति कियो ॥ २७॥
मू०-परशुराम-तोमरछन्द ॥ सुनुरामशीलसमुद्र । तवबंधु
हैंअतिक्षुद्र ॥ ममवाडवानलकोप । अगुकियोचाहतलोप-
॥ २८ ॥ शत्रुघ्न-दोधक ॥ हौभृगुनंदबली जगमाहीं। राम
बिदाकरियेघरजाहीं, हौं तुमसोंफिरियुद्धहिमाडौं ॥ क्षत्रिय
वंशकोवैर लैछांडौं ॥ २९॥ तोटकछंद ॥ यहबातसुनीभृ-
गनाथजबै । कहिरामहिंलेघरजाहुअबै ॥ इनपैजगजीवतजो
बचिहै। रणहौं तुमसों फिरिकैरचिहौ ॥ ३० ॥ दोहा ॥ नि
( ७४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
जअपराधीक्योंहतौं, गुरुअपराधीछांडि । तातेकठिनकुठार
अब, रामहिंसोरणमांडि ॥ ३१ ॥
टीका०-वडवानलरूपिजो हमारे कोप हैं सो इनको लोप भस्म कियो
चाहत है ॥ २८ ॥ २९ शत्रुघ्नजीकी यह बात सुनि भरतसों कह्यो कि तुम रामच-
न्द्रको लैके घर जाहु इनपै शत्रुघ्नै युद्ध करि जो जीवित बचि है तब तुमसों रण
करि हौं ॥३०॥ गुरु अपराधी रामचन्द्र निज अपराधी शत्रुघ्न सरस्वती उक्तार्थः-
निज ते अपनाते हमते इति है अपरा कहे अन्य अधिक इति है बुद्धि जिनकी
इहां बुद्धिउपलक्षणमात्र है बुद्धि पढ़ते बुद्धिवल विद्यादि जानों ऐसे जे रामचन्द्र हैं
तिनको कैसे मारौं अर्थ इनके मारिवे को समर्थ नहीं हौं फेरि कैसे हैं गुरु जे
शिव हैं तिनहुँनते अपराधी कहे बल विद्यादि करि अधिक हैं जिनको शिवहू ध्यान
करत हैं ताते मारिवे की आशा करि छांडिकै हे कठिन कुठार रामचन्द्र हीको सो
रनकहे स्तुतिसों रनसों मांडि कहे युक्तकरौ अर्थरामचन्द्रकी स्तुति करो जो कहौ
कुठार तौ बोलत नहीं कैसे स्तुति करि है तो सबमें अभिमानी देवतारहत है
ता करिकै स्तुति करिवे को समर्थ है जैसे समुद्रको अभिमानी देवता रामचंद्रकी
स्तुति करयो हैं औ लंका हनूमानको रोक्यो है ॥ ३१ ॥
मू०-परशुराम-विजयछंद ॥ भूतलकेसबभूपनकोमद
भोजनतौबहुभांतिकियोई। मोदसोंतारकनंदकोमेदपछ्या-
वरिपानसिरायोहियोई। खीरषडाननकोमदकेशवसोपलमें
करि पान लियोई ॥ रामतिहारेइकंठकोश्रोणितपानको
चाहैकठार कियोई ॥ ३२ ॥ लक्ष्मण-तोटक ॥ जिनका
अनुग्रहवृद्धिकरै । तिनकोकिमिनिग्रहचित्तपरै ॥ जिनको
जगअच्छतशीशधरै । तिनकोतनसक्षतकौनकरै ॥ ३३ ॥
राम-मदिराछन्द ॥ कंठकुठारयशौअबहार किफूलअशो-
कसशोकसमूरो ॥ कैचित्रसारिचढैकिचितातनचन्दनचित्र
किपावकपूरो ॥ लोकअलोकबडोअपलोकसुकेशवदासजो
होउसोहोउ । विप्रनके कुलकोभृगुनन्दनसूरजकेकुल
शूरनकोउ ॥ ३४ ॥
टी०-पछघावरि शिखरनि को भेद हैं खीर दूध सरस्वती उक्तार्थः हे राम !
तिहारे कंठ को कहे शब्द को अर्थ मधुर वचन पानि कै सो कुठार नितहीं
पियो पान कर्यो चाहतहै अर्थ सुन्यो चाहत है ॥ "कंठोगलेसंनिधौनेध्वनौ
मदनपादपं' इति मेदिनी ॥ ३२ ॥ जिन ब्राह्मणनको अनुग्रह कृपा सब को
वृद्धि करत है तिनको निग्रह दंड हमारे चित्तमें कैसे परै कहे आवै औ जिनके
शीशमें जग अक्षत धरत है अर्थ पूजन करत है तिनको तन साक्षात कहे खंडिन
को करै या जनायो ब्राह्मण अवध्य है तासों तुम को नहीं मारते ॥ ३३ ॥
चहै अशोक सुख चहै शोक दुख फूलो होइ लोक यश अपलोक अयश ॥ ३४॥
मू०-परशुराम-विशेषकछन्द ॥ हाथधरेहथियारसबैतुम
शोभतहौ । मारनहारहिदेखिकहामनक्षोभतहौ ॥ क्षत्रियके
कुलह्वैकिकिमिवैननदीनरचौ । कोटिकरोउपचारनकैसेहुमी-
चबचौ ॥ ३५ ॥ लक्ष्मण ॥ क्षत्रियह्वैगुरुलोगनके
प्रतिपालकरैं । भूलिहुतौतिनकेगुणऔगुणजीनधरैं । तौहम-
कोगुरुदोषनहीं अबएककती । जोअपनीजननी तुमहींसुख
पाइहती ॥ ३६ ॥
टी०- लक्ष्मण औ रामचंद्र के नम्र वचन सुनिकै भय युक्त जानि परशुराम
कह्यो कि, मारन हार जो मैं हूं ताको देखि कै कहा क्षोभत डरात हौ सरस्वती
उक्तार्थः सबै कहे चारों भाई तुम हाथन में हथियार धरे ऐसे शोभत हौ कि,
मारनहार जे यमराज हैं तिनहुन को देखिकै कहा क्षोभत डेरात हौ अर्थ तुम
यमराजहूको नहीं डरात हौ औ क्षत्रिय के कुलमें ह्वैकै किमि कहं काहे दीन
वैन हम सों ना रचो ब्राह्मणसों क्षत्रिय को अधीन रहिबोई उचित धर्महै कछू
भयसों तुम दीनबचन नहीं कहत काहेते कि कोटि उपचार यत्न करौ कहे
करै अर्थ ब्रह्मादिहू की शरण में जाइ औ तुम मीच को मारौ चाहौ तो कैसेहू न
बचौ कहे बचै ॥ ३५ ॥ जो तुमही अपनी जननी माता को सुख पाइकै मारयो
तुमको कछु गुरु दोष ना भयो तौ तुम्हारे मारे मों हमहूं को रत्तिहू भरि गुरुदोष-
( ७६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
नहीं है जननीको वयजनाइ या जनायो कि तुमने ऐसे स्त्रीवधादि पराक्रम
करचौहैं अथवा गुरुदोषीजनायो ॥ ३६ ॥
मू०-परशुराम-विजयछन्द ॥ लक्ष्मणकेपुरिखान कियो
पुरुषारथसोनकह्योपरई । वेषबनाइकियोबनितानकोदेखत
केशव ह्योहरई । क्रूरकुठारनिहारितजैफलताकीयहैजो
हियोजरई । आजुतेकवलतोकोमहाधिकक्षत्रिनपैजोदयाक-
र्है ॥ ३७ ॥ गीतिकाछन्द ॥ तबएकविंशतिबेरमैं बिनक्षत्रकी
पृथिवीरची। बहुकुंडशोणित सोंभरेपितृतर्पणादिकियासची ॥
उबरेजेक्षत्रियक्षुद्रभूतलशोधिशोधिसंहारिहौं । अबबालवृद्धन
ज्वानछाँडहुँधर्मनिर्देय पारि हौं ॥ ३८ ॥
टी०-सरस्वतीउक्तार्थः लक्ष्मण के पुरिखान बडेन जो पुरुषारथ कियो है सो
कह्यो नहीं परत कहा पुरुषारथ कर्यो जिन बनितन को बेष बनायो अर्थ बनिता
रच्यो गौतम की स्त्रीको पाथर सों स्त्री बनायो जाको देखत हियो हरिजात है
अर्थ अति सुंदरी बनायो तौ या जनायो सृष्टि करिवे को समर्थ हैं याही विधि
दशरथ भगीरथादि के कृत गंगा ल्याइबो आदि जानो सो हेक्रूरकुठार ! तिनको
निहारि कै तजै कहै छोडै अर्थ इनके समीपेते अन्यत्र जाइ तौ नाको इनके
वियोग को यहै फल है जो हृदयजरई कहै जरतहै अर्थ अति सुंदररूप जे येहैं
तिनक वियोग सों हृदयजरत है इनके योगको यहै फल है तासों जो तेरो
इनको वियोग ह्वै है ता तैसे हियोजरिहै सोआजकेवल कहै एक तोको महा
अधिक कहै महाउत्तम है जो क्षत्रिन के ऊपर दया करु आजुतक क्षत्रिनको
वध करचो ता क्षत्र वर्णनमें ये ऐसे रूप गुण बलादि पूरित भये तासों अब
क्षत्र वर्णकी रक्षा करिवो तोहिं उचितहै तिनके निकट रहि सहायता करि क्षत्री-
वर्ण तोंकों रक्षणीय है ॥ ३७ ॥ सची कहै करी ॥ ३८ ॥
मू०-राम-दोहा ॥ भृगुकुलकमलदिनेशसुनि, ज्योति
सकलसंसार ॥ क्योंचलिहैइनशिशुनपै, डारतहौयशभार
॥ ३९ ॥ परशुराम-सोरठा ॥ रामसुबन्धुसँभारि, छोडत
हौंशरप्राणहर ॥ देहुहथ्यारनडारि, हाथसमेतिनबेगिदै ॥४०॥
सप्तमप्रकाशः ७. ( ७७ )
राम-पद्धटिकाछंद ॥ सुनिसकललोकगुरुजामदग्नि ।
तपविशिषअशेषनकीजोअग्नि ॥ सबविशिषछाँड़िसहि-
हौंअखंड । हरधनुषकरचोजिनखंडखंड ॥ ४१ ॥ परशुराम-
सवैया ॥ बाणहमारेनिकेतनत्राणविचारिबिचारिविरंचिकरेंहैं।
गोकुलब्राह्मणनारिनपुंसकजेजगदीनसुभावभरेंहैं ॥ रामकहा
करिहौतिनकोतुमबालकदेवअदेवधरेंहैं । गाधिकेनंदति-
हारेगुरूजिनतेऋषिबेषकियेउबरेहैं ॥ ४२ ॥
टी०-सकलसंसारको जीतिकै जो यश एकत्र कर्यो है सो इनसे लरिकै
हारिकै ता यशको बोझ इनबालनपै डारत हौं इनमें कैसे चलिहै इनसे लरिहौं
तौ हारिजैहौं इति भावार्थः ॥ ॥ ३९ ॥ रामचंद्र के सतर्क वचन सुनि परशु-
राम कोप करि बोले सो अर्थ खुलो है सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे हर महादेव !
इनके शर करिकै मैं प्राण छोड़तहौं अर्थ ये बाण सों मेरे प्राण हर्यो चाहतहैं
तासों बन्धुसहित जो कोपयुत रामचन्द्र हैं तिनको तुम सँभारि कहे सम्हारौ ये
अब तुम्हारेई सँभारन लायक हैं जासों ये हाथन मौ समेतन कहे सबन हथ्या-
रन को डारि देहिं जब तक ये हाथ में हथ्यारधरे रहिहैं तबतक हमारे भय
बन्यो है तासों तुम इनको कोप शांत करि हथ्यार उतरावो आगे महादेव
आयऊबे भये हैं ॥ ४० ॥ तपके जे अशेष विशिष बाण हैं विशिष पदतैं
शाप जानौ तिनकी अग्नि औ और सब बाणनको छाँड़ौ ते अखंड कहे
निर्विघ्न सहिहौं अर्थ हमारे ऊपर शाप औ बाण दुवो चलाओ हम सहि हैं
॥ ४१ ॥ सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे राम ! तिन बाणन को तुम कहा करिहौ अर्थ
कहा कियो चाहत हौ अर्थ इनको प्रभाव लोप कियो चाहतहौ तुम कैसेहौ
बालकताहीं में देव औ अदेव तुम को डरें हैं ॥ ४२ ॥
मू०-श्रीराम-षट्पद ॥ भगनभयोहरधनुषशालततुमको
अबशालै । वृथाहोइविधिसृष्टिईशआसनतेचालै ॥ सकल
लोकसंहरहुशेषशिरतेधरडारैं । सप्तसिंधुमिलिजाहिहोहिंस-
बहीनभभारैं ॥ अतिअमलज्योतिनारायणीकहिंकेशवबुडि