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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 80, कुल 269 में से

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पृष्ठ 80

( ७४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

जअपराधीक्योंहतौं, गुरुअपराधीछांडि । तातेकठिनकुठार
अब, रामहिंसोरणमांडि ॥ ३१ ॥
टीका०-वडवानलरूपिजो हमारे कोप हैं सो इनको लोप भस्म कियो
चाहत है ॥ २८ ॥ २९ शत्रुघ्नजीकी यह बात सुनि भरतसों कह्यो कि तुम रामच-
न्द्रको लैके घर जाहु इनपै शत्रुघ्नै युद्ध करि जो जीवित बचि है तब तुमसों रण
करि हौं ॥३०॥ गुरु अपराधी रामचन्द्र निज अपराधी शत्रुघ्न सरस्वती उक्तार्थः-
निज ते अपनाते हमते इति है अपरा कहे अन्य अधिक इति है बुद्धि जिनकी
इहां बुद्धिउपलक्षणमात्र है बुद्धि पढ़ते बुद्धिवल विद्यादि जानों ऐसे जे रामचन्द्र हैं
तिनको कैसे मारौं अर्थ इनके मारिवे को समर्थ नहीं हौं फेरि कैसे हैं गुरु जे
शिव हैं तिनहुँनते अपराधी कहे बल विद्यादि करि अधिक हैं जिनको शिवहू ध्यान
करत हैं ताते मारिवे की आशा करि छांडिकै हे कठिन कुठार रामचन्द्र हीको सो
रनकहे स्तुतिसों रनसों मांडि कहे युक्तकरौ अर्थरामचन्द्रकी स्तुति करो जो कहौ
कुठार तौ बोलत नहीं कैसे स्तुति करि है तो सबमें अभिमानी देवतारहत है
ता करिकै स्तुति करिवे को समर्थ है जैसे समुद्रको अभिमानी देवता रामचंद्रकी
स्तुति करयो हैं औ लंका हनूमानको रोक्यो है ॥ ३१ ॥
मू०-परशुराम-विजयछंद ॥ भूतलकेसबभूपनकोमद
भोजनतौबहुभांतिकियोई। मोदसोंतारकनंदकोमेदपछ्या-
वरिपानसिरायोहियोई। खीरषडाननकोमदकेशवसोपलमें
करि पान लियोई ॥ रामतिहारेइकंठकोश्रोणितपानको
चाहैकठार कियोई ॥ ३२ ॥ लक्ष्मण-तोटक ॥ जिनका
अनुग्रहवृद्धिकरै । तिनकोकिमिनिग्रहचित्तपरै ॥ जिनको
जगअच्छतशीशधरै । तिनकोतनसक्षतकौनकरै ॥ ३३ ॥
राम-मदिराछन्द ॥ कंठकुठारयशौअबहार किफूलअशो-
कसशोकसमूरो ॥ कैचित्रसारिचढैकिचितातनचन्दनचित्र
किपावकपूरो ॥ लोकअलोकबडोअपलोकसुकेशवदासजो