सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 83, कुल 269 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 83

सप्तमप्रकाशः ७. ( ७७ )
राम-पद्धटिकाछंद ॥ सुनिसकललोकगुरुजामदग्नि ।
तपविशिषअशेषनकीजोअग्नि ॥ सबविशिषछाँड़िसहि-
हौंअखंड । हरधनुषकरचोजिनखंडखंड ॥ ४१ ॥ परशुराम-
सवैया ॥ बाणहमारेनिकेतनत्राणविचारिबिचारिविरंचिकरेंहैं।
गोकुलब्राह्मणनारिनपुंसकजेजगदीनसुभावभरेंहैं ॥ रामकहा
करिहौतिनकोतुमबालकदेवअदेवधरेंहैं । गाधिकेनंदति-
हारेगुरूजिनतेऋषिबेषकियेउबरेहैं ॥ ४२ ॥
टी०-सकलसंसारको जीतिकै जो यश एकत्र कर्यो है सो इनसे लरिकै
हारिकै ता यशको बोझ इनबालनपै डारत हौं इनमें कैसे चलिहै इनसे लरिहौं
तौ हारिजैहौं इति भावार्थः ॥ ॥ ३९ ॥ रामचंद्र के सतर्क वचन सुनि परशु-
राम कोप करि बोले सो अर्थ खुलो है सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे हर महादेव !
इनके शर करिकै मैं प्राण छोड़तहौं अर्थ ये बाण सों मेरे प्राण हर्यो चाहतहैं
तासों बन्धुसहित जो कोपयुत रामचन्द्र हैं तिनको तुम सँभारि कहे सम्हारौ ये
अब तुम्हारेई सँभारन लायक हैं जासों ये हाथन मौ समेतन कहे सबन हथ्या-
रन को डारि देहिं जब तक ये हाथ में हथ्यारधरे रहिहैं तबतक हमारे भय
बन्यो है तासों तुम इनको कोप शांत करि हथ्यार उतरावो आगे महादेव
आयऊबे भये हैं ॥ ४० ॥ तपके जे अशेष विशिष बाण हैं विशिष पदतैं
शाप जानौ तिनकी अग्नि औ और सब बाणनको छाँड़ौ ते अखंड कहे
निर्विघ्न सहिहौं अर्थ हमारे ऊपर शाप औ बाण दुवो चलाओ हम सहि हैं
॥ ४१ ॥ सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे राम ! तिन बाणन को तुम कहा करिहौ अर्थ
कहा कियो चाहत हौ अर्थ इनको प्रभाव लोप कियो चाहतहौ तुम कैसेहौ
बालकताहीं में देव औ अदेव तुम को डरें हैं ॥ ४२ ॥
मू०-श्रीराम-षट्पद ॥ भगनभयोहरधनुषशालततुमको
अबशालै । वृथाहोइविधिसृष्टिईशआसनतेचालै ॥ सकल
लोकसंहरहुशेषशिरतेधरडारैं । सप्तसिंधुमिलिजाहिहोहिंस-
बहीनभभारैं ॥ अतिअमलज्योतिनारायणीकहिंकेशवबुडि