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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 269 में से

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पृष्ठ 72

( ६६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
कै ॥ यकअंगचर्चितचारुनन्दनचन्द्रिकातजिचन्दको । जनु
राहुकेभयसेवही रघुनाथ आँनदकंदको ॥ ६१ ॥ मुखएक
हैनतलोकलोचन लोललोचनकीहरे । जनुजानकीसँगशोभि
जै शुभलाज देहनकोधरे ॥ तहँएकफूलनकेविभूषण एक मो-
तिनकेकिये । जनुक्षीरसागरदेवतातन क्षीरछीटनिकोछिये
॥ ६२ ॥ सोरठा ॥ पहिरेवसनसुरंग, पावकयुतस्वाहामनो ॥
सहजसुगन्धितअंग, मानोदेवीमलयकी ॥ ६३ ॥ चामर
छंद ॥ मत्तदन्तिराजराजिबाजिराजराजिकै । हेमहीरमुक्त
चीर चारुसाजसाजिकै ॥ वेषवेषबाहिनी अशेषवस्तुसोधि
यो । दाइजौविदेहराज भाँतिभाँतिकोदियो ॥ ६४ ॥ वस्त्र
भौनस्योवितान आसनेबिछावने । अस्त्रशस्त्रअंग त्रान भा-
जनादिकोगने ॥ दासिदासबासिबासरौमपाटकेकियो । दाइ
जौ विदेहराज भाँतिभाँतिकोदियो ॥ ६५ ॥
टी०-वपुमंडिक यह चंद्रिकाहू में जानौ ॥ ६१ ॥ एकन के मुख नत कहे
लाजसों नीचेको नये हैं वे लोल लोचन करिकै लोक लोचनन को हरति हैं
॥ ६२ ॥ स्वाहा अग्नि की स्त्री पावक सम वस्त्र है स्वाहा सम स्त्री है ॥ ६३ ॥
मत्त जे दंतिराज गजराजहैं तिनकी राजि कहे समूह औ वाजिराज घोडेनकी राजि-
का कहे समूह और जे देवे के उचित वस्तु हैं तिन्हें शोधियो कहे दीवे के लिये
ढूँढ़ि ढूँढ़ि मँगइयो ॥ ६४ ॥ वितान कहे चंदोवा सामियानेति आसन भूषा-
सन गद्दीति बिछावने फरसस्यो कहे सहित वस्त्र भौन कहे पाल डेरा इति दियो
अंगत्राण बख्तर भाजन सुवर्णादिके पात्रवासि सुगंधसों युक्तकरिकै रोमवसी
उत्तम कंबलादि पाठ वास पीतांबरादि दियो ॥ ६५ ॥
मू०-दोहा ॥ जनकराजपहिराइयो, राजादशरथसाथ ॥
छत्रचमरगजबाजिदै, आसमुद्रक्षितिनाथ ॥ ६६ ॥ निशि