रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरंचिवाससी निथम्बराजिकाभली । जहाँतहाँबिछावनेबनेघ-
नेथलीथली ॥ वितानश्वेतश्यामपीतलालनीलकारँगे । मनो
दुहूँदिशानकेसमानबिम्बसेजगे ॥ ३९ ॥
टी०-३२ ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ रूपजो सांदर्य्य है
ताके अनुरूप सदृश अर्थ अति सुंदर ॥ ३८ ॥ जा मंडपमें विरंचि जे ब्रह्मा हैं
तिनके वासगृहकी ऐसीनिथंभ कहे थंभनकी राजिका पंक्तिरचीहै अर्थ ब्रह्माके
मंदिर महशमंडपबन्योहैं विचित्रवाससीनि पाठ होइ तौ विचित्र वाससीनि
कहे विचित्र वस्त्रन करिकै अर्थ परदान करिकै थंभराजिका रचींहैं बनींहैं अर्थ
अनेक रंग के परदा लगे हैं वितान चंदोवा श्याम कहे बैंजनी नीलिका जो
लीलहै तासों रंगे हरिण जानो मानो भू आकाश जे दूनो दिशा हैं तिनके
परस्पर ममान बिंब कहे प्रतिबिंब से जने हैं अर्थ भूमें जे बिछायने हैं तिनके
प्रतिबिंब आकाश में जगे हैं औ आकाश में वितानहैं तिनके प्रतिबिंब भूमं
जगैंहैं यासों या जानो जहाँ जारंग को वितान तन्योहैं तहां ताही रंगके बिछा-
वने हैं “बिंबन्तुप्रतिबिम्बेपीतिमेदिनी” ॥ ३९ ॥
मू०-पद्धटिकाछन्द ॥ गजमोतिनकीअवलीअपार ।
तहँकलशनपरउरमतिसुढार । शुभपूरितरतिजनुरुचिरधार ।
जहँतहँआकाशगंगाउदार ॥ ४० ॥ गजदन्तनकीअवलीसुदे-
श । तहँकुसुमराजराजतसुवेश ॥ शुभनृपकुमारिकाकर-
तिगान । जनुदेविनकेपुष्पकबिमान ॥ ४१॥ तामरसछन्द ॥
इतउतशोभितसुन्दरिडोलैं । अर्थअनेकनिबोलनिबोलैं ॥
सुखमुखमंडलचित्तनिमोहैं । मनहुँअनेककलानिधिसो-
हैं ॥ ४२ ॥ भ्रुकुटिविलासप्रकाशितदेखे । धनुषमनोज
मनोमयलेखे ॥ चरचितहासचन्द्रिकनिमानो । सुखमु-
खवासनिवासितजानो ॥ ४३ ॥
टी०--मण्डपकी रति कहे प्रीति सों पूरित मानों रुचिर धार कहे प्रवाहन
करिकै मण्डपमें जहाँ तहाँ उदार सुन्दर आकाश गंगा है अर्थ गजमोतिन की