रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरा०-दोहा ॥ भगवन्तनसों जीतिये, कबहुँनकीनेशक्ति ॥
जीतीएकैबातमें, केवलकीनेभक्ति ॥ २६ ॥ हरिगीतछंद ॥
जबहयौहैहयगजइनविनक्षत्रक्षितिमण्डलकरचो । गिरिवेध
षण्मुखजीतितारक नंदकोजबज्योंहरचो ॥ सुतमैनजायोराम
सों यह कह्योपर्वतनंदिनी । वहरेणुकातिशयधन्यधरणीमेंभ-
ईजगवंदिनी ॥ २७ ॥
टी०-सो बात कहौ जो तनमनमों वनिआवै अर्थ अग्न वनि परै यासों या
जनायो कि जो कहत हौं सो तुमका मनहूं सों करिखे को दुर्लभ है ॥ २३ ॥
भरत कह्यो है कि घसत घसत चंदनहूंमें आगि उठति हैं तासों परशुरामकह्यो
कि अंगमों आगि उठावो सरस्वतीउक्तार्थः॥ कि हमारेसंगपरशुराम सों रामचन्द्र
लरि हैं यह जो रामचन्द्र प्रति तुम्हारे लै कहे चोप है ताको छिडाइ कहे त्या-
कै तुम हमका अपनी कृत दिखाय कै रिझाउ कहे प्रसन्न करो अथ रामचन्द्रको
भरोसो छोडि हमसों तुम लरौ तौ हम लरैं रामचन्द्र सों लरीबे लायक हम नहीं
हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ २६ ॥ क्रौंचनामाजोगिरि है ताके वेधन हार जे षण्मुख
कहे स्वामिकार्तिक हैं तिनकी जीति कै तारकासुर को जो नंदनपुत्रहै ताको ज्यों
हत्यो मारचो ऐसे ऐसे इनके कृत्य देखि कै पार्वती कह्यो कि ऐसो पुत्र हमारे न
भयो तब रेणुका परशुरामकी माता जगवंदिनी भई औ धन्य भई ऐसो परा-
क्रम परशुराम देखिकै रेणुकाको सब जगवंदना करिकै कह्यो धन्य है रेणुका
जाके ऐसो पुत्र भयो या प्रकार रामचन्द्र परशुरामकी स्तुति कियो ॥ २७॥
मू०-परशुराम-तोमरछन्द ॥ सुनुरामशीलसमुद्र । तवबंधु
हैंअतिक्षुद्र ॥ ममवाडवानलकोप । अगुकियोचाहतलोप-
॥ २८ ॥ शत्रुघ्न-दोधक ॥ हौभृगुनंदबली जगमाहीं। राम
बिदाकरियेघरजाहीं, हौं तुमसोंफिरियुद्धहिमाडौं ॥ क्षत्रिय
वंशकोवैर लैछांडौं ॥ २९॥ तोटकछंद ॥ यहबातसुनीभृ-
गनाथजबै । कहिरामहिंलेघरजाहुअबै ॥ इनपैजगजीवतजो
बचिहै। रणहौं तुमसों फिरिकैरचिहौ ॥ ३० ॥ दोहा ॥ नि