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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 65, कुल 269 में से

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पृष्ठ 65

जो लक्ष्मी हैं ताको सीता नामा पुत्रिका पाइकै अखिल सम्पूर्ण भुवन कहे
चौदहों भुवनके भर्त्ता पोषक औ ब्रह्म रुद्रादि के कर्त्ता औ थिग वृक्षादि चर
मनुष्यादि सबमें अभिगमी कहे वास कर्त्ता अथवा शोभा कर्त्ता औ नामी कहे
यशी ऐसो जामातृ तुमकीय कहे करचो जैसे तीनों विशेषणन सों लक्ष्मी जनायो
तैसे चारयों विशेषणन सों विष्णु जानो तो लक्ष्मीजाकी पुत्रिका भई औ विष्णु
जामातृ भये तासों अति भाग्यवान् हौ इतिभावार्थः अथवा विश्वामित्र कहत हैं
कि जनक सुखद जे ईश्वर हैं जिन करिकै गीताकहे गाई अर्थ जाको विष्णुहू
गान करत हैं यासों लक्ष्मी जनायो और अर्थ एकहि है ऐसी जो सीता नामा
तुम्हारी पुत्रिका है ताको हमपायो औ सो जामातृ तुमकीय कहे करचो यासों या
जनायो कि दोनों तरफ बडा लाभ भयो ॥ २८॥ २९ ॥
मू०-चामरछंद ॥ आसमुद्रकेक्षितीशऔरजातिकोगने ।
राजभौमभोजकोसबैजनेगयेबने ॥ भाँतिभाँतिअन्नपान व्यं-
जनादिजेंवहीँ । देतना रिगारिपूरिभूरिभूरिभेवहीँ ॥३०॥ हरि
गीतछंद ॥ अबगारितुमकहदेहिंहमकहिकहादूलहरामजू ।
कछुबापप्रियपरदारसुनियतकरी कहतकुवामजू । कोगनैकेत
नेपुरुषकीन्हेंकहतसबसंसारजू । सुनिकुँवरचितदैवरणित्ताको
कहियसबव्योहारजू॥ ३१ ॥
टी०-औ समुद्रके कहे समुद्र पर्यंतके अर्थ पृथ्वीभरेके भूरि भूरि भेवही कहे
अनेक भेदसों ॥ ३० ॥ सात हरीगीतछंदको अन्वय एक है यामें श्लेष सों
आशीर्वादात्मक व्याजस्तुति है परदार कहे परस्त्री उत्कृष्टदार कुवाम कुत्सित
वाम औ कु कहे पृथ्वीरूपवाम व्योहार कहे संबन्ध मित्रता इति कुवाम पक्ष
रत्नाकर कहे अनेक रत्नयुक्त पृथ्वी ये छः समुद्र शीश पश्चिम करिकै औ
पांय पुरुब करिके प्रलयकाल के उपरांत जब शेषके फणिकहे फणनि की
मणिमाला मणिसमूहकी पलिका अथवा शेषजे फणिकहे सर्प हैं तिनकी
मणिमालाकी पलिकामें परति पौढ़ति है तब अनेक पुरुषन को युद्धादि कराई
ग्रहण त्यागरूप प्रबन्ध कियो करतितै गातहैं सहजैही सुगंध युक्त जाके 'गंध-
वती पृथ्वितीन्यायशास्त्रोक्तत्वात्' ॥ ज्या प्रबंधसों हिरण्याक्षादि जो पुरुषकरचो
सो क्रमही गनायो सरवस कहे सवसार कहे रसस्वादिति औ द्रव्यभ्रमि कहे