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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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पृष्ठ 71

षष्ठप्रकाशः ६. ( ४९ )
मू०-पद्धटिकाछन्द ॥ शुभमोतिनकीडुलरीसुदेश । ज-
नुवेदनके अक्षसुवेश ॥ गजमोतिनकीमालाविशाल । मन
मानहुँसन्तनकेमराल ॥ ५७ ॥ विशेषकछन्द ॥ श्यामदु-
वौपगलाललसैद्युतियोंतलकी । मानहुँसेवतिज्योतिगिरायमु-
नाजलकी ॥ पाटजटीअतिश्वेतसोंहीरनकीअवली । देवन-
दीकनमानहुँ सेवतभाँतिभली ॥ ५८ ॥ दोहा ॥ कोवरणै
रघुनाथछबि, केशवबुद्धिउदार ॥ जाकीकिरपाशोभिजति, शो-
भासबसंसार ॥ ५९ ॥ दण्डक ॥ कोहैदमयन्तीइन्दुमतीरति
रातिदिन होहिनछबीलीछबिनजोशृंगारिये । केशवल्जा-
तजलजातवेद ओपजातरूपबापुरेविरूपसीताजोनिहारिये । म-
दननिरूपमनिरूपननिरूपभयो चन्दबहुरूपअनुरूपकैविचा-
रिये । सीताजूकेरूपपरदेवताकुरूपकोहैं रूपहीकेरूपकनौ
वारिवारिडारिये ॥ ६० ॥
टीका-मरालहंस ॥ ५७ ॥ या प्रकार मानो त्रिवर्णीरामचन्द्रके चरण सेवत
हैं पाठ पदश्लेष है रेशम औ दुर्वा कूलको अंतर ॥ ५८ ॥ बुद्धिउदार पाठ होइ
तौ बुद्धिहै तुसार हेवार समझगभंगुरजाकी ॥ ५९ ॥ दमयन्ती नलकी स्त्री
इन्दुमती अज की स्त्री रति काम की स्त्री इनको राति दिन शृंगारिये तौ सीता-
की छवि समान इनकी छवि ना होइ जातवेद अग्नि जातरूप सुवर्ण निरुपम
कहे जाके उपमा कोऊ नहीं अर्थ अति सुन्दर जो मदन है सो सीता जू के रूप
समताके निरूपण में निर्णयमें लाजसों निरूप कहे निःस्वरूप निर्देहेति भयो औ
घटि बढिकै अनेक रूपको धर्त्ता जो चन्द्रहै ताको अनुरूपकै कहे असदृशै विचा-
रियत है रूप जो सौंदर्य है ताहीके रूपक कहे साम्यको वारिवारि डारि-
यत है ॥ ६० ॥
मू०-गीतिका छन्द ॥ श्रीशोभिजैसखिसुन्दरीजनुदामि-
नीवपुमंडिकै । घनश्यामकोजनुसेवहीँ जडमेघओघनछांडि-
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