सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 269 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 76

( ७० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
अनाथ कहे जाकोनाथ कोऊ नहीं अर्थ सबको नाथकरों कहे करिमानो तौ
सबके नाथ जे विष्णु हैं तिनहीं के शंभु धनुषतोरिबे की सामर्थ्यहै ताते तेई
विष्णु रामरूपह्वै दशरथके पुत्र भये यह निश्चय करि दशरथको सर्वोपरि मानो
इतिभावार्थः ॥ १२ ॥ १३ ॥
मू०-सोरंठा ॥ रामदेखिरघुनाथ, रथतेउतरेवेगिहै ॥ गहे-
भरंतकोहात, आवतरामविलोकीयो ॥ १४ ॥ परशुराम-
दंडक ॥ अमलसजलघनश्यामवपुकेशवदास चंद्रहूतैचारु
मुखसुखमाकोधामहै ॥ कोमलकमलदलदीर्घविलोचननि
सोदरसमानरूपन्यारोन्यारोनामहै। बालकविलोकियतपूरण
पुरुषगुण मेरोमतमोहियतऐसोएकयाम है ॥ बैरमानिवामदेव-
कोधनुषतोरिबोइन जानतहौंबीसविशेरामवेषकामहै ॥ १५ ॥
भरत-गीतिकाछन्द ॥ कुशमुद्रिकासमिधैंस्रुवाकुशऔकमं-
डलकोलिये। करमूलशरघनतर्कसी भृगुलातसीदरशैहिये ॥
धनुबाणतिक्षक कुठारकेशव मेखलामृगचर्मसों । रघुवीरको
यहदेखियेरसवीरसात्त्विकधर्मसों ॥ १६ ॥ राम-नाराचछ-
न्द ॥ प्रचंडहैहयाधिराजदंडमानजानिये । अखंडकीर्त्तिले
यभूमि देयमानमानिये ॥ अदेवदेवजेअभीतरक्षमानलेखिये ।
अमेयतेजभर्गभक्त भार्गवेशदेखिये ॥ १७ ॥
टी०-राम परशुराम ॥ १४ ॥ पूरण पुरुष विष्णु याम पहर वामदेव महादेव
॥ १५ ॥ कुश मुद्रिका कहे पैंतीसमिधैं होम की लकड़ी करमूल कहे कांधा में हैं
शरघन घने बान सों पूरित तरकस जाके मेखला कटिभूषण धनुर्बाण धार-
णादि वीररसको धर्म है औ कुश मुद्रिका धारणादि सात्त्विक प्राणीको धर्म
है ॥ १६ ॥ प्रचंड जे हैहयादि सहस्रार्जुनादि राजा हैं तिनके दंडकर्त्ता हैं अर्थ
सहस्रार्जुनादिकनको नाश इनहिंन कियो है औ अखण्ड कहे पूर्ण कीर्त्तिके
लेयमान लेवैयाहैं औ अखंड भूमिके देयमान कहे देवैया हैं अखण्ड पदको
संबंध भूमिहूमेंहै अदेव दैत्य औ देवनके जेयमान जीतनहार हैं मानपदको
संबंध लेय जेयहू में है औ भीत जे भय युक्तहैं तिनके रक्षमान रक्षक हैं अमेय