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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 269 में से

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पृष्ठ 81

होउसोहोउ । विप्रनके कुलकोभृगुनन्दनसूरजकेकुल
शूरनकोउ ॥ ३४ ॥
टी०-पछघावरि शिखरनि को भेद हैं खीर दूध सरस्वती उक्तार्थः हे राम !
तिहारे कंठ को कहे शब्द को अर्थ मधुर वचन पानि कै सो कुठार नितहीं
पियो पान कर्यो चाहतहै अर्थ सुन्यो चाहत है ॥ "कंठोगलेसंनिधौनेध्वनौ
मदनपादपं' इति मेदिनी ॥ ३२ ॥ जिन ब्राह्मणनको अनुग्रह कृपा सब को
वृद्धि करत है तिनको निग्रह दंड हमारे चित्तमें कैसे परै कहे आवै औ जिनके
शीशमें जग अक्षत धरत है अर्थ पूजन करत है तिनको तन साक्षात कहे खंडिन
को करै या जनायो ब्राह्मण अवध्य है तासों तुम को नहीं मारते ॥ ३३ ॥
चहै अशोक सुख चहै शोक दुख फूलो होइ लोक यश अपलोक अयश ॥ ३४॥
मू०-परशुराम-विशेषकछन्द ॥ हाथधरेहथियारसबैतुम
शोभतहौ । मारनहारहिदेखिकहामनक्षोभतहौ ॥ क्षत्रियके
कुलह्वैकिकिमिवैननदीनरचौ । कोटिकरोउपचारनकैसेहुमी-
चबचौ ॥ ३५ ॥ लक्ष्मण ॥ क्षत्रियह्वैगुरुलोगनके
प्रतिपालकरैं । भूलिहुतौतिनकेगुणऔगुणजीनधरैं । तौहम-
कोगुरुदोषनहीं अबएककती । जोअपनीजननी तुमहींसुख
पाइहती ॥ ३६ ॥
टी०- लक्ष्मण औ रामचंद्र के नम्र वचन सुनिकै भय युक्त जानि परशुराम
कह्यो कि, मारन हार जो मैं हूं ताको देखि कै कहा क्षोभत डरात हौ सरस्वती
उक्तार्थः सबै कहे चारों भाई तुम हाथन में हथियार धरे ऐसे शोभत हौ कि,
मारनहार जे यमराज हैं तिनहुन को देखिकै कहा क्षोभत डेरात हौ अर्थ तुम
यमराजहूको नहीं डरात हौ औ क्षत्रिय के कुलमें ह्वैकै किमि कहं काहे दीन
वैन हम सों ना रचो ब्राह्मणसों क्षत्रिय को अधीन रहिबोई उचित धर्महै कछू
भयसों तुम दीनबचन नहीं कहत काहेते कि कोटि उपचार यत्न करौ कहे
करै अर्थ ब्रह्मादिहू की शरण में जाइ औ तुम मीच को मारौ चाहौ तो कैसेहू न
बचौ कहे बचै ॥ ३५ ॥ जो तुमही अपनी जननी माता को सुख पाइकै मारयो
तुमको कछु गुरु दोष ना भयो तौ तुम्हारे मारे मों हमहूं को रत्तिहू भरि गुरुदोष-