रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपीत वानरनको गंग तरंगसम कह्यो तैमे ह्यौंऊ पीतपागको गंगाजल सम
कह्यो तासों श्वेतपीतकी औ हरित श्यामकी कहूं समता करतहैं यह कविनियम है
॥ ४७ ॥ सुमिल चिकण सुदेश सुन्दर सुतंत्र कहे स्वच्छंद जे विधि हैं तिन
लिख्यो है अथवा सुष्ट जो तंत्रशास्त्रहै तासों शोधिकै ढूँढिकै अथवा शुद्ध करिकै
मानो विधातैं जाके पास होइ ताके जयको शत्रुके अजयको मंत्र लिख्यो है
अथवा जायके अर्थ अजय कहे काहूके जीतिवे योग्य नहीं ऐसे जे श्रीराम
चन्द्र हैं तिनको जय कहे जीतिको मंत्रविधि लिखि दियो है जासों रामचन्द्र
सबको जीतत हैं वश्य करत हैं अथवा जया जो पार्वती हैं तिनहूंके जयको
जीतिबेको मंत्र लिख्यो है यासों या जनायो पतिव्रतमें अग्रगणनीय जे पार्वती
हैं तेऊ जिनको देखि वश्यहोयँ तो और स्त्री पुरुषकी कहाँ वातहै आशय
कि अति सुन्दर हैं “ जयाजयन्तीतिथिमित्यथोमातत्सखीषु च ” । इति-
मेदिनी ॥ ४८ ॥
मू०-दोहा ॥ यदपिभ्रुकुटिरघुनाथकी, कुटिलदेखियत
ज्योति ॥ तदपिसुरासुरनरनकी, निरखिशुद्धगतिहोति॥४९॥
श्रवणमकरकुण्डललसत, मुखसुखमाएकत्र ॥ शशिसमी-
पसोहतमनो, श्रवणमकरनक्षत्र ॥ ५० ॥ पद्धटिका
छन्द ॥ अतिवदनशोभसरसीसुरंग । तहँकमलनयननासा
तरंग ॥ जनुयुवतिचित्तविभ्रमविलास । तेइभ्रमरभवँतरस
रूपआस ॥ ५१ ॥
टी०-माना शशिके समीप कहे दोनों और निकट उदित द्वै श्रवण नक्ष-
त्रमें द्वै मकरराशि शोभित हैं नक्षत्र पदको सम्बन्ध श्रवण मोंहै अथवा श्रवणमो
मकरराशि स्वरूपके नक्षत्र कहे तारा मकरराशि स्वरूपेति शोभितहैं युक्ति
यह कि, उत्तराषाढ श्रवण धनिष्ठा तीनि नक्षत्रनमें मकरराशि को बास है सो
मानो श्रवणही में वर्त्तमान है शशिके दुवौ ओर शोभित है श्रवण नक्षत्रकी औ
कर्णकी शब्दसाम्यहै औ मकरराशिकी औ कुण्डलकी रूप साम्यहै शशि सदृश
मुखहै ॥ ४९ ॥ ५० ॥ सरसीतडाग सुरंगनिर्मलरामचन्द्रकेनेत्रशोभामें भ्रमतहैं
विलास कौतुक जिनको ऐसे जे युवतिनके चित्तहैं तेई भ्रमर भवँतहैं रस मकर-