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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 269 में से

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पृष्ठ 70

( ६४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

न्द्ररूपी जो रूपशोभा है ताकी आशा सों अर्थ जैसे मकरन्दकी आश करि
तड़ागमें भँवर भँवतहैं तैसे रूपकी आशा करि रामचन्द्रके मुखपर स्त्रीनके चित्त
भ्रमत हैं ॥ ५१ ॥
मू०-निशिपालिका छन्द ॥ शोभिजातिदन्तरुचिशुभ्र
उरआनिये । सत्यजनुरूपअनुरूपकबखानिये ओंठरु-
चिरेखसविशेषशुभश्रीये । शोधिजनुईशशुभलक्षणसबैद-
ये ॥ ५२ ॥ दोहा ॥ ग्रीवाश्रीरघुनाथकी, लसतिकम्बुवर
वेष ॥ साधुमनोवचकायकी, मानो लिखीत्रिरेष ॥ ५३ ॥
सुन्दरीछन्द ॥ शोभनदीरघबाहुविराजत । देवसिहातअदे-
वतेलाजत ॥ बैरिनकोअहिराजबखानहुँ ॥ हैहितकारिनकी
ध्वजमानहुँ ॥ ५४ ॥ योंउरमेंभृगुलातबखानहुँ । श्रीकरको
सरसीरुहमानहुँ ॥ सोहतहैउरमेंमणियोजनु । जानकीको
अनुरागिरह्योमनु ॥ ५५ ॥ दोहा ॥ सोहतजनरतरामउर,
देखतजिनकोभाग ॥ आइगयोऊपरमनो, अन्तरकोअनु
राग ॥ ५६ ॥
टीका-शुभ्रश्वेतसत्यकहेनिश्चयजानो रूपसुन्दरताकेअनुरूपक कहे प्रतिमा
बखानियतहै अथवा जानो सत्य जो पदार्थ है ताके रूपकेअनुरूपकप्रतिमाहै
सत्यकोरूपश्वेतहै ॥ ५२ ॥ कंबुशंखमनसावाचा कर्मणा करिकै जो रामचन्द्र
साधु हैं तिन तीन्योंकी मानों विधातें तीनि रेखा लिखिदियो है निश्चयबातको
रेखा खींचि कहिबेकी रीति लोकमें प्रसिद्ध है ॥ ५३ ॥ ५४ ॥ रामचन्द्रके
उरमें लक्ष्मी वास कियेंहैं ताके करको मानो कमल है मणि कौस्तुभ मणि
अनुरागकी मन सदृशकह्यो तासों अरुण जानों ॥ ५५ ॥ वाही मणिकी फेरि
उत्प्रेक्षा करत हैं जन जे दासहैं तिनमें रतकहे संलग्न जो अनुराग रामचन्द्रके
उरमें शोभित हैं सो बाढिकै उर अन्तर ते मानो ऊपर आइगयो है ताको जे
देखत हैं तिनको बड़ो भागहै ॥ ५६ ॥